अजय चौहान । महर्षि महेश योगी निस्संदेह ट्रान्सेंडेंटल मेडिटेशन (भावातीत ध्यान – TM) को विदेशियों की नजर में लोकप्रिय बनाने वाले सबसे प्रभावशाली हिंदू आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे। हालाँकि, उसके बाद उनके जीवन और संगठन से जुड़े कई ऐसे विवाद और आरोप भी सामने आए हैं, जिन्हें अक्सर उनके आलोचक ‘काला सच’ या ‘विवादित पक्ष’ के रूप में देखते हैं, लेकिन सच तो सच होता है। असल में यह वो दौर था जब विदेशी षड्यंत्रकरियों के द्वारा सनातन धर्म से विपरीत और षड्यंत्रकारी स्तर के ऐसे कई छद्म धर्मगुरुओं की खोज कर उन्हें समाज के विरुद्ध खड़ा करने की योजना को अमल में लाया जा रहा था जिनमें से एक थे महर्षि महेश योगी और दूसरे थे आचार्य रजनीश। रजनीश षड्यंत्रकारियों के जाल में फंसने से बच गए थे, लेकिन इसका खामियाजा उन्हें मौत को गले लगाने से ही चुकाना पड़ा। जबकि महर्षि महेश योगी के मामले में उन्हें सफलता मिल गई और बदले में इन्हें भी मालामाल कर दिया। हाल ही में हुए अपस्टिन फाइल के खुलासों में महर्षि महेश योगी के एक नजदीकी दीपक चोपड़ा जो कि अब अमेरिका में रह रहे हैं को जिस प्रकार से सम्मिलित पाया गया है उससे साफ पता चलता है कि पश्चिम ने किस तरह से महर्षि महेश को भी फंसाया होगा।
सेक्स स्कैंडल और मिस फैरो का आरोप –
सन 1968 में, जब बीटल्स (The Beatles) बैंड ऋषिकेश के आश्रम में था, तब उन पर एक अमेरिकी गायिका , अभिनेत्री और समाजसेवी और एक अन्य महिला के साथ अनुचित व्यवहार करने का आरोप लगा था। हालाँकि, उन दावों की कभी कानूनी रूप से पुष्टि नहीं हुई लेकिन ऐसी खबरों के बाद ही बीटल्स ने अचानक आश्रम छोड़ दिया था। बाद में इस पर बहस होती रही कि यह सच था या सिर्फ अफवाह। लेकिन यहां से शुरुआत होती है एक ऐसी सामाजिक बहस की जो समाज में अच्छे और बुरे संतों को पहचान देने और उनका अनुशरण करने की और ध्यान केंद्रित किया जा रहा था।
‘कल्ट’ (Cult) की तरह काम करने का आरोप –
महर्षि महेश योगी के ही कुछ पूर्व अनुयायियों और आलोचकों का आरोप रहा है कि महर्षि का संगठन एक “कल्ट” की तरह काम करता था। आरोप है कि यह संस्था लोगों को अपने जाल में फंसाती थी, पैसे वसूलती थी और अनुयायियों को परिवार व समाज से अलग कर देती थी। दरअसल, “कल्ट” (Cult) का मतलब एक बड़े धार्मिक समुदाय से निकल कर किसी बड़े षडयंत्र के तहत या फिर अपनी स्वयं की अहंकारपूर्ण मान्यताओं को स्थापित करने की जिद को पंथ, संप्रदाय, मत, या उपासना आदि कहा जाता है, जो किसी छोटे धार्मिक समूह, किसी व्यक्ति या चीज़ के प्रति अत्यधिक जुनून या सनक को दर्शाता है। यही कारण है कि कल्ट को एक बड़े समुदाय से जोड़कर नहीं देखा जाता। इसीलिए भारत में ऐसे कई संत हुए हैं जिन्होंने शंकराचार्यों से सहायता तो ली किंतु बाद में अपना अपना कल्ट चलाया और आज भी ऐसे सैकड़ों व्यक्ति हैं जो सनातन के मूल से निकल कर सनातन को ही बदनाम कर रहे हैं।
महर्षि महेश योगी के जन्म का नाम महेश प्रसाद वर्मा था जो 12 जनवरी 1917 को मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास एक छोटे से गाँव में हुआ था। उन्होंने 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। संभवत इसीलिए उन्होंने आम लोगों के मनोविज्ञान को अच्छे से समझ लिया था, क्योंकि उनका बौद्धिक मन उनके गहरे आध्यात्मिक स्वभाव से संतुलित था।
महर्षि महेश योगी को शंकराचार्य परंपरा में अद्वैत वेदांत से भी जोड़ कर देखा जाता है। क्योंकि उन्होंने इस परंपरा के सर्वोच्च संतों में से एक के सानिध्य में (1941-1953) शिक्षा प्राप्त की और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती (जिन्हें ‘गुरु देव’ कहा जाता था) के परम शिष्य थे। यानी इसके अनुसार तो महर्षि महेश योगी को भी परंपरागत गुरुदीक्षा से ही सनातन का प्रचार करना चाहिए था। लेकिन वे मार्ग से भटक गए, या यूं भी कह सकते हैं कि विदेशियों ने उन्हें भटका दिया। तभी तो उन्होंने भी एक कल्ट स्थापित कर दिया।
हालांकि विदेशियों की नजर में वे भारतीय संत ही थे, क्योंकि वे भारत से आते थे और भारत से आने वाला कोई भी संत हिंदू संत ही कहलाता है। यानी आज भी यदि देखा जाए तो ऐसे सैकड़ो ही नहीं हजारों संत हैं जो उन विदेशियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं। क्योंकि वास्तव में तो ये संत फ़िलोसफर होते हैं, ना की मूल और वास्तविक धर्म का प्रचार करने वाले। स्वामी विवेकानंद ने भी धर्म का प्रचार नहीं किया था बल्कि फिलॉसफी के दम पर स्वयं को स्थापित किया था जिसमें पश्चिम ने उनकी सीधे-सीधे सहायता की और स्वामी बनकर स्थापित कर दिया था। अर्थात, किसी को भी उसके कल्ट के आधार पर धर्म का ज्ञात नहीं कहा जा सकता, फिर चाहे उन्हें धर्म का कितना ही ज्ञान क्यों ना हो। स्वयं पश्चिम भी इसी थ्योरी पर काम करता है। और क्योंकि महर्षि महेश योगी ने भी परंपरा से विरुद्ध कार्य किया इसलिए वे सनातनद्रोही अथवा शंकराचार्य परंपरा के विरुद्ध ही हुए। जबकि शंकराचार्य परंपरा आज भी धर्म से विरुद्ध ऐसा कोई भी आचरण अथवा कार्य नहीं करती और न ही किसी को अनुमति देती है जिससे सनातन की हानि हो। इसीलिए छद्म और तथाकथित धर्माचार्य तो हर तरफ दिखाई देते हैं जबकि मूल शंकराचार्य परंपरा से जुड़े हुए संत बहुत ही कम दिखाई देते हैं।
महर्षि महेश योगी द्वारा शिक्षा का प्रसार –
यहां मूल रूप से एक और बात ध्यान देने योग्य है कि गुरुदेव की मृत्यु के बाद, महर्षि महेश योगी ने उनके विचारों और ‘भावातीत ध्यान’ तकनीक का दुनिया भर में प्रचार तो किया लेकिन उसमें अपनी परंपरा को नहीं बल्कि स्वयं को आगे रखा। क्योंकि वे स्वयं भी जानते थे कि जिस क्षेत्र में वे कदम रख रहे हैं वहां शंकराचार्य परंपरा उन्हें रोक सकती है या विरोध कर सकती है, इसलिए उन्होंने परंपरा के विरुद्ध अपना नया “आध्यात्मिक कल्ट” शुरू कर दिया। क्योंकि यहां उन्हें बहुत से झूठ बोलने थे, बहुत से लोगों को मूर्ख बनाना था और बहुत से नए षडयंत्रों को भी जन्म देना था। और इसमें उन्हें जिन लोगों का सहयोग और साथ मिल रहा था वे ऐसे षड्यंत्रकारी थे जो भारत को और भारत के मूल धर्म को नष्ट करने के लिए ही कार्य कर रहे थे। असल में इसके माध्यम से भारत में बड़े पैमाने पर एक बड़े भूभाग पर कब्जा करना था। और किसी भी प्रकार से भारत में षडयंत्रों की बहार लाई जाए ऐसा सोचा था। क्योंकि उन दिनों भारत में कांग्रेस शासित सरकार थी और रूस का दबदबा था। जिसको तोड़ने के लिए अमेरिका ने ऐसे बहुत से लोगों को हायर किया हुआ था जो कांग्रेस और रूस दोनों की शक्ति के साथ-साथ शंकराचार्य परंपरा की शक्ति को भी कम कर सके। इसमें शंकराचार्य परंपराओं को भी कई बार लालच दिए गए लेकिन वह धर्म से अधिक नहीं हुई इसलिए उन्हें ऐसे कई संतों की तलाश थी जो धीरे-धीरे पूरी होती है।
योगिक फ्लाइंग (Yogic Flying) के दावे:
महर्षि महेश योगी ने भावातीत ध्यान का एक ऐसा उन्नत चरण खोजने का दावा किया था जिसके द्वारा ‘योगिक फ्लाइंग’ का नाम दिया गया। यानी की जिसमें लोग ध्यान के माध्यम से हवा में उड़ने का अनुभव कर सकते हैं। साधारण भाषा में कहें तो इसे आध्यात्मिकता से हटकर शारीरिक तौर पर होपिंग अथवा फुदकने जैसा माना जा सकता है। इसे आलोचकों ने “छद्म विज्ञान” (Pseudoscience) और केवल “होपिंग” (मेंढक की तरह उछलना) बताया है, न कि वास्तव में उड़ना। लेकिन वास्तव में तो ये शब्द भी एक ऐसे षड्यंत्र का हिस्सा थे जिनको इन्होंने स्वयं नहीं बल्कि जो लोग इन्हें चला रहे थे उन्होंने ही दिया था की आपको ऐसा करना है। और फिर इसी के माध्यम से अमेरिकियों का इरादा था कि आगे चलकर पश्चिमी जगत में हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया जा सके, और वे इसमें कामयाब भी हुए। क्योंकि महर्षि महेश योगी उस योगिक फ्लाइंग क्रिया को हकीकत में नहीं दिखा सके और उल्टा उसके माध्यम से अपना साम्राज्य खड़ा करने में सफल रहे।
बीटल्स का मोहभंग और ड्रग्स के आरोप:
बीटल्स के जॉन लेनन और जॉर्ज हैरिसन के आश्रम छोड़ने के पीछे की कुछ विशेष वजहों में से एक यह भी बताई जाती है कि उन्हें लगा कि महर्षि आध्यात्मिक कम और व्यावसायिक ज्यादा हो गए हैं। जबकि कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि महर्षि को बीटल्स द्वारा ड्रग्स यानी नशीले पदार्थों का सेवन करना पसंद नहीं आया था, इसलिए जॉन लेनन और जॉर्ज हैरिसन को आश्रम छोड़ने के लिए कहा गया।
वित्तीय और प्रशासनिक विवाद –
महर्षि महेश योगी के बारे में कहा जाता है की उन्होंने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया था। उनके संगठन पर विश्वविद्यालय प्रबंधन में नियमों के उल्लंघन और गलत दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं। इसके अलावा भारत के कई राज्यों और जिलों में उन्होंने आध्यात्मिक कार्यक्रमों और आश्रमों के नाम पर कुछ प्रमुख शहरों और कस्बों में भूमि हथिया ली थी।
हालांकि यह कहा जा सकता है कि महर्षि महेश योगी एक जटिल व्यक्तित्व थे और अपने व्यक्तित्व के माध्यम से उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार करना चाह लेकिन कहीं ना कहीं उनके आसपास की दुनिया ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और उनके विरुद्ध कई षड्यंत्र भी रचे गए। लेकिन यह भी सच है कि जहाँ एक ओर, उन्होंने दुनिया को परंपरागत प्राचीन भारतीय मेडिटेशन और ज्ञान से जोड़ने का प्रचार किया वहीं उनके माध्यम से अरबों डॉलर का साम्राज्य भी खड़ा किया गया। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके ऊपर यौन व्यवहार, पैसे की लत, और मनोवैज्ञानिक हेरफेर (Manipulation) के गंभीर आरोप भी लगे।
असल में यह सब इसलिए संभव हो जाता है क्योंकि जब कोई व्यक्ति स्वयं के द्वारा एक नया कल्ट तैयार करने की कोशिश करता है तो उसके आसपास की दुनिया उसको पहचान लेती है कि यह व्यक्ति धर्म से विमुख होकर एक नए धर्म की स्थापना करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में वे लोग अवसर का लाभ लेकर उसे बदनाम करने का भी प्रयास करते रहते हैं और अपनी झोली भरते रहते हैं, और संभवतः यही महर्षि महेश योगी के साथ भी हुआ है।