विष्णु जी का आवेशावतार क्या है? | विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं?
अजय चौहान । क्या आप जानते हैं कि किसी भी युग के मध्य में और खासकर कलियुग के मध्य में भगवान विष्णु अलग-अलग प्रकार के उद्देश्यों से पाप और पापिया का अंत करने के लिए, कई बार पृथ्वी पर आते ही रहते हैं। दरअसल, साधारणतया हम इस बात को तो बहुत अच्छे से जान चुके हैं कि किसी भी युग के अंत में भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेकर दुष्टों का नाश करते हैं और फिर युग का अंत होते ही अपने धाम को चले जाते हैं।
दरअसल, श्रीगर्गसंहिता के पहले अध्याय में लिखा है कि मिथिला के राजा बहुलाश्व नारद जी से एक प्रश्न करते हैं कि धर्म, गऊ, सज्जन और संतों आदि की रक्षा के लिये भगवान् विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं? कृपया मुझे बताने की कृपा करें।
इस पर नारद जी राजा बहुलाश्व को बताते हैं कि – हे राजन् ! व्यास जी और अन्य मुनियों ने सर्वप्रथम अंशांश, अंश, आवेश, कला, पूर्ण और परिपूर्णतम- ये छ: प्रकार के अवतार बताये हैं। इनमें से छठा यानी – परिपूर्णतम अवतार साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण होते हैं। जबकि मरीचि आदि ‘अंशांशावतार’ और ब्रह्मा आदि ‘अंशावतार’ होते हैं। इसी तरह से कपिल एवं कूर्म इत्यादि ‘कलावतार’ और परशुराम आदि’ आवेशावतार’ कहे गये हैं।
इन छः अवतारों में से एक “आवेशावतार” की बात करे तो यह “कलावतार” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ ये है कि जब ईश्वर किसी विशेष कार्य को पूरा करने के लिए अपनी दिव्य शक्ति यानी दिव्य ऊर्जा को पृथ्वी के ही किसी जीव अथवा किसी आत्मा, या किसी भी व्यक्ति या वस्तु आदि में एकाएक “प्रवेश” करा देते हैं अर्थात “आवेश” करा देते हैं, तो उसे आवेशावतार कहा जाता है। और इसको एक कला के रूप में प्रयोग करते हैं इसीलिए इसे कला अवतार भी कहा जाता है।
आवेशावतार या कलावतार, यानी जिसमें ईश्वर की आत्मा का अंश प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती है। ये एक प्रकार से अस्थायी अवतार होते हुए भी शक्ति-संपन्न अवतार के रूप में होते हैं और वे अपने किसी भी साधारण और खास, दोनों प्रकार के भक्तों की रक्षा या फिर उनकी सहायता के लिए कहीं भी पहुंच जाते हैं। कलयुग में अक्सर हम लोग इसे एक चमत्कार के रूप में देखते हैं। कभी-कभी इस प्रकार के चमत्कार असाधारण और बहुत बड़े स्तर पर भी हो सकते हैं लेकिन साधारणतया ये चमत्कार कई सारे और कई प्रकार के हो सकते हैं।
असल में आवेशावतार का तात्पर्य ही ये है कि इसमें ईश्वर सीधे प्रकट नहीं होते हैं, बल्कि एक माध्यम का उपयोग करते हैं। और वह माध्यम कोई भी और कुछ भी हो सकता है। जैसे कि मित्र, भाई-बंधु, कोई पशु-पक्षी अथवा किसी निर्जीव वस्तु को भी वे आवश्यकता पड़ने पर वहां भेज सकते हैं या उसका रूप लेकर भी वे वहां पहुंच सकते हैं। इसमें एक स्पष्ट संकेत ये भी देखने को मिलता है कि अपने कार्य को करने के बाद वे उससे फिर से अलग भी हो जाते हैं। क्योंकि यह एक क्षणिक और अस्थाई अवतार ही होता है।
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कलावतार यानी आवेशावतार के अंतर्गत घटने वाले कई तरह के किस्से कहानियां हम अपने दैनिक जीवन में अक्सर सुनते हैं, देखते हैं या पढ़ते भी हैं और फिल्मों में तो इस तरह के कई दृश्य फिल्माए भी जाते हैं। जैसे कि आवश्यकता पड़ने पर कोई तिनके का सहारा बन जाता है। या फिर कोई किसी बड़ी दुर्घटना में भी बाल-बाल बच जाता है। इसका मतलब यही होता है कि आवेशावतार के रूप में ईश्वर वहां युग और धर्म को जानकर ही सहायता के लिए आते हैं और फिर अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आवेशावतार रूपी शक्ति केवल उन्हीं लोगों की सहायता के लिए आती है जो धर्म के लिए या धर्म के काम आते हैं अथवा भविष्य में उनसे कुछ विशेष कार्य करवाने होते हैं जैसे की यदि कोई बालक है, जिससे भविष्य में उन्होंने कुछ काम लेने होते हैं और उसके माध्यम से प्रयोजन सिद्ध करवाना होता है तो उसकी सहायता के लिए आवेशावतार अवतार सुरक्षा हेतु उसी के आसपास ही मंडराता रहता है या फिर एक विशेष और क्षेत्र बना कर रखता है।
इसके लिए कुछ विशेष सिद्धिप्राप्त संत, महात्मा, वेदपाठी ब्राह्मण, अथवा दिव्य शक्तियों में कुलदेवता, कुलदेवी या इसी प्रकार की कुछ अदृश्य दैवीय शक्तियां होती हैं जो इस प्रयोजन को या इस कार्यभार को संभालने का बीड़ा उठाते हैं या फिर उनको भी इसके लिए निर्देश प्राप्त होते हैं। हालांकि ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं जिनके लिए आवेशावतार को आना पड़ता है। क्योंकि जो भी घटनाएं घटती हैं वे प्रकृति में अपने समय के अनुसार ही घटित होती हैं, चाहे वे कैसी भी बड़ी से बड़ी अथवा छोटी से छोटी घटनाएं ही क्यों ना हो। इसलिए उन घटनाओं में आहत लोगों की सहायता के लिए विशेष तौर पर शक्तियों को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि ये सब प्रकृति के नियमों के अधीन ही घटित होते हैं। लेकिन उन घटनाओं में यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे उन्हें भविष्य में कुछ काम लेने हो तो उसको वह वहां से किसी ने किसी प्रकार से या माध्यम से जीवित या सुरक्षित निकाल लाते हैं।
उदाहरण के लिए देखें तो 12 जून 2025 को अहमदाबाद में हुई एक विमान दुर्घटना में जितनी भी सवारियां थी वे सब मारी गई लेकिन उनमें से एक व्यक्ति जीवित बच निकला। इसका मतलब हो सकता है कि भविष्य में उससे कोई विशेष कार्य सिद्ध करवाना हो। हालांकि इसके लिए हम यह कह सकते हैं कि उस व्यक्ति की आयु अभी पूर्ण नहीं हुई थी, या फिर यह एक इत्तेफाक था। लेकिन यदि भविष्य में उस व्यक्ति से कोई कार्य करवाना भी होगा तो वह कार्य ऐसा नहीं होगा जो सबके बीच में या सबके सामने होगा। हो सकता है कि कोई ऐसा कार्य हो जो गुप्त तरीके से कहीं ना कहीं कोई ना कोई कार्य सिद्ध करवाना हो।
लेकिन फिर भी यदि हम वर्तमान स्थिति में भी देखें तो इस पृथ्वी पर कम से कम ऐसे सैकड़ो लोग होंगे जिनके लिए आवेशावतार कहीं ना कहीं, किसी न किसी प्रकार से सुरक्षा कवच का कार्य कर ही रहा होगा। इसके अलावा सबसे अधिक वर्तमान में कल्कि अवतार को लेकर बहुत सी चर्चाएं हो रही हैं और “भविष्य मालिका” की भविष्यवाणियों पर भी लोग भरोसा कर रहे हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि संभव है कि कोई आवेशावतार एकाएक अपनी कला का प्रदर्शन करें और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने वालों को, अत्याचारियों को दुराचारियों को राजनेताओं को और धर्म का उपहास उड़ाने वालों को वे सबक सिखा कर समस्याओं का समाधान कर जाएं गौ माता की रक्षा करके, नदियों की स्वच्छता करके, प्रकृति में प्रदूषण कम करके, जंगलों को समाप्त करने वालों को दंड देकर के या उन पापियों को जड़ से समाप्त करके फिर अपने धाम को लौट जाए।
पौराणिक शास्त्रों में अगर हम आवेशावतार का उदाहरण देखें तो परशुराम जी के शरीर और आत्मा में प्रवेश करके श्रीहरि विष्णु ने कई बार मानवता के शत्रुओं का अहंकार चूर-चूर कर दिया और कई बार तो बड़े-बड़े योद्धाओं को भी समाप्त करने में कामयाब हुए। यानी यहां श्रीहरि विष्णु को न तो जन्म लेने की और न ही स्वयं आने की आवश्यकता हुई। इसी को आवेशावतार कहा जाता है और ऐसा वर्तमान कलियुग में कई बार और बार बार हुआ भी है और आगे भी होता ही रहेगा। लेकिन जिसको भी ईश्वर में आस्था होगी और उसके अस्तित्व पर विश्वास रहेगा वही व्यक्ति आवेश अवतार की सहायता प्राप्त करेगा, वरना तो इन अरबों लोगों में आपकी या हमारी कोई गिनती ही नहीं है।
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