Tuesday, July 14, 2026
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गाय कोई मांस का बोरा या केवल दूध का डिब्बा नहीं है

बहराइच, यूपी (13 जुलाई, 2026)। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती जी की ऐतिहासिक ८१ दिवसीय ‘गविष्ठि (गोरक्षार्थ धर्मयुद्ध)’ यात्रा (३ मई से २४ जुलाई २०२६) के क्रम में आज 13 जुलाई को बहराइच की महसी विधानसभा क्षेत्र में विशाल जनसभा सम्पन्न हुई। यात्रा जब बाराबंकी से बहराइच में प्रवेश कर रही थी, तब जगह-जगह महाराजश्री का भव्य स्वागत हुआ। लगभग ३५५ विधानसभा क्षेत्र की परिक्रमा पूर्ण कर चुके महाराजश्री ने क्षेत्र के सम्मानित विप्र समाज, मातृशक्ति, संतजन एवं विद्वतजन का अभिनन्दन किया और उपस्थित जनसमुदाय ने वैदिक मंत्र “अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ” का सामूहिक उच्चारण करते हुए गौ रक्षा का संकल्प लिया।

बहराइच में जगह-जगह भव्य स्वागत —
धर्मयुद्ध यात्रा जब बाराबंकी से बहराइच में प्रवेश कर रही थी, तब जगह-जगह महाराजश्री का भव्य स्वागत हुआ — गांव और नगर श्रद्धापूर्वक यात्रा का अभिनन्दन कर उमड़ पड़े, माताएं, युवा एवं वृद्धजन मार्ग के दोनों ओर खड़े होकर आशीर्वाद लेते रहे। महसी विधानसभा क्षेत्र में पहुंचकर महाराजश्री ने वहां उपस्थित सम्मानित विप्र समाज, मातृशक्ति, संतजन, विद्वतजन एवं विशिष्ट जनों का अभिनन्दन किया और गौ माता के जयघोष के साथ अपना उद्बोधन आरम्भ किया।

गाय को देखने का नजरिया —
महाराजश्री ने बताया कि गाय को किस दृष्टि से देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब विधर्मी और विदेशी गाय को देखते हैं तो उन्हें मांस का बोरा दिखाई देता है और इस दृष्टि से उसका मूल्यांकन करते हैं कि इसमें कितना मांस निकलेगा। हममें से अनेकों आज देखते हैं तो केवल दूध दिखाई देता है — गाय की उपयोगिता को इसी से पूछते हैं कि कितना दूध देती है, और उतना ही मूल्य आंकते हैं। किन्तु उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज गाय को न मांस के बोरे के रूप में देखते थे और न दूध के डिब्बे के रूप में। वे देखते थे कि यह हमारी माता है, इसके भीतर तैंतीस कोटि देवताओं का वास है, यह परम पवित्र है, इसके सान्निध्य में हमारे पाप कटते हैं, और यदि यह प्रसन्न हो जाए तो हमारे हर काम को पूरा करने की सामर्थ्य रखती है। विधर्मियों और विदेशियों के अधिक साथ रहने के कारण, उन्होंने कहा, हम यह दृष्टि भूलने लगे — और परिणाम यह हुआ कि गाय धीरे-धीरे माता के रूप से छूटकर पशु होने लगी।

गाय पशु सूची में कैसे दर्ज हुई —
महाराजश्री ने बताया कि जब इस देश में अंग्रेज आए तो उन्होंने नए कानून बनाए और गाय को पशु की सूची में दर्ज कर दिया; तब से लेकर आज तक गाय को पशु कहा जा रहा है और उन्होंने कहा कि अब तो हर प्रदेश सरकार गाय को अपनी पशु सूची में रखती है। जैसे आप अपने घर की सूची रखते हैं — और उनकी एक पशु सूची है, जिसमें लगभग सोलह प्रकार के पशुओं का उल्लेख होता है, और आज की तारीख में गाय उनमें गिनी जाती है। अर्थात् वर्तमान सरकार की दृष्टि में गाय एक पशु है — न वह देवता है, न माता।

A cow is not a sack of meat or merely a carton of milk

शरीर से नहीं, गुण से होता है मूल्य —
महाराजश्री ने स्पष्ट किया कि गाय का शरीर पशु का है, इसमें कोई संदेह नहीं — किन्तु किसका शरीर कैसा है, इतने मात्र से उसकी कीमत नहीं होती; कीमत तो उसके भीतर के गुण से होती है। उन्होंने सभी से पूछा कि क्या आपके गुरुजी आपकी दृष्टि में मनुष्य हैं? आप उनको सामने खड़ा कर कहते हैं — ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥’ — अर्थात् हे गुरुजी, आप ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, शिव हैं, और हम तो आपको साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही मानते हैं। गुरु का शरीर मनुष्य जैसा है, फिर भी उन्हें कोई मनुष्य नहीं मानता। उसी प्रकार, उन्होंने कहा, भले ही गौ माता का शरीर पशु जैसा है, हम गाय को पशु नहीं मानते — क्योंकि उसके भीतर पवित्रता की पराकाष्ठा है।

पापनाशिनी और पवित्रीकरण की शक्ति —
महाराजश्री ने गाय के महान गुण का वर्णन किया। वह पापनाशिनी है और पवित्रता की पराकाष्ठा है। यदि उसके शरीर की छुई हुई हवा भी आपके शरीर से लग जाए तो आपके बहुत से पाप नष्ट हो जाते हैं; यदि उसके खुर से उड़ी धूल स्वयं आपके माथे पर आ गिरे, तो बहुत से पाप नष्ट हो जाते हैं; और यदि आप उसके पास जाकर उसके शरीर पर हाथ फेर दें, तो उस स्पर्श मात्र से पाप कट जाते हैं। गाय से मिलने वाले पंचगव्य — दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र — का यदि सेवन करें तो शरीर के भीतर के दोष और रोग भी निकलकर बाहर चले जाते हैं। और उसकी पवित्रता ऐसी है, उन्होंने कहा, कि उसका मल-मूत्र भी पवित्र है। गाय केवल स्वयं ही पवित्र नहीं है, अपितु अपवित्र को भी पवित्र कर देने की शक्ति उसमें विद्यमान है। जहां अपवित्रता है, वहां गौ माता का गोबर लेकर लेप दें — देवता वहां आने को तैयार हो जाएंगे; और जहां आज की छत वाले मकान में लेपना सम्भव न हो, वहां गौ माता का गोमूत्र छिड़क दें — वह स्थान इतना पवित्र हो जाएगा कि देवता वहां वास करने को तैयार हो जाएंगे।

स्वच्छता और पवित्रता हर व्यक्ति की आवश्यकता —
महाराजश्री ने कहा कि स्वच्छता और पवित्रता दो ऐसे गुण हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपनाना चाहता है। स्वच्छता से शरीर स्वस्थ रहता है और पवित्रता से मन भी स्वस्थ हो जाता है। अनेकों लोग कहते हैं कि हमारी पहली आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान है — भौतिक दृष्टि से यह सत्य है, उन्होंने आगे कहा, किन्तु विचार करें : रोटी मिले और साफ न हो तो काम चलेगा? कपड़ा एकदम साफ-सुथरा हो किन्तु किसी अशुद्ध स्थान पर रखा हो तो चलेगा? मकान साफ हो किन्तु उसमें कोई अपवित्र वस्तु पड़ी हो तो उसमें रहेंगे? इसलिए, उन्होंने कहा, जो भौतिक साधन हमें मिलें वे स्वच्छ भी होने चाहिए और पवित्र भी — तभी वे हमारे तन-मन को स्वस्थ और पवित्र बनाते हैं और तभी हम उनका लाभ ले सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि, आज संसार में सबसे सुंदर और सबसे स्वस्थ की प्रतियोगिताएं होती हैं, किन्तु आपके पूर्वज पवित्रता का महत्व जानते थे और इसलिए उन्होंने खोज की कि संसार में सबसे पवित्र प्राणी कौन है — और उस प्रतियोगिता में, उन्होंने कहा, गौ माता जीतती है; उनसे पवित्र इस संसार में कोई नहीं। पवित्रता के छूट जाने के कारण ही आज सब अशांत हैं — सब कुछ होते हुए भी किसी का मन प्रसन्न नहीं। किन्तु जो गाय की सेवा करते हैं, उसके सान्निध्य में रहते हैं और गो-पदार्थों का सेवन करते हैं, वे भीतर से इतने पवित्र हो जाते हैं कि देवता स्वयं उनके भीतर वास करने लगते हैं — और देवताओं के साथ सद्गुण आते हैं, तथा मन से रोग, दोष, चिंता, विकार और अवसाद निकल जाते हैं।

मूर्ख का छाता — आशीष बरस रहा है, और हम छाता ताने खड़े हैं —
महाराजश्री ने एक पुरानी कथा सुनाई : संसार के सब मूर्ख बार-बार मूर्ख कहे जाने से नाराज होकर बड़ी संख्या में एकत्रित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंच गए और बुद्धि मांगने लगे। ब्रह्मा जी ने अपने सेवकों से कहा कि इनकी तादाद बहुत बड़ी है, एक-एक करके बांटने में देर लगेगी — इसलिए बुद्धि की वर्षा कर दो। किन्तु मूर्खों ने पूरी बात सुनी ही नहीं; उन्होंने केवल ‘वर्षा’ सुना और हल्ला मचाने लगे कि वर्षा होने वाली है — और सबने छाते खोलकर तान लिए। उधर से ब्रह्मा जी बुद्धि की वर्षा करते रहे और इधर छाते लगाए मूर्ख खड़े रहे। ठीक इसी प्रकार, उन्होंने कहा कि गौ माता तैयार खड़ी है कि कोई सेवा करके प्रसन्न कर ले तो वह उसकी मनोकामना पूरी करे — और हम उसकी उपेक्षा करके छाता ताने आशीर्वाद के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

बहराइच के राजा सुहेलदेव — इस धरा पर विलक्षण गौ भक्त —
महाराजश्री ने स्मरण कराया कि इस देश के बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने गौ सेवा करके अपने अभीष्ट की प्राप्ति की, और बहराइच स्वयं ११वीं शताब्दी के राजा सुहेलदेव जी के नाम से आज भी पहचाना जाता है — जो गौ माता के भक्त थे और जिन्होंने गौ माता के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए। उनकी गौ भक्ति से विदेशी और विधर्मी तक परिचित थे। जब महमूद गजनवी सोमनाथ मन्दिर पर आक्रमण कर सोना और रत्न लेकर लौट रहा था, तब उसका भांजा सालार मसूद अपनी सेना लेकर यहां लूटने के लिए निकला और संयोग से नेपाल की तराई में, बहराइच जिले में आ पहुंचा। राजा सुहेलदेव ने अपनी सेना तथा आसपास के सभी छोटे राजाओं और प्रजा को एकत्र कर उसका सामना किया, उस पर छापामार युद्ध किया और उसकी supply line काट दी — एक दाना रसद भी उस तक पहुंचने नहीं दिया। किन्तु सालार मसूद को उनकी एक ‘कमजोरी’ का पता चल गया। राजा इतने बड़े गौ भक्त थे कि गाय पर प्रहार की कल्पना ही नहीं उठाते थे, और जो गाय पर प्रहार करे उस पर सुहेलदेव प्रहार करने को तत्पर रहते थे। इसलिए आक्रमणकारी ने बहुत सारी गायें आगे कर दीं और उनके पीछे-पीछे अपनी सेना चलाई, यह सोचकर कि गाय को देखकर सुहेलदेव की सेना प्रहार नहीं कर पाएगी। किन्तु राजा सुहेलदेव को अपनी गौ भक्ति भी निभानी थी और शत्रु को परास्त भी करना था — उन्होंने शत्रु की चाल को तत्काल समझ लिया और अपनी formation बदल दी। सेना को दो टुकड़ियों में बांट कर एक को इधर और दूसरी को उधर भेजा और bracket की भांति शत्रु को घेर लिया। गायें सुरक्षित निकल गईं, और जैसे ही वे पार हुईं, सेना ने आक्रमण कर दिया। इतिहास में लिखा है, उन्होंने कहा कि उस युद्ध में सालार मसूद का एक भी सैनिक नहीं बचा; और चित्तौरा की ताल के पास ही राजा सुहेलदेव ने स्वयं आक्रमणकारी का अंत कर दिया।

मातादीन भंगी और मंगल पांडे — भक्ति जाति से ऊपर है —
महाराजश्री ने १८५७ का प्रसंग उठाया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने शासन हाथ में लेकर सड़कें, कारखाने, बैंक और विद्यालय बनाए और ऐसा न्याय दिया जो जाति-बिरादरी देखकर नहीं होता था — इसलिए बहुत से लोग उनके मुरीद भी होने लगे। किन्तु उस समय मातादीन भंगी, जो कारतूस की factory में काम करते थे, मंगल पांडे के पास आए और बताया कि कारतूस पर गौ माता की चर्बी की polish की जा रही है और सैनिक उन्हें मुंह से खोलते हैं। सुनते ही मंगल पांडे ने समझ लिया कि इससे धर्म भ्रष्ट होगा और इनकार कर दिया। training के समय जब कारतूस खोलने का आदेश हुआ, तब उन्होंने आज्ञा पालन नहीं किया; commander ने पूछा तो उन्होंने कहा कि यह शर्त तो लिखाई ही नहीं गई थी कि धर्म भ्रष्ट होने पर भी आदेश का पालन करूंगा — यदि बताया गया होता तो हम हस्ताक्षर ही न करते। कहा-सुनी बढ़ी और मंगल पांडे ने गोली चला दी। court martial हुआ, मातादीन भंगी भी पकड़े गए, और दोनों को फांसी सुनाई गई।

महाराजश्री ने बताया कि पहली फांसी मातादीन भंगी को हुई — मंगल पांडे से पंद्रह दिन पहले — और सभी से पूछा कि उनका नाम कितने लोग जानते हैं। बहुत कम हाथ उठे। यदि १८५७ की क्रांति के नायक मंगल पांडे हैं, उन्होंने कहा, तो उनसे पंद्रह दिन पहले फांसी पर चढ़ जाने वाले मातादीन भंगी भी उस क्रांति के नायक हैं। यह एक पंडा, ब्राह्मण, और एक भंगी — किन्तु गौ माता के प्रति दोनों की भक्ति एक जैसी थी, और दोनों में कोई भी अनीति अन्याय सहन न कर सका, फंदे पर झूल गए। इसलिए, उन्होंने कहा, गौ माता हम सबकी माता है, हमारी सभी जातियों की माता है और हमारी एकता का प्रतीक है : जब तक गौ माता हमारे बीच है, हमें कोई तोड़ नहीं सकता — क्योंकि जब भाई-भाई लड़ते हैं, तब माता ही बीच में आकर समझाती है।

कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं —
महाराजश्री ने कहा कि उनका कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं है और वे किसी दल का पिछलग्गू बनकर यह कार्य नहीं कर रहे। ‘शंकराचार्य के अपने सिद्धांत हैं,’ उन्होंने कहा, ‘और उस सिद्धांत की रक्षा के लिए हम अपने दम पर उतरे हैं।’ उन्हें मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पद पर नहीं जाना है, उन्होंने कहा, क्योंकि उससे ऊंचे पद पर वे पहले से आ चुके हैं — और ऊंचे पद से उतरकर कोई नीचे के पद की आकांक्षा नहीं करता। न ही उनका पद पांच वर्ष का है कि आगे के लिए जुगाड़ करना पड़े — उनका पद तो जीवनपर्यन्त का होता है। उनकी चिंता केवल यह है कि सनातन धर्म की जो प्रतीक है, उसकी रक्षा हो और उसका अपमान सहन न किया जाए।

सामूहिक घोषणा —
तत्पश्चात महाराजश्री ने हाथ उठा कर समस्त जनसमुदाय से पंक्ति-दर-पंक्ति सामूहिक घोषणा करवाई, जिस पर सभी ने दोहराया — कि आज के शुभ दिन, बड़े प्रसन्न मन से, स्वस्थ चित्त से, बड़े उत्साह और बड़े गर्व से हम घोषणा करते हैं कि गाय पशु नहीं है, हमारी माता है; उत्तर प्रदेश की सरकार हमारी चेतावनी सुन ले और जल्द से जल्द हमारी गौ माता को पशु सूची से हटा कर राज्य माता के दर्जे पर बैठाए और उन्हें एक अच्छा protocol दे; और यदि उत्तर प्रदेश की सरकार ऐसा करने में सक्षम नहीं होती अथवा ऐसा नहीं करती, तो हम भली-भांति समझ लेंगे कि आने वाले चुनाव में हम उसको वोट देने वाले नहीं हैं। इसके पश्चात महाराजश्री ने पूछा कि कितने-कितने लोगों ने केवल उनके कहने से कहा और कितने-कितनों ने अपने मन से — सभी ने उत्तर दिया कि अपने मन से कह रहे हैं। बात तभी कहनी चाहिए, उन्होंने कहा, जब वह अपने मन में जंच जाए; किसी के कहने मात्र से नहीं।

Party line और हिंदुत्व का प्रश्न —
जो पूछते हैं कि दूसरे दल के लोग उनकी सभाओं में क्यों दिखाई देते हैं, उनसे महाराजश्री ने कहा कि पक्ष और विपक्ष राजनीति में होते हैं, और वे राजनीति में नहीं हैं — उनका कोई पक्ष नहीं; उन्होंने न किसी दल को आमंत्रित किया है और न किसी को आने से रोका है। उन्होंने तो, उन्होंने कहा, अपने पर्चे में यह कहा है कि जो जिस दल का व्यक्ति है, वह अपने दल का चिन्ह धारण करके आए — क्योंकि इससे बिना पूछे अंदाजा लग जाता है कि किस दल में कितने लोग अभी भी हिंदुत्व पर कायम हैं। ३५५ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में जाकर लाखों लोगों से मिलने के बाद, उन्होंने कहा, वे देख रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के, कांग्रेस के, आम आदमी पार्टी के और विभिन्न विकासशील दलों के हिंदू अभी भी गौ माता की रक्षा के लिए तत्पर हैं और party line तोड़कर आगे आ रहे हैं। हालांकि, उनके दल ने भी अभी तक राज्य माता या राष्ट्र माता की घोषणा नहीं की, किंतु फिर भी उनके कार्यकर्ता निकल-निकलकर आ रहे हैं। तो सत्तारूढ़ दल के लोग ही यह party line क्यों नहीं तोड़ पा रहे?

उन्होंने आज सवेरे की एक घटना सुनाई — जब यात्रा बाराबंकी से बहराइच में प्रवेश कर रही थी, तब एक वरिष्ठ नेता के स्वागत के लिए सड़क पर भीड़ खड़ी थी; शंकराचार्य जी की गाड़ी निकली तो उस भीड़ में खड़े एक व्यक्ति ने — ‘उसके भीतर का हिंदू जाग गया,’ उन्होंने कहा — अपने हाथ के फूल यात्रा पर बरसा दिए और ताली बजा दी; और तत्काल उसके नेता ने उसे डांट दिया। यदि कोई हिंदू अपने गुरु को देखकर फूल चढ़ा दे और उसे भी रोक दिया जाए, उन्होंने कहा, तो सोचिए ये लोग हिंदू धर्म को कहां ले जा रहे हैं।

क्षेत्रीय प्रतिनिधि — एक नोट अभियान एवं भव्य गोधाम —
महाराजश्री ने घोषणा की कि महसी विधानसभा क्षेत्र में एक नया गौतीर्थधाम बने — और वह क्षेत्र के लोगों द्वारा अपने-अपने जेब से दिए गए एक-एक नोट से बने। यह पैसा इकट्ठा करने के दृष्टिकोण से नहीं, उन्होंने बल देकर कहा, अपितु सबको जोड़ने के दृष्टिकोण से है; ₹१ का सिक्का भी चलेगा, किन्तु एक नोट सबकी जेब से आना चाहिए। यह गोधाम, उन्होंने समझाया, दूध के लिए नहीं बनाया जा रहा — दूध के लिए तो आप में से बहुत से लोग गाय की सेवा कर ही रहे हैं — और मांस के लिए तो हम सोच भी नहीं सकते। यह इसलिए बन रहा है कि जैसे आपके पूर्वज गौ माता का आशीर्वाद पाते थे, वैसे ही आपके वंशज फिर से पाने लगें। वहां बत्तीस लक्षण-सम्पन्न गौ माता को विराजमान कराकर उनकी ऐसी सुंदर सेवा की व्यवस्था बनाई जाएगी कि उनके रोम-रोम से आशीर्वाद निकलने लगेगा और सबको मिलने लगेगा।

समस्त जनसमुदाय की अनुशासित एवं कर्तव्यशील ध्वनि पर उन्होंने श्रीमान ठाकुर प्रसाद उपाध्याय जी को अपना क्षेत्रीय प्रतिनिधि नियुक्त किया — जो ‘एक नोट’ अभियान चलाएंगे, संकलित धनराशि से गोधाम बनाएंगे, वहां बत्तीस लक्षण-सम्पन्न गौ माता को आमंत्रित कर सेवा से प्रसन्न करेंगे और उनके रोम-रोम से निकला आशीर्वाद क्षेत्र के जन-जन तक पहुंचाएंगे। उन्होंने निर्देश दिया कि प्रत्येक नोट दर्ज किया जाए और एक भी नोट इधर-उधर न हो; और जब गोधाम बनेगा, तो उस गोधाम की दीवार पर सब दानदाताओं के नाम लिखे जाएंगे — एक रुपए देने वाले, दस रुपए देने वाले, सौ रुपए देने वाले।

पत्रकार वार्ता — अयोध्या, गौ-आश्रयों की दुर्दशा और असली सनातनी की परिभाषा —
पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए महाराजश्री ने कहा कि गाविष्ठि यात्रा का उद्देश्य उत्तर प्रदेश के समस्त ४०३ विधानसभा क्षेत्रों में जाकर मतदाताओं से सीधे संवाद करना और उन्हें गौ माता की रक्षा के लिए वोट देने की प्रेरणा देना है — और बात समझने के बाद बड़ी संख्या में लोग संकल्प ले रहे हैं कि इस बार कोई दूसरा मुद्दा उनके लिए नहीं होगा। अयोध्या प्रकरण पर उन्होंने दोहराया कि जिस सत्ता ने trust बनाया, उसी ने SIT भी बनाई — अर्थात् जांच करने वाले और जिसकी जांच होनी है, दोनों एक ही घर के हैं; यह बच्चों के चोर-सिपाही के खेल से अधिक कुछ नहीं और इससे कुछ निकलकर आने वाला नहीं। उन्होंने मांग की कि वर्तमान trust को भंग कर तीन trust बनाए जाएं — नीति-निर्माण के लिए देश के मूर्धन्य धर्माचार्यों का, दैनिक दिनचर्या के निर्वहन के लिए अयोध्या के प्रमुख संतों का, और निगरानी के लिए सरकार तथा संस्थाओं के प्रमुखों का।

₹२०० करोड़ के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि मामला उससे कहीं बड़ा है — जमीन की खरीद, निर्माण और अन्य मदों में हजारों करोड़ का है। गौ-आश्रयों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि पशुपालन मंत्री ने ₹२,००० करोड़ के बजट की घोषणा की, फिर भी जिन-जिन विधानसभाओं में वे गए हैं आश्रय केंद्रों में गौ माता की हालत खराब है — अर्थात् वह धन गाय तक पहुंच ही नहीं रहा। असली सनातनी की परिभाषा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि जो वेद को माने, जो शास्त्र को माने, जो गुरु को माने और जो सदाचारी हो। नाराजगी किससे है, इस प्रश्न पर उन्होंने कहा कि उनकी नाराजगी गाय को पशु कहने वालों से है। उन्होंने देश के मुसलमानों का अभिनन्दन भी किया, यह कहते हुए कि उन्होंने वह करके दिखाया जो अठहत्तर वर्षों में नहीं हुआ था — यह घोषणा कि हिंदू भाइयों को चोट लगती है इसलिए हम गाय को नहीं काटेंगे, और फिर उसे करके भी दिखाया, यहां तक कि बकरीद पर भी तमाम कमियां होते हुए एक भी ऐसा दृश्य सामने नहीं आ सका। उन्होंने यह भी कहा कि समूचे उत्तर प्रदेश के लिए उनका संदेश २४ जुलाई को लखनऊ में, कांशीराम जी की प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर दिया जाएगा।

सामूहिक संकल्प – चक्रधारी मुद्रा —
चक्रधारी मुद्रा के साथ हाथ उठाकर समस्त जनसमुदाय ने एक स्वर में संकल्प लिया : ‘आज के शुभ दिन, बड़े प्रसन्न मन से और बड़े गर्व से हम घोषणा करते हैं कि गाय पशु नहीं है — हमारी माता है। उत्तर प्रदेश की सरकार हमारी चेतावनी सुन ले और जल्द से जल्द हमारी गौ माता को पशु सूची से हटा कर राज्य माता के दर्जे पर बैठाए तथा उन्हें एक अच्छा protocol दे। और यदि ऐसा नहीं करते, तो समझ लें कि आने वाले चुनाव में हम उनको वोट देने वाले नहीं हैं।’ वैदिक मंत्र “अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ” का सामूहिक उच्चारण एवं “गौ माता की जय” तथा “हर हर महादेव” के उद्घोष के साथ सभा सम्पन्न हुई।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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