अजय चौहान । मेरे लिए यह एक आश्चर्य है कि श्रीगर्ग-संहिता में भी रामायण और महाभारत की तरह ही संपूर्ण जम्बूद्वीप का वही भौगोलिक विवरण विस्तारपूर्वक दिया गया है जिसको हम पौराणिक कथाओं में पढ़ते और सुनते आ रहे हैं, लेकिन फिर भी आज के लोग सहजता से विश्वास करना नहीं चाहते। जिस प्रकार से हमने आज की श्रीलंका को ही रावण की असली लंका मान लिया है उसी प्रकार से हमने पिछले कुछ दशकों से मात्र इस छोटे से भारत भू-भाग को ही संपूर्ण भारतवर्ष मान लिया है और इसी को जम्बूद्वीप भी स्वीकार कर लिया है। जबकि पौराणिक और तथ्यात्मक वास्तविकता आज भी बदली नहीं है बल्कि हमने स्वयं ही उसको छोटा मानना प्रारंभ कर दिया है।
सबसे पहले तो यहां यह जान लेना चाहिए कि पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथो में हम जिस जम्बूद्वीप का वर्णन पाते हैं उसका विस्तार कहां तक हुआ करता था। आजकल के लोग जम्बूद्वीप को केवल हिमालय से दक्षिण भारत के समुद्र तट और पश्चिम में सिंधु नदी से पूर्व में स्थित बंगाल की खाड़ी तक ही मानते हैं। जबकि इसकी वास्तविक सच्चाई यह है की यह जो संपूर्ण महाद्वीप है जिसमें आज का विशाल क्षेत्र वाला चीन, कोरिया, संपूर्ण रूस और भारत के इस हिमालय क्षेत्र के साथ-साथ पश्चिम में अरब सागर से शुरू होकर अफ्रीका, भूमध्य सागर, इंग्लैंड, फ्रांस, ग्रीस, स्वीडन, आयरलैंड, यूक्रेन और संपूर्ण यूरोप यानी जहां तक इस भूमिक्षेत्र के समुद्री किनारे हैं आदि को मिलाकर यह जम्बूद्वीप कहलाता है।
संपूर्ण जम्बूद्वीप में उस समय के कौन-कौन से देश, उनके शासक और वहां के प्रमुख तीर्थ, पर्वत, नदिया, पशु पक्षियों की प्रजातियां, हुआ करते थे और भारत भूमि से उनके क्या संबंध हुआ करते थे आदि के प्रमाण आज भी उसी प्रकार, और उसी आधार पर पाए जाते हैं। आज भी यदि कोई गूगल की मदद से थोड़ी-बहुत इतिहास और भौगोलिक जानकारियों को इन ग्रंथों के आधार पर एकत्र कर उनपर शोध करे तो बहुत कुछ ऐसा मिल सकता है जो भारत के प्राचीन इतिहास को पुनर्जीवित कर सकता है।

श्रीगर्ग-संहिता के विश्वजीत खण्ड के उनतीस और तीसवें अध्यायों में दिया गया है कि “रम्यक वर्ष” (यहां वर्ष का अर्थ है देश) पर विजय पाकर महाबली श्री कृष्ण कुमार प्रद्युमन सुमेरु पर्वत के पूर्व भाग में स्थित “केतुमाल वर्ष” में गए। इस स्थिति को यदि हम वर्तमान में देखते हैं तो यह आज के भारत की उत्तर पूर्व दिशा को दर्शाता है। जहां से चार नाम वाली “महापातक नाशिनी” गंगा (यूरोप में स्थित प्राचीन तीर्थ जिसको शास्त्रों में गंगा की तरह ही पवित्र माना गया है) प्रवाहित होती है। और आश्चर्य है कि यह चार नाम वाली नदी आज भी चार नामों के आधार पर ही बह रही है।
हालांकि समय और भाषाओं की उत्पत्ति के आधार पर वे नाम आज बदल चुके हैं लेकिन भौगोलिक स्थिति कभी नहीं बदलती। चार नाम वाली वही नदी आज यूरोप में डैन्यूब (Danube) नदी के नाम से जानी जाती है। हालांकि इस नदी के ये चारों ही वर्तमान नाम कब और किस आधार पर बदले गए हैं यह तो यूरोप के आधुनिक इतिहास इतिहास को पढ़कर ही पता चल पाएगा। वैसे तो यह नदी यूरोप के अलग-अलग और छोटे-बड़े कई देशों से होकर बहती है, लेकिन वहाँ की स्थानीय भाषाओं के आधार पर इसके आज भी चार ही प्रमुख नाम हैं जिनमें जर्मनी और ऑस्ट्रिया में इसको डोनॉउ (Donau), हंगरी में ड्यूना (Duna), क्रोएशिया, सर्बिया और बुल्गारिया में डुनाव (Dunav) और रोमानिया में डुनारेआ (Dunărea) कहां जाता है।
डैन्यूब नदी का उद्गम स्थल आल्प्स (Alps) पर्वत श्रृंखलाओं में से सबसे प्रमुख पर्वत को श्री गर्ग संहिता में साक्षात गिरिराज पर्वत की भांति एक पवित्र पर्वत की संज्ञा देखकर उसका नाम “नील पर्वत” (Blue mountain) बताया गया है। आल्प्स यूरोप की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध पर्वत श्रृंखला है। यदि यहां हम श्रीगर्ग संहिता को आधार मानते हैं तो माल्यावन गिरी का ही आधुनिक नाम आल्प्स पर्वत श्रृंखला होना चाहिए, क्योंकि इस दिशा में और कोई इतनी बड़ी और बर्फीली पर्वत श्रृंखला नहीं है।
इसी पर्वत श्रृंखला में से एक और प्रमुख पर्वत जो कि सदैव बर्फ से ढका हुआ रहता है वह “नील पर्वत” कहलाता है जो आज भी ठीक उसी प्रकार से नीला ही नजर आता है जबकि इसके आस-पास के अन्य पर्वत सफेद है। यहां किसी को विश्वास हो अथवा नहीं लेकिन, अपने चार अलग-अलग नाम से जाने जाने वाली इस नदी का उद्गम स्थल भी यही नील पर्वत अर्थात Blue mountain है जिसका उल्लेख हमारे शास्त्रों में प्रमुखता से दिया गया है।
यहां श्रीगर्ग-संहिता के विश्वजीत खण्ड के उनतीस और तीस और इकतीसवें अध्यायों में उल्लेखित और भौगोलिक दृष्टि से रम्यक वर्ष और “केतुमाल वर्ष” यानी प्राचीन रम्यक और केतुमाल वर्ष नाम के देश आज के जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी नाम के वही कुछ देश हैं जिनकी सीमाएं आल्प्स (Alps) पर्वत श्रृंखलाओं से लगी हुई है। साथ ही इससे हमको ये भी संकेत मिलता है कि ये सारे देश जिस प्रकार से आज छोटे-छोटे भू-भागों या छोटे आकार में बंटे हुए हैं, प्राचीन काल में भी इसी तरह से हुआ करते थे। गर्ग संहिता में आगे लिखा है कि माल्यावन गिरी के पास “मन्मथशालिनी” नामक पूरी (नगर) है जो अपने रत्नमय परकोटों और महलों से देवताओं की राजधानी (अमरावती) की भांति शोभा पाती है।
माल्यावन गिरी यानी आल्प्स पर्वत श्रृंखला के आसपास के इन देशों के लोगों के विषय में श्रीगर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के इकतीसवें अध्याय में लिखा है कि वहां के पुरुष कामदेव के समान कांतिमान हैं। उनकी अंग कांति शरद ऋतु के प्रफुल्ल नीलकमल के समान होती है और उनके नेत्र भी विकसित कमल दल की शोभा को लज्जित करते हैं। यहां की नवयौवना कामिनियां पीतांबर धारण करके फूलों के हार पहन कर मनोहर वेश में कन्दुक-क्रीडा (गेंद का खेल) किया करती हैं। यदि इतिहास देखें तो आज भी इस संपूर्ण क्षेत्र के देशों में फुटबॉल का ही खेल प्रमुखता से खेला जाता है। इसी प्रकार प्रद्युम्न जब केतुमाल देश में जाते हैं तो देखते हैं कि वहां के सभी लोग श्री मुरारी (श्रीकृष्ण) के यश का गुणगान करते हुए उनकी बाल लीलाओं का बखान कर रहे हैं और पूजन-कीर्तन आदि कर रहे हैं।
श्रीगर्ग-संहिता के विश्वजीत खण्ड के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने अपने नाना राजा उग्रसेन को पुनः राजा नियुक्त करवा दिया था। इसके बाद वे राजसूय यज्ञ करवाना चाहते थे, जिसके लिए उन्हें संपूर्ण जम्बूद्वीप पर विजय पाना आवश्यकता था। अतः उन्होंने द्वारका की अपनी सुधर्मा सभा में संपूर्ण यदुवंशियों एवं क्षत्रिय योद्धाओं को आमंत्रित किया और कहां की समरांगण में जो जम्बूद्वीप निवासी समस्त नरेशों को जीत सके वह इंद्र के समान धनुर्धर मनस्वी वीर सामने आये। इसके बाद स्वयं श्री कृष्ण के जेष्ठ पुत्र रुक्मणीनंदन प्रदुमन ने इस चुनौती को आदेश के रूप में स्वीकार किया और जम्बूद्वीप विजय के लिए निकल पड़े थे।
