अजय सिंह चौहान | भविष्य पुराण के चौथे खण्ड के आठवें अध्याय में वर्णित एक कथा के अनुसार, द्वापर युग के एक विशेष कालखंड में जब हस्तिनापुर में राजा शान्तनु का शासन चल रहा था, वहां मेघशर्मा नामक एक द्विजश्रेष्ठ उत्पन्न हुआ था। वह अत्यंत ज्ञानी, धार्मिक तथा वेदधर्म परायण था। सदैव भक्ति में लीन रहते हुए, कृषिकार्य नित्य करके, वह उस उपार्जन के धन के दशमांश द्वारा सभी देवताओं की अर्चना नित्यप्रति भक्तिभावना से करता था।
उन्हीं दिनों, कुछ ऐसा हुआ कि राजा शान्तनु के शासन में पाँच वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। जबकि केवल उसी मेघशर्मा के एक कोस विस्तार वाले खेत में मेघ बरसते थे, वो भी तब जब आवश्यकता के अनुसार मेघशर्मा उन्हें आमंत्रित करता था। तब शेष हस्तिनापुर में कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी कि चारों तरफ हाहाकार मचने लगा और बाजार में एक मुद्रा के बदले एक ही द्रोण (द्रोण अर्थात दौना, नाप) अन्न मिलने लगा। जबकि केवल मेघशर्मा ही धन-धान्य से युक्त थे, क्योंकि उसके एक कोस विस्तार वाले खेत में ही मेघ बरसते थे इसलिए उसके पास अन्न की कमी नहीं हुई।
नगर की पीड़ित जनता राजा शान्तनु की शरण में गयी। उनका दुःख देखकर राजा भी दुःखित हो गये। साथ ही उन्हें मेघशर्मा के विषय में भी बताया गया। तब राजा शान्तनु ने द्विजश्रेष्ठ मेघशर्मा को बुलाकर कहा- हे द्विजप्रवर! आपको प्रणाम है। हे प्रिय ! आप मेरे गुरु हो जायें और इस समस्या का वैसे ही समाधान करें जैसे आप स्वयं के लिए करते हैं। मेघों को ऐसा आदेश प्रदान करें जिससे वृष्टि हो जाये।
राजा का यह वचन सुनकर मेघशर्मा ने कहा कि हे महाराज! यदि मेरे बताए वेदधर्म एवं वेदमंत्रों से पूजन करेंगे और उनके अनुसार चलेंगे तो मेघ अवश्य प्रसन्न होंगे और वर्षा भी करेंगे। तब राजा शान्तनु ने शीघ्रता से मेघशर्मा की बात को स्वीकार कर लिया।
इसपर मेघशर्मा कहने लगे- श्रावण मास के आरम्भ काल में 12 वेदपारंगत विद्वानों को बुलाकर सूर्यमन्त्र का एक लाख बार जप करायें। पूर्णिमा के दिन यजमान व्रती रहे तथा ब्राह्मणों द्वारा दशांश आहुति प्रज्वलित अग्नि को देकर विधिवत् तर्पण, मार्जन करायें तत्पश्चात् संतुष्ट तथा प्रसन्न होकर सुखी हो जायें।
राजा ने इसे सहर्ष स्वीकार किया तथा यथावत् सम्पन्न करके वेदज्ञ ब्राह्मणों को भोजन प्रदान किया। इससे सूर्यदेव प्रसन्न हो गये और मेघों से पृथिवी को आच्छादित करके घनघोर वर्षा की। उसी समय से राजा शान्तनु सूर्यव्रत परायण हो गये और महापुण्यवान् कहलाने लगे। वे अपने हाथों से जिसका स्पर्श करते, वह वृद्ध भी युवा हो जाता था। सूर्यदेव की कृपा से मेघशर्मा का भी यही गुण था।
इस प्रकार मेघशर्मा ने 500 वर्ष की आयु पर्यन्त तरुण तथा रोगरहित रहकर देहावसान होने पर सूर्य का तेज प्राप्त किया तथा सूर्यलोक को चले गये, जहां वे आज भी निवास कर रहे हैं और वहाँ से वे पुनः एक लाख वर्ष रहने के बाद ब्रह्मलोक को गमन कर जायेंगे।
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