– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वैसे इस विषय पर सार्वजनिक तौर पर बोलने को लेकर मैं कई सालों से धैर्य बनाए हुए था, किंतु अब मैं अधैर्य हो गया हूं, कारण; कभी-कभी आलोचना की धारा इतनी उफान मार जाती है कि सत्य की नींव हिलने लगती है। सोशल मीडिया की दुनिया में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज पर तीखे प्रहार हो रहे हैं। कोई उनकी राजनीतिक टिप्पणियों को धार्मिक मंच का दुरुपयोग बता रहा है, तो कोई उनके अयोध्या राम मंदिर विवाद पर रुख को ही उनके ‘शंकराचार्य’ पद के लिए अयोग्य ठहरा रहा है। किंतु हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही संत हैं, जो उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य हैं। आदि शंकराचार्य की परंपरा के वारिस। जैसा कि ज्ञात है कि अन्य शंकराचार्यों के आशीर्वाद में उनका अभिषेक हुआ है।
आदि शंकराचार्य की चार धाम: एक अनंत विरासत –
यह एक सत्य तथ्य है कि आदि शंकर ने अद्वैत वेदांत की नींव रखी और बौद्ध-जैन प्रभाव के बीच सनातन हिंदू धर्म की ध्वजा को चहुंदिशाओं में फहराया और उसे पुनरुज्जीवित किया। उनका एक योगदान भारत के चार कोनों में चार पीठों की स्थापना भी है! उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ, उत्तराखंड), पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा), दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पश्चिम में शारदा मणि द्वारका पीठ (गुजरात)। आाखिर आदि शंकर ने क्यों इन पीठों की स्थापना की होगी? इसका उत्तर साफ है; हिमालय से कन्याकुमारी तक वेदों की ज्योति जलाए रखने के लिए। प्रत्येक पीठ एक वेद का प्रतीक है- ज्योतिर्मठ ऋग्वेद, पुरी यजुर्वेद, द्वारका सामवेद, शृंगेरी अथर्ववेद। ये पीठ राजनीति से ऊपर हैं; भारत की सनातन हिन्दू धार्मिक एकता के स्तंभ हैं ये ।
चारों पीठों के शंकराचार्य एक-दूसरे को मानते हैं। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मुद्दे पर अधिकांश संत समाज एक मत है। इस मुद्दे पर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती की भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। स्वामी सदानंद सरस्वती ने स्पष्ट कहा कि किसी भी प्रशासनिक तंत्र को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं। शंकराचार्य परंपरा सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है, न कि किसी सरकारी आदेश या प्रमाणपत्र पर।
उन्होंने बताया कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का शृंगेरी पीठ में विधिवत अभिषेक हुआ है, जिसके वे स्वयं साक्षी रहे हैं। उनके अनुसार, यह धार्मिक प्रक्रिया पूरी तरह परंपरानुसार संपन्न हुई थी, इसलिए उनकी वैधता पर प्रश्न उठाना अनुचित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य हैं। इसके साथ ही स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना यह भी है कि उनके गुरु (स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज) ने केवल दो ब्रह्मचारियों को संन्यास प्रदान किया था। एक वे स्वयं और दूसरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। ऐसे में उनकी परंपरागत स्थिति स्वतः स्पष्ट है। तब प्रशासन द्वारा संतों की पहचान पर सवाल खड़े करना धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप के समान है, जो स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सम्मान क्यों? क्योंकि वे हमारी जड़ें हैं –
हमें उनका सम्मान क्यों करना चाहिए? पहला, परंपरा का सम्मान। आदि शंकराचार्य ने चार पीठ बनाए ताकि धर्म की ज्योति चारों ओर फैले। शास्त्र कहते हैं ‘नास्ति भूमिर्विवादेन’। लेकिन यह संत का विवेक था। ज्योतिर्मठ हिमालयी वेदों का केंद्र है, जहां शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य लिखा। स्वामी जी ने इसे जीवंत रखा, ऑनलाइन प्रवचन, युवा संन्यासी प्रशिक्षण। गो सेवा, चारो वेदों की देश भर में अनेक पाठ शालाएं, अथर्ववेद की सभी शाखाओं का संरक्षण, प्रकृति संरक्षण जैसे अनेक समाज व हिन्दू हित के कार्य उनके द्वारा आज किए जा रहे हैं, आलोचक भूलते हैं, कि अविमुक्तेश्वरानन्द जी ज्योतिर्मठ उत्तर के लिए ध्रुवतारा हैं।
सम्मान अनिवार्य क्यों? जड़ों की रक्षा –
सम्मान न करने का अर्थ परंपरा तोड़ना। पहला कारण: आदि शंकराचार्य का आदेश। चार पीठ एक हैं। दूसरा: उनका कार्यक्षेत्र। कुमाऊं-गढ़वाल की धार्मिक रक्षा, पर्यावरण संरक्षण। तीसरा: अन्य शंकराचार्यों का दृष्टिकोण। शृंगेरी ने 2023 में उनका आशीर्वाद लिया, पुरी ने संयुक्त बयान दिए। चौथा: संत जीवन। पदयात्राओं में वे पैदल चलते हैं, समाज जागृत करते हैं। गीता कहती है, ‘आचार्याणां अग्रणीर्भव’ आचार्यों का नेतृत्व स्वीकार्य करो।
आलोचना स्वागत है, लेकिन अपमान नहीं। कल्पना कीजिए, हिमालय में तपते संत को ट्रोलिंग। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को संत रहने दें। ज्योतिर्मठ की ज्योति बुझने न दें। यह हमारा धार्मिक कर्तव्य है।स्वामी जी इसकी आवाज हैं। अंत में यही कि बहस करें, परस्पर संवाद करें, किंतु सम्मान बनाए रखें। यह हिंदू धर्म की गरिमा है। आदि शंकराचार्य की भावना यही कहती है– विविधता में एकता। कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं, पूर्ण संतत्व का सम्मान। वास्तव में यही तो आज की आवश्यकता है।
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