एक तरफ़ जहां भाजपा के ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के प्रति सार्वजनिक मंचों से कालनेमि जैसे शब्दों का उपयोग करते हुए तीखे तेवर दिखाते रहे हैं, और उनके समर्थक सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य तक पर सवाल उठाते फिर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसी भाजपा के एक अन्य मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने आचरण से बता दिया कि सत्ता की ताकत बड़ी हो सकती है, लेकिन परंपरा और सम्मान उससे भी बड़ा होता है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने वर्ष 2027 में हरिद्वार में आयोजित होने वाले कुंभ मेले (अर्ध कुंभ) में शामिल होने के लिए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को जो पत्र लिखा है, जिसमें वे उन्हें न सिर्फ़ एक निमंत्रण दे रहे हैं बल्कि भारतीय परंपरा, मर्यादा और संतों के प्रति सम्मान का दस्तावेज़ भी दर्शा रहे है। धामी ने पत्र में शंकराचार्य जी को “परम पूज्यवर” कहकर संबोधित किया, उनके श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम किया और लिखा कि उनका पावन सानिध्य देवभूमि के लिए परम सौभाग्य एवं अनंत पुण्य का विषय होगा।
दिलचस्प बात तो यह है कि इससे पहले स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शंकराचार्य जी के चरणों में नमन कर उन्हें काशीवासी बता कर उनका आशीर्वाद ले चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना भी स्वाभाविक ही है कि यदि देश का प्रधानमंत्री शंकराचार्य का सम्मान करता है, यदि उत्तराखंड का मुख्यमंत्री उन्हें सनातन परंपरा का सर्वोच्च आचार्य मानकर आमंत्रित करता है, तो फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके प्रति इतनी कटुता और असहजता क्यों दिखाई देती है?
पुष्कर धामी की यह चिट्ठी उन लोगों के लिए भी एक जवाब मानी जा रही है जो समय-समय पर शंकराचार्य जी से “सर्टिफिकेट” मांगते रहे हैं या उनकी धार्मिक हैसियत पर सवाल उठाते रहे रहते हैं। धामी ने बिना एक शब्द बोले अपने और अपनी सरकार की तरफ से यह संदेश दे दिया कि सनातन धर्म की अटूट परंपरा में कुछ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संतों और शंकराचार्यों का सम्मान कम नहीं होना चाहिए, हालांकि पार्टी में इसको लेकर मतभेद भी है लेकिन पार्टी के आम हिंदू वोटर्स इससे प्रसन्न हैं।
मुख्यमंत्री धामी ने यह पत्र भले ही शंकराचार्य जी को लिखा हो, लेकिन उसका राजनीतिक संदेश बहुत दूर तक जाता दिख रहा है। कई लोगों का तो मानना है कि यह पत्र सत्ता के भीतर बैठे उन समस्त राजनीतिक दलों और लोगों के लिए भी एक आईना है जो आलोचना सुनते ही असहज हो जाते हैं। सम्मान और असहमति साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन अहंकार और मर्यादा का रिश्ता कभी नहीं बनता।
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