दिल्ली, जिसे प्राचीन काल में खांडवप्रस्थ और बाद में इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था, भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं के संगम का केंद्र रही है। पांडवों द्वारा बसाई गई इस नगरी के अस्तित्व को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच हमेशा से गहरी दिलचस्पी रही है। पुराना किला वह स्थान है जिसे निर्विवाद रूप से पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ माना जाता है। यहाँ कई ऐसे साक्ष्य मिले हैं जो महाभारत काल की ओर इशारा करते हैं।
पुरातत्व विभाग की खुदाई- 1954-55 और फिर 1969-73 में बी.बी. लाल के नेतृत्व में हुई खुदाई में ‘पेंटेड ग्रे वेयर’ (च्ळॅ) यानी ‘चित्रित धूसर मृदभांड’ के अवशेष मिले। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये बर्तन महाभारत कालीन संस्कृति (लगभग 1000-1200 ईसा पूर्व) से संबंधित हैं। पुराना किला यमुना नदी के तट पर स्थित है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इंद्रप्रस्थ भी यमुना के किनारे ही बसा था।
पांडवकालीन पांच गाँवों का रहस्य –
पौराणिक तथ्यों के अनुसार, पांडवों ने युद्ध टालने के लिए दुर्योधन से पांच गाँव मांगे थे। दिल्ली और उसके आसपास के इन क्षेत्रों के नाम आज भी उनके प्राचीन अस्तित्व की गवाही देते हैं – इंद्रपत (वर्तमान पुराना किला क्षेत्र), बागपत (व्याघ्रप्रस्थ), सोनीपत (स्वर्णप्रस्थ), तिलपत (तिलप्रस्थ), पानीपत (पांडुप्रस्थ)। इनमें से इंद्रपत गांव 19वीं शताब्दी के अंत तक पुराने किले के भीतर ही स्थित था, जिसे बाद में अंग्रेजों ने स्थानांतरित कर दिया था।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पांडव काल के साक्ष्यों को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं-
साक्ष्य का प्रकार विवरण कालक्रम (अनुमानित)
मृदभांड चित्रित धूसर मृदभांड की 1200 – 800 ईसा पूर्व
उपलब्धता मौर्य काल
शिलालेख (अशोक के शिलालेख) के अवशेष भी 250 ईसा पूर्व
यहाँ मिले हैं, जो इस स्थान की प्राचीनता
सिद्ध करते हैं।
मिट्टी की परतें किले की खुदाई में सबसे नीचे की परतें उत्तर 1000 ईसा पूर्व से अधिक पुराना
वैदिक काल की ओर संकेत करती हैं।
यद्यपि आधुनिक दिल्ली में पांडवों के महल के भौतिक अवशेष (जैसे स्वर्ण द्वार या रत्न जड़ित दीवारें) नहीं मिले हैं, लेकिन मिट्टी के बर्तनों के साक्ष्य, भौगोलिक स्थिति और सदियों से चली आ रही मौखिक परंपराएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि पुराना किला ही प्राचीन इंद्रप्रस्थ का स्थल है। पुरातत्वविदों का तर्क है कि समय के साथ यमुना के मार्ग बदलने और बार-बार होने वाले निर्माणों ने प्राचीन संरचनाओं को नष्ट कर दिया होगा।
पुराने किले की खुदाई में मिले चित्रित धूसर मृदभांड भारतीय पुरातत्व के सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों में से एक हैं। ये केवल मिट्टी के बर्तन नहीं हैं, बल्कि उस कालखंड की तकनीक और जीवनशैली के जीवंत दस्तावेज हैं जिसे विद्वान ‘महाभारत काल’ से जोड़कर देखते हैं।
ये बर्तन अपने समय की ‘प्रीमियम क्राॅकरी’ माने जाते थे। इनकी बनावट साधारण बर्तनों से बिल्कुल भिन्न थी। ये बर्तन बहुत ही महीन और साफ मिट्टी से बने होते थे। इनकी दीवारें बहुत पतली और कागज जैसी होती थीं, जिसे श्म्हह.ेीमसस जीपदश् कहा जाता है। इनका रंग स्लेटी होता था, जो मिट्टी को एक विशेष तापमान पर ‘रिड्यूसिंग कंडीशन’ (बिना oxygen के पकाना) में गर्म करने से आता था। इन पर काले रंग से ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती थीं, जैसे – समानांतर रेखाएं, बिंदु, अर्धवृत्त, स्वस्तिक और चक्र आदि। मुख्य रूप से इन बर्तनों में थालियां और कटोरे मिले हैं, जिससे पता चलता है कि इनका उपयोग विशिष्ट भोजन परोसने के लिए किया जाता था।
कालक्रम और वैज्ञानिक आधार –
पुरातत्वविद बी.बी. लाल ने वर्ष 1950 के दशक में पहली बार यह स्थापित किया था कि च्ळॅ यानी चित्रित धूसर मृदभांड का संबंध उन स्थलों से है जिनका उल्लेख महाभारत में मिलता है (जैसे हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, कुरुक्षेत्र, मथुरा)।
इंद्रप्रस्थ और पुरातात्विक संबंध –
पुराना किला में हुई खुदाई के दौरान मृदभांड के अवशेषों का मिलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ने किले की मिट्टी की सबसे निचली परतों में मिला। इसका मतलब है कि दिल्ली की इस भूमि पर सबसे पहली संगठित बस्ती इसी संस्कृति के लोगों ने बसाई थी। साथ ही साथ लोहे के ऐसे हथियारों और उपकरणों के अवशेष भी मिले हैं जो महाभारत के युद्ध में लोहे के अस्त्रों के वर्णन से मेल खाता है। साथ ही कुछ जली हुई हड्डियों और अनाजों के अवशेष भी मिले, जो बताते हैं कि यहाँ के निवासी खेती और पशुपालन में उन्नत थे।
– अशोक चौहान