एक शंका होती है कि भगवान् ने हमें समय, समझ, सामग्री आदि सब कुछ तो दे दिया, पर स्वतन्त्रता क्यों दी? इस स्वतन्त्रता का हम सदुपयोग भी कर सकते हैं और दुरुपयोग भी कर सकते हैं; पाप भी कर सकते हैं और पुण्य भी कर सकते हैं; बन्धन में भी जा सकते हैं और मुक्ति में भी जा सकते हैं, सब कुछ कर सकते हैं। अतः जिससे हम अपना पतन कर लें, ऐसी स्वतन्त्रता भगवान् ने क्यों दी? इसका समाधान यह है कि अगर भगवान् मनुष्य को परतन्त्र बना देते तो मनुष्य-शरीर का कुछ महत्त्व ही नहीं रहता। उत्तम – से- उत्तम शरीर गाय का है, जिसका गोबर और गोमूत्र भी शुद्ध होता है; परन्तु वह भगवान का भजन-स्मरण नहीं कर सकती; क्योंकि वह केवल भोगयोनि है।
अगर भगवान् मनुष्य को स्वतन्त्रता नहीं देते तो वह भी सदा के लिये भोगयोनि बन जाता, कर्मयोनि या साधनयोनि नहीं बनता। भगवान् ने स्वतन्त्रता दी है अपना कल्याण करने के लिये। परन्तु हम अपना कल्याण न करके उस स्वतन्त्रता को दूसरे कामों में लगा देते हैं। इस प्रकार भगवान् से मिली हुई स्वतन्त्रता का दुरुपयोग तो हम करते हैं और उलाहना भगवान को देते हैं कि उन्होंने हमें स्वतन्त्रता क्यों दी! अगर भगवान् स्वतन्त्रता न देते तो हम पुण्य भी नहीं कर सकते। अशुभ काम नहीं कर सकते तो शुभ काम भी नहीं कर सकते। स्वतन्त्रता मुक्ति के लिये मिली है, बन्धन के लिये नहीं। शिवलिङ्ग पूजा करने के लिये होता है, पर उससे कोई अपना सिर फोड़ ले तो भगवान् शंकर क्या करें? इसलिये भगवान् ने कृपा करके हमें जो स्वतन्त्रता दी है, उसका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है। कोई कैसा ही प्राणी क्यों न हो, उसको भगवान् ने मुक्ति का पूरा अवसर दिया है।
मनुष्य को भगवान् ने दो चीजें दी हैं- भोग के लिये कर्म-सामग्री और मोक्ष के लिये विवेक। कर्म-सामग्री के साथ विवेक इसलिये दिया है कि मनुष्य को यह जानकारी रहे कि इन कर्मों से वह चौरासी लाख योनियों में तथा नरकों में जायगा, इन कर्मों से वह स्वर्ग में जायगा, इन कर्मों से वह पुनः मनुष्य जन्म में आयेगा और इन कर्मों से (कर्मों से सम्बन्धविच्छेद होने पर) वह सदा के लिये जन्म-मरण से छूट जायगा। अब इस विवेक का वह सदुपयोग करे या दुरुपयोग करे, इसमें वह स्वतन्त्र है।
भगवान् ने मनुष्य को कितनी स्वतन्त्रता दी है कि वह जिस- जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़े, उस-उस को ही प्राप्त हो जाता है। यह भगवान् की कितनी उदारता है! जो दयालु होता है, वह न्यायकारी नहीं हो सकता और जो न्यायकारी होता है, वह दयालु नहीं हो सकता। न्याय करने वाले को तो ठीक मर्यादा में चलना पड़ेगा। अगर वह दया करेगा तो ठीक मर्यादा में नहीं चल सकेगा। परन्तु यह अड़चन तभी आती है, जब कानून बनाने वाला निर्दयी हो । भगवान् तो अनन्त दयालु हैं; अतः उनके बनाये हुए कानून में न्याय भी है और दया भी! उनकी न्यायकारिता में दयालुता परिपूर्ण है और दयालुता में न्यायकारिता परिपूर्ण है। जैसे, अन्तकाल में मनुष्य भगवान् का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है तो वह भगवान् को प्राप्त हो जाता है और कुत्ते का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है तो कुत्ते की योनि को प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जितने मूल्य में कुत्ते की योनि मिलती है, उतने ही मूल्य में भगवान् की प्राप्ति हो जाती है- यह भगवान् के न्याय में भी महान् दया भरी हुई है।
जिस स्वतन्त्रता से नीच योनि मिल जाय, उसी स्वतन्त्रता से देवादि ऊँची योनि प्राप्त हो जाय, कल्याण हो जाय, मुक्ति हो जाय – यह भगवान ने कितनी विलक्षण स्वतन्त्रता दी है। जो अन्तकाल में किसी का स्मरण नहीं करता, प्रत्युत केवल ममता और अहंकार का त्याग कर देता है, वह भी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार भगवान् ने कल्याण की सामग्री देने में कोई कमी नहीं रखी है। प्रत्येक परिस्थिति में भगवान् की दया लबालब भरी हुई है! पुण्य के फल (अनुकूल परिस्थिति) में भी भगवान् की दया है और पाप के फल (प्रतिकूल परिस्थिति) में भी भगवान् की कृपा है’। अनुकूल परिस्थिति में साधन करने में सहायता मिलती है और प्रतिकूल परिस्थिति में पापों का नाश होकर कष्ट सहने की सामर्थ्य आती है। चाहे अनुकूल परिस्थिति आये, चाहे प्रतिकूल परिस्थिति आये, हमारा काम तो भगवान् के सम्मुख होकर उनका भजन करना है? और वह भजन तब होगा, जब हम दृढ़तापूर्वक एक उद्देश्य, लक्ष्य बना लेंगे कि हमें तो भगवान् की प्राप्ति ही करनी है। जैसा कि पार्वतीजी ने कहा है- जन्म कोटि लगि रगर हमारी।
– साधन-सुधा-सिंधु से
