आयुर्वेद के सुश्रुत श्रग्निवेश श्रादि प्राचीन श्राचार्यों ने आयुर्वेद को मोटे तौर पर आठ अङ्गों में विभक्त किया था। वे आठ अंग ये हैं – शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारतन्त्र, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र, वाजीकरणतन्त्र। इन आठों तन्त्रों का ज्ञाता ही पूर्ण वैद्य कहलाने के योग्य होता है। इन तन्त्रों का वर्णन अलग-अलग आचार्यों ने अलग-अलग ग्रन्थों में किया था। परन्तु दैवदुर्विपाक से बहुत से ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं होते। जो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, उनमें से सुश्रुतसंहिता एवं चरकसंहिता ही मूलग्रन्थ हैं । सुश्रुतसंहिता में मुख्यतः शल्यशास्त्र (Surgery) का ही वर्णन है। यद्यपि उत्तरतन्त्र में शालाक्य आदि का भी संक्षेप से वर्णन है।
चरकसंहिता का मुख्य प्रतिपाद्य विषय काय-चिकित्सा है। दोनों चिकित्साओं के लिये ही शरीर की रचना का यथार्थ ज्ञान होना श्रावश्यक है। इस रचना को दर्शाने के लिये ही दोनों ग्रन्थकारों ने शारीरस्थान का प्रवचन किया है। परन्तु इस स्थान का वर्णन दोनों में से किसने अच्छा एवं यथार्थ किया है; इस विषय में उक्ति है:- “शारीरे सुश्रुतः श्रेष्ठः” अर्थात् सुश्रुतसंहिता का शारीरस्थान सब से श्रेष्ठ है। अतएव सम्पूर्ण श्रायुर्वेद-विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इसे पाठ्य-त्वेन नियत किया गया है।
इस शारीरस्थान की हिन्दी टीका भी समुप- लब्ध होती है, परन्तु उससे विद्यार्थियों को उचित सन्तोष नहीं होता। श्रतएव प्रकाशक महोदयों ने एक नवीन समयोपयोगी एवं स्पष्ट अर्थ को जताने वाली व्याख्या लिखने के लिये मुझ से आग्रह किया। मैंने उनके कहने को न टालते हुए यथाशक्ति व्याख्या को सर्वाङ्गसुन्दर बनाने का प्रयत्न किया। मैं अपने प्रयत्न में सफल या असफल रहा इसका निर्णय करना सहृदय वैद्यों का कर्तव्य है। परन्तु ‘गच्छतः स्खलनं क्वाऽपि भवत्येव प्रमादतः’ के अनुसार प्रमादवश त्रुटियां अवश्य ही रह गई होंगी: उन्हें विश वैद्य स्वयं ही शुद्ध कर लेंगे और मुझे द्वितीय संस्करण को शुद्ध एवं सुचारु रूप में रखने के लिये उचित साहाय्य देंगे।
( यह दुर्लभ आलेख श्रायुर्वेदाचार्य जयदेव विद्यालङ्कार जी द्वारा लिखित और लाहौर से प्रकाशित (सुश्रुतसंहिता शारीरस्थानम् – Susruta Samhita Sarirasthana (An Old and Rare Book in Hindi) पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका से लिया गया है जिसका प्रकाशन २८ मार्च मार्च १९३२ में लाहौर से हुआ था। )