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माता सरस्वती का सबसे प्राचीन मंदिर | Oldest temple of Mata Saraswti

admin 18 February 2023
Ganga Saraswati Mandir_Telengana_1

वर्तमान गंगा सरस्वती मंदिर की संरचना का निर्माण चालुक्य राजाओं के द्वारा करवाया गया था।

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दक्षिण भारतीय राज्य तेलंगाना के निर्मल जिले में एक कस्बा है बसारा। बसारा कस्बा महाराष्ट्र राज्य की सीमा से लगा हुआ है और पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित है और इसी कस्बे में है ज्ञान की देवी माता सरस्वती का एक ऐसा अति प्राचीनकाल का मंदिर जिसकी महिमा अद्भुत और दिव्य है। यह इतना प्राचीन मंदिर है कि द्वापर युग ही नहीं बल्कि त्रेता युग से भी पहले से यह मंदिर यहाँ स्थापित है। माता सरस्वती के इस मंदिर को दुनियाभर में  “श्री गंगा सरस्वती मंदिर” के नाम से पहचाना जाता है।

प्राचीन बसारा कस्बे और इसमें स्थित “श्री गंगा सरस्वती मंदिर” के विषय में पौराणिक मान्यतायें और किवदंतियां हैं कि – महाभारत ग्रंथ के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी जब कुछ दुविधा और मानसिक उलझनों के दौर से गुजर रहे थे तो उन उलझनों से छुटकारा पाने तथा आत्मिक और मानसिक शांति की खोज में अपने शिष्यों सहित तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े।

अपनी उस तीर्थ यात्रा के दौरान वे दक्षिण भारत के इस बसारा नामक गाँव पहुँच गए जो आज भी पवित्र गोदावरी नदी के तट पर प्रकृति की गोद में स्थित है। गोदावरी नदी के तट के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर वेद व्यास जी ने कुछ दिन वहीं बिताने का निर्णय लिया और पास ही के एक स्थान पर ध्यानमुद्रा में बैठ कर ईश्वर का ध्यान लगा लिया।

Ganga Saraswati Mandir_Telengana_2
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर अनादिकाल से ही माता सरस्वती का मुख्य निवास स्थान रहा है।

हालाँकि स्थानीय दन्त कथाओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि माता सरस्वती के इस मंदिर की स्थापना महाभारत ग्रंथ के रचयिता वेद व्यास जी ने नहीं, बल्कि यह मंदिर तो उनसे भी पहले, यानी त्रेता युग के समय में “रामायण” के रचियता महर्षि वाल्मीकि जी के इस स्थान पर आने से भी पहले से स्थापित हुआ करता था।

महर्षि वाल्मीकि ने यहां आकर माता सरस्वती से आशीर्वाद प्राप्त किया था और उसी के पश्चात रामायण की रचना की थी। यानी कि यदि हम स्थानीय दन्त कथाओं और कुछ पौराणिक मान्यताओं को आधार माने तो माता सरस्वती का यह मंदिर द्वापर युग में नहीं, बल्कि त्रेता युग में जन्में भगवान राम से भी पहले स्थापित हुआ था।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज जिस स्थान पर यह मंदिर और यह बसारा गाँव है अनादिकाल से ही यह स्थान माता सरस्वती का मुख्य निवास स्थान रहा है और उस काल में यह सम्पूर्ण क्षेत्र दंडकारण्य वन क्षेत्र कहलाता था. कहा जाता है कि बसारा नाम का यह वही कस्बा है, जिस स्थान पर माता सरस्वती का मंदिर स्थापित है। ठीक इसी स्थान पर वेद व्यास जी ने भी ध्यान साधना की थी, और इसी स्थान पर उन्हें अपने महाभारत ग्रन्थ की रचना करने की प्रेरणा मिली थी।

Ganga Saraswati Mandir_Telengana_3
इस मंदिर में छोटे बच्चों को प्रारंभिक विद्या अध्ययन, अक्षर ज्ञान और आराधना प्रारंभ कराने से पहले यहाँ अक्षराभिषेक कराने के लिए लाया जाता है।

इस अतिप्राचीन मंदिर में प्रति वर्ष वसंत पंचमी और नवरात्रि जैसे उत्सवों को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा सनातन संस्कृति और स्थानीय रीति रिवाजों के अनुसार छोटे बच्चों को प्रारंभिक विद्या अध्ययन, अक्षर ज्ञान और आराधना प्रारंभ कराने से पहले यहाँ अक्षराभिषेक कराने के लिए लाया जाता है, अर्थात बच्चे को, जीवन के पहले अक्षर का लेखन यहाँ करवाया जाता है। इसके बाद प्रसाद के रूप में हल्दी का लेप भी बांटा जाता है। संभवतः वर्तमान समय में सनातन परम्परा का यह प्राचीन ‘अक्षर ज्ञान’ पर्व इस मंदिर के अलावा, अब अन्य किसी भी दूसरे स्थान पर मनाये जाने के कोई प्रमाण देखने को नहीं मिलते।

इतिहासकारों का मानना है कि वर्तमान गंगा सरस्वती मंदिर की संरचना का निर्माण चालुक्य राजाओं के द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर संरचना की एक अनूठी बात यह है कि इसके एक स्तंभ से संगीत के सातों स्वर सुने जा सकते हैं। इसके अलावा मंदिर का गोपुरम, गर्भगृह और परिक्रमा मार्ग आदि बहुत ही आकर्षक, नक्काशीदार और सुंदर है। स्थानीय बसारा गांव में ऐसे आठ प्राचीन तीर्थ कुंड यानी तालाब भी हैं, जिनमें वाल्मीकि तीर्थ, विष्णु तीर्थ, गणेश तीर्थ, पुथा तीर्थ आदि मुख्य हैं।

इस मंदिर की कुछ प्रमुख विषेशताओं में से एक यह है कि इसमें माता सरस्वती जी की प्रतिमा 4 फुट ऊंचाई वाली है जो पद्मासन मुद्रा में दर्शन देतीं हैं, जबकि पास ही में माता लक्ष्मी जी की प्रतिमा भी विराजमान है। ये प्रतिमाएं कितनी प्राचीन हैं इस बारे में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

मान्यता है कि वनगमन के दौरान भगवान राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी ने यहाँ कुछ समय बिताया था और माता की आराधना की थी। मंदिर के निकट ही महाकाली का एक विशाल मंदिर भी है और लगभग एक सौ मीटर दूर एक ऐसी गुफा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि इस गुफा में एक विचित्र प्रकार की खुरदुरी चट्टान है, जिसपर माता सीता जी अपने आभूषण और कपडे आदि रखती थीं। पास में ही वेद व्यास जी की गुफा भी है।

तेलंगाना राज्य के निर्मल जिले में स्थित इस बसारा गांव में स्थापित माता सरस्वती के इस मंदिर को “गंगा सरस्वती मंदिर” के नाम से पहचाना जाता है। यह मंदिर माता सरस्वती के पांच प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। यहां प्रत्येक बारह वर्ष पर पुष्कर या पुण्य स्नान का उत्सव आयोजन किया जाता है।

कैसे पहुंचें –  तो अगर आप भी श्री गंगा सरस्वती मंदिर में दर्शन करने के लिए जाना चाहते हैं तो यह मंदिर तेलंगाना और महाराष्ट्र राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित है। मंदिर तक जाने आने के लिए सबसे नजदीकी बसारा रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 3 किमी दूर स्थित है, जबकि यहां का नजदीकी हवाई अड्डा लगभग 210 किलोमीटर की दूरी पर हैदराबाद में है। इसके अलावा, मंदिर तक जाने आने के लिए बसों की अच्छी सुविधा मिल जाती है, जिसमें महाराष्ट्र और तेलंगाना रोडवेज की बसें हैदराबाद, नांदेड़ आदि से भी चलती हैं जो मंदिर तक जाती हैं।

– अजय सिंह चौहान

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