Narendra Modi drinking charanamrit from a spoon
कभी सोचा है कि आखिर क्यों हमारे शंकराचार्य BJP RSS VHP आदि का विरोध करते है? शंकराचार्य परंपरा क्या हैं पहले यह भी समझने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन ये बात तुम तब तक नही समझ पाओगे जब तक आप BJP-RSS के चंगुल में हो। अन्ध भक्त और चमचे दोनों ही प्रजाति आवेश में आकर हमारे पूज्य शंकराचार्यो को कांग्रेसी भी कह देते है। कभी यह भी तो समझने का प्रयास कीजिये कि आखिर शंकराचार्यों को संघ से दूरी क्यों बनानी पड़ती है? आकलन तो करो की आखिर ऐसी कोई तो समस्या होगी ही आरएसएस में जिसके कारण शंकराचार्य जी उनसे दूर रहते हैं?
सोचिये की जब BJP-RSS के द्वारा हर समय शास्त्रों का विरोध, परम्पराओं का विरोध, धार्मिक मर्यादाओं का विरोध, सामाजिक मर्यादाओं का विरोध, वर्ण व्यवस्था का विरोध और विधर्मियो का समर्थन करने की बातें होती रहती हैं तो ऐसे में हमारे शंकराचार्य जी भला क्यों करेंगे तुम्हारी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन?
मान लिया की यदि स्वरूपानंद सरस्वती जी कांग्रेसी थे तो अन्य दो पीठ शंकराचार्य कभी बीजेपी के पक्ष में क्यों नहीं बोलते? क्या वे भी कांग्रेसी हैं? और ऊपर से आप ऐसा हिन्दू सम्मेलन करोगे की उसमें शंकराचार्यों को बुलाने के बजाय विधर्मी दलाई लामा को बुलाकर बिठाओगे तो कोई शंकराचार्य क्यों देंगे आपको समर्थंन?
अब यह प्रकरण ध्यान से पढ़िए –
एक बार विहिप ने चारों शंकराचार्यों को अपनी एक धर्म सभा में निमन्त्रण दिया, जो कि विहिप द्वारा आयोजित एक धर्म मंच था वाराणसी या प्रयाग में । और उस धर्म मंच का मुख्य वक्ता बनाया गया दलाई लामा को। वह दलाई लामा जो बौद्धों के वामपंथी पन्थ का प्रमुख है दक्षिणपंथ का भी नहीं। वह बौद्ध मत जिसका मुकाबला करने और समाप्त करने में आदिगुरु शंकराचार्य जी ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
पूज्य शंकराचार्यों को दूरभाष द्वारा सूचित किया गया औपचारिकता पूरी हो गई, उन्हें बताया भी नही गया कि बौद्ध दलाई लामा भी उपस्थित होकर मंच की अध्यक्षता करेगा। परन्तु जब प्रिंटेड निमन्त्रण पत्र पहुंचा तो सभी शंकराचार्यों को अपमान महसूस हुआ, ततपश्चात सभी शंकराचार्यों ने आपस में वार्तालाप कर आपसी सहमति से विहिप के उस धर्म-मंच में न जाने का निर्णय लिया।
कोई भी शंकराचार्य नही गए और सभी ने उस मंच का boycott कर दिया। RSS-VHP ने इज्जत बचाने हेतु चार नकली शंकराचार्यों को वहाँ बैठा लिया। और फिर आज का दिन है जब आरएसएस ने अब तक कोई 50 से अधिक ऐसे नकली शंकराचार्य खड़े कर दिए हैं जिनका धर्म से या शास्त्रों से कोई नाता नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार एक नकली शंकराचार्य को अपने साथ अमेरिका लेकर गए और सबको कहते रहे कि ये पूरी के शंकराचार्य हैं ।
ज़रा सोच कर देखिये कि, इस्लामी आक्रांताओं ने भी कभी प्रत्यक्ष रूप से हमारी शंकराचार्य परम्परा के साथ टकराव का प्रयास नहीं किया। जबकि नागा अखाड़े उन दिनों हिन्दू राजाओं की ओर से युद्धों में भाग लेते रहते थे। अंग्रेजों ने भी स्वयं या सीधे कभी शंकराचार्य परम्परा से छेड़छाड़ नहीं की और न ही ऐसा अपमान किया था। कांग्रेस ने भी कभी शंकराचार्य परम्परा से इस प्रकार से छेड़छाड़ नहीं की जैसी RSS और BJP के द्वारा की जा रही है।
आज तो अपनी राजनैतिक दूकान का एकछत्र राज स्थापित करने हेतु संघ द्वारा स्थापित देश में लगभग 150 से अधिक ऐसे नकली स्वयंभू शंकराचार्य और जगतगुरु आदि खड़े कर दिए गए हैं जो न तो ठीक से शास्त्रों को जानते हैं और न ही परम्परों को मानते हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब संघ का एक वरिष्ठ बुजुर्ग कसाई साईं बाबा प्रकरण में शंकराचार्य जी को ही धर्म के विषयों में हस्तक्षेप न करने का बयान दे डालता है।
आश्चर्य तो इस बात का है कि स्वयं तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक नकली शंकराचार्य को अपनी अमेरिका यात्रा में साथ ले जाकर एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में उसका पूरी पीठ के शंकराचार्य के रूप में परिचय करवा दिया था। जबकि उसी प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में एक पत्रकार ने उनसे पूछ लिया था कि पूरी पीठ के शंकराचार्य तो निश्छलानंद सरस्वती जी हैं जो इस समय भारत में ही हैं और सबसे बड़ी बात ये भी है कि एक दण्डी सन्यासी को तो विदेश यात्रा सदैव निषेध रहती हैं। तो फिर ये यहां कैसे?
जुलाई 2014 में पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी जब दिल्ली पधारे तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत उनसे मिलने पहुंचे। शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी ने उनसे उस समय स्पष्ट कह दिया कि आपने हमारे सामने 150 नकली शंकराचार्य खड़े किये हैं। यदि हमने भी तुम्हारी तरह ही 4 अन्य मोहन भागवत खड़े कर दिए तो तुम संघ नहीं चला पाओगे। सोचिये कि क्या यही है इन राज नेताओं और पार्टियों की हिंदूवादी विचारधारा जो सनातन को ही हानि पहुंचाना सबसे बड़ा काम समझ रहे हैं? ऐसे में भला शंकराचार्य परंपरा और हिन्दू कैसे आरएसएस और बीजेपी का साथ दें?
साभार – पंडित राजकुमार मिश्र जी की वाल से