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भाई-चारा बनाए रखने का एकमात्र उपाय

admin 15 May 2022
Mob Lynching
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आप हिंदुस्तान के चाहे जिस भी शहर और जिस भी जगह क्यों न रहते हों लेकिन, जब आप उस जगह के बारे में घर के बड़े बूढ़ों से पूछोगे तो वे सब आपको बताएंगे कि जिस जगह आज बड़े बड़े शहर बसे हुए हैं और जो आज उस शहर का एक पॉश इलाका माना जाता है। आज से महज 40-50 साल पहले वो या तो जंगल था या फिर सुनसान इलाका था। साथ ही वे यह भी बताएंगे कि उस समय इस इलाके की जमीन कौड़ियों के भाव मिलती थी। और ये सब बहुत पुरानी नहीं बल्कि महज 40-50 साल पुरानी बात ही है।

अब इस बात की कल्पना करें कि जब आज से महज 40-50 साल पहले ही ये हालात थे तो, 100-200 या 500-700 वर्ष पहले जमीन की कैसी स्थिति रही होगी? शायद उस समय 30-40 किलोमीटर दूर-दूर पर गांव/शहर हुआ करते होंगे या फिर, इससे भी ज्यादा दूर-दूर।

तो इसमें समझने लायक बात है कि जब मुगलों का शासन रहा होगा (चाहे जितने भी भू-भाग में रहा हो और जितने भी समय के लिए रहा हो) उन्हें जमीन की भला क्या कमी होनी थी? क्योंकि ज्यादातर जमीन या तो खाली थे या फिर, वहाँ पर जंगल या खेत वगैरह थे।

अब इसमें मुख्य सवाल उठता है कि जब उनके पास इतनी सारी खाली जमीन उपलब्ध थी ही तो, आखिर उन मुगलों ने उतने सारे खाली जमीन को छोड़कर मंदिरों एवं हिन्दुओं के अन्य पूजा स्थल/महलों को को तोड़कर ही महजिद/मकबरा क्यों बनवा दिए?

क्योंकि ये सामान्य समझ की बात है कि एक निर्मित कंस्ट्रक्शन को तोड़कर उसी जगह पर कोई दूसरा कंस्ट्रक्शन बनाने से कहीं अधिक सुविधाजनक काम खाली प्लॉट पर अपना नया कंट्रक्शन खड़ा करना होता है।

मुफ्तखोर जनता : जैसा राजा वैसी प्रजा या फिर जैसी प्रजा वैसा राजा

लेकिन आखिर ऐसा क्यों नहीं किया गया! और इसका जबाब बहुत ही आसान है कि मुगलों और आक्रांताओं द्वारा महजिद/मकबरों का निर्माण किसी धार्मिक/मजहबी उद्देश्य से नहीं था बल्कि उन्होंने हिन्दुओं को उत्पीड़ित करने के लिए ऐसा किया! और, इसके मूल में उनका वो तथाकथित आसमानी किताब है जिसके अनुसार अगर कोई शांतिप्रिय बुतगाह को ध्वस्त करेगा तो उसको सबाब मिलेगा और वो गाजी कहलायेगा।

असल में वे हिन्दुओं के मंदिरों/स्कूलों/विश्वविद्यालयों आदि को तोड़कर एवं सेम उसी जगह पर अपनी पहचान स्थापित कर वे हिंदुस्तान से हम हिन्दुओं का अस्तित्व एवं हमारी सभ्यता-संस्कृति को मिटा देना चाहते थे ताकि, इसके बाद हर चीज उनके रंगों में रंग जाए!

ये बहुत कुछ ऐसा ही है कि कोई चुपचाप बैठ के पूरी-सब्जी खा रहा हो और दूसरा दुष्टता से आकर वहीं पर थूकने लगे। इसीलिए आज जिसे बैलेंसिंग भाषा में “विवादास्पद” कहा जा रहा है उसमें “विवादास्पद” लायक कुछ है ही नहीं। क्योंकि, वो सारी का सारी संपत्ति हिंदुस्तान के हिंदुओं की ही है और, मुगलों द्वारा खड़े किए गए हर ढांचे का मूल स्वरूप हिन्दू मंदिर /महल ही हैं।

भारत का पुनर्निर्माण चल रहा है

अतः इन मामलों में कोर्ट में केस करके फालतू का समय और धन की बर्बादी करने से बेहतर है कि केंद्र सरकार एक सामान्य सा कानून बना दे कि 100 साल से अधिक पुराने हर ऐतिहासिक महत्व के स्मारक/महल/महजिद/मकबरा आदि का वैज्ञानिक पद्धति से कार्बन डेटिंग एवं सेटेलाइट मैपिंग की जाएगी एवं जैसे जैसे हर एक स्मारक/महल/महजिद/मकबरा आदि का मूल निर्माता और मूल स्वरूप identify होता जाता है उसे, उसका एवं निर्माता का नाम बदल कर मूल स्वरूप में कर दिया जाए।

क्योंकि देश में भाई-चारा बनाए रखने का एकमात्र यही उपाय है। अन्यथा दोनों समुदायों के बीच ये लड़ाई जन्म-जन्मांतर तक चलती रहेगी क्योंकि, एक भी अतिक्रमण के मौजूद रहते एक अतिक्रमणकारी और जमीन मालिक के बीच में कटुता समाप्त होने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। सिवाए इसके कि अतिक्रमणकारी उस अतिक्रमण को हटा ले चाहे वो बात से हटाए या फिर लात से!

और, हाँ! जिन्हें लगता है कि वे ख त ना करवा लेने के बाद अचानक से विजेताओं के वंशज हो गए हैं। तो, उनकी जानकारी के लिए ये बता दूँ कि हम सनातनी हिन्दू खंडित चीजों को जरा भी भाव नहीं देते हैं और, हमलोग पूजा में भी अक्षत (अखंड चावल का दाना), पान (डंठल समेत) ही प्रयोग करते हैं, यहाँ तक कि हमलोग तो भगवान की खंडित प्रतिमा तक की पूजा नहीं करते हैं और उन्हें विसर्जित कर देते हैं।

फिर किसी ने ऐसा कैसे सोच लिया कि जो सनातनी समुदाय अपने आराध्य की खण्डित प्रतिमा तक को घर में नहीं रहने देता है। वो सनातनी समुदाय खंडित इंसानों के समुदाय को अपने सर पर चढ़ कर नाचने की इजाजत दे देगा? इसीलिए अब हर किसी को ये समझ आ जाना चाहिए कि वो समय चला गया जब गधे भी जलेबी खाया करते थे…!

अब हर चीज का हिसाब होगा और अगर हिसाब के डर से भागकर जमीन के भीतर भी छुप गए। तो भी… बुलडोजर से खोदकर निकाल लेंगे और हिसाब करेंगे..! क्योंकि अब हम न तो अपना एक ईंट छोड़ने वाले हैं और न ही एक इंच जमीन… चाहे, इसके लिए हमें सदियों तक इन आक्रमकारियों से क्यों न लड़नी पड़े।
– साभार

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