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प्राचीन लोक-कथाओं और लोक-कलाओं में मोर

admin 28 January 2026
Peacock in ancient folklore and folk art
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– अजय सिंह चौहान

भारत की प्राचीन लोक-कलाओं से लेकर वर्तमान समय तक में मोर नामक पक्षी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक रहा है। यह दिव्य पक्षी अपनी रंगबिरंगी सुंदरता, आकर्षक पंखों और मनमोहन प्राकृतिक नृत्य के कारण प्राचीन काल से ही कला, संस्कृति और धर्म में गहराई से समाया हुआ है। वेदों, पुराणों एवं अन्य सभी सनातन ग्रंथों के साथ-साथ प्राचीन लोक कलाओं में भी मोर का चित्रण न केवल सौंदर्य का प्रतीक रहा है, बल्कि यह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और आधुनिक सामाजिक मूल्यों को भी दर्शाता था।

प्रतीकात्मक और धार्मिक महत्व –
प्राचीन भारत में मोर को सौंदर्य, प्रेम, समृद्धि और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता था। हिंदू धर्म में मोर का संबंध सबसे अधिक भगवान श्रीकृष्ण और भगवान कार्तिकेय अर्थात स्कंद से जोड़कर देखा जाता है। कृष्ण के मुकुट में मोर पंख उनकी रासलीला और प्रेम के प्रतीक के रूप में प्राचीन कथाओं और कला में दर्शाए गए। मोर को वर्षा और उर्वरता से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि इसका नृत्य मानसून के आगमन का संकेत माना जाता है। यह पक्षी प्राचीनकाल से ही कृषि-आधारित समाजों में महत्वपूर्ण था और आज भी है जो लोककलाओं के माध्यम से परिलक्षित होता है। प्राचीन ग्रंथों जैसे वेदों और पुराणों में मोर को प्रकृति और ब्रह्मांडीय सौंदर्य का प्रतीक माना गया, जो लोक कला में प्रेरणा का स्रोत बना।

प्राचीन चित्रकला में मोर –
प्राचीन भारत की प्राकृतिक गुहा या गुफा चित्रकलाओं, जैसे भीमबेटका (मध्य प्रदेश) की गुफा कृतियों में, मोर जैसे पक्षियों के प्रारंभिक चित्रण मिलते हैं। हालांकि ये चित्र सरल थे, वे प्रकृति और प्राणियों के साथ प्राचीन मानव के संबंध को दर्शाते हैं। इसी प्रकार से अजंता और एलोरा की चित्रकला जो प्रथम से छठी शताब्दी के मध्य की मानी जाती है वहां भी मोर को शास्त्रीय कला के हिस्से के तौर पर दर्शाया गया है। हालांकि अजंता की गुफाओं में मोर को बौद्ध कथाओं और सजावटी डिजाइनों में चित्रित किया गया, जो सौंदर्य और शांति का प्रतीक था।

प्राचीन मधुबनी कला –
पौराणिक और प्राचीन मिथिला क्षेत्र के आधुनिक बिहार में मधुबनी चित्रकला की शुरुआत प्राचीन काल में धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों से हुई है जिसमें मोर को प्रेम, सौंदर्य और विवाह जैसे शुभ अवसरों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता था जो आज भी जारी है। प्राचीनकाल में भी यह कला दीवारों और मिट्टी के फर्श पर बनाई जाती थी और आज भी उसी का अनुसरण होता आ रहा है।

पट्टचित्र की उत्पत्ति –
ओडिशा की प्राचीन पट्टचित्र कला शैली की शुरुआत धार्मिक कथाओं को चित्रित करने के लिए हुई थी जो आज भी जारी है। मोर को यहां मुख्यतः भगवान जगन्नाथ और भगवान कृष्ण की कथाओं के साथ जोड़ा गया, जो लोक और शास्त्रीय कला के मिश्रण को दर्शाता है।

लोक शिल्प और सजावटी कला –
प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तनों, कपड़ों और हस्तशिल्प में मोर के डिजाइन आम जनजीवन के लिए प्रयोग किये जाते थे जो आज भी चली आ रही है। उदाहरण के लिए, प्राचीन काल के हड़प्पा सभ्यता, जिसका काल 2500-1900 ईसा पूर्व का माना जाता है के कुछ मिट्टी के बर्तनों पर पक्षियों के चित्रण मिलते हैं, जिनमें मोर जैसे प्रतीकात्मक पक्षी शामिल हो सकते हैं। इसी प्रकार से प्राचीन कढ़ाई और वस्त्र कला जैसे कि प्रारंभिक जरदोजी या अन्य क्षेत्रीय शिल्प, मोर के पंखों के रंगों और डिजाइनों का उपयोग शाही और धार्मिक महत्व को दर्शाने के लिए किया जाता था। न केवल सनातन के छोटे-बड़े समस्त प्राचीन मंदिरों की भित्ति चित्रकला और नक्काशी में भी मोर को सजावटी तत्व के रूप में शामिल किया गया, बल्कि हर एक घर-आंगन आदि की भित्ति चित्रकला में भी मोर को प्रमुखता दी जाती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत के मंदिरों में, जहां यह कार्तिकेय का वाहन माना जाता है वहां तो मोर को भी देवता के रूप में पूजा जाता है।

लोक कथाओं और मौखिक परंपराओं में –
भारत की समस्त प्राचीन लोक कथाओं में मोर को बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और प्रकृति के दूत के रूप में चित्रित किया गया है। कई पौराणिक कथाओं में मोर को जंगल का राजा या देवताओं का संदेशवाहक भी बताया गया है। वहीं प्राचीन पंचतंत्र और जैमिनी भारत जैसे ग्रंथों में भी मोर का उल्लेख प्रतीकात्मक रूप से हुआ है, जो लोक कला में कहानी-चित्रण के माध्यम से व्यक्त हुआ है।

प्राचीन लोक नृत्य और संगीत –
प्राचीनकाल से लेकर आज तक भी विशेष कर भारत में, विशेष रूप से समस्त ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में, मोर के नृत्य से प्रेरित लोक नृत्य प्रचलित थे और आज भी प्रचलित हैं। ये नृत्य प्रकृति के उत्सव और मानसून के स्वागत से जुड़े होते हैं। इसके अलावा प्राचीन लोक गीतों में मोर का उल्लेख प्रेम और वर्षा के प्रतीक के रूप में मिलता है, जो कला और प्रदर्शन में परिलक्षित होता था।

क्षेत्रीय विविधता –
दक्षिण भारत – प्राचीन तमिल संस्कृति में मोर को कार्तिकेय के साथ जोड़ा गया। चोल और पांड्य मंदिरों की कला में मोर की नक्काशी और चित्रण आम थे।
उत्तर भारत – प्राचीन मिथिला और अवध क्षेत्रों में मोर को भित्ति चित्रों और धार्मिक कला में स्थान मिला। यह विशेष रूप से विवाह और उत्सवों से जुड़ा था।
पश्चिम भारत – प्राचीन गुजरात और राजस्थान की लोक कला में मोर को शाही और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया, जो मराठा और राजपूत कला में भी दिखता है। प्राचीन भारतीय लोक कलाओं में मोर एक केंद्रीय प्रतीक था, जो सौंदर्य, आध्यात्मिकता, प्रेम और प्रकृति के साथ गहरा संबंध दर्शाता था। यह चित्रकला, शिल्प, नृत्य और कथाओं में जीवंत रूप से उपस्थित था, जो प्राचीन भारतीय समाज की सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर करता है।

मोर के कुछ प्रमुख तथ्य –
मोर का धार्मिक, प्राकृतिक और पौराणिक महत्व को देखते हुए वर्ष 26 जनवरी, 1963 में भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था। मोर एक सर्वाहारी पक्षी है जो पांच फीट तक लंबी और रंगीन पंखो से युक्त पूंछ और वर्षा ऋतु में नाचने के लिए प्रसिद्ध है। इनमें नर को ‘मोर’ (Peacock) और मादा को ‘मोरनी’ (Peahen) कहा जात है। मोर का नृत्य विशेष रूप से मानसून के दौरान सबसे अधिक देखा जाता है। इसमें वह अपने पंखों को फैलाकर नाच हुए अपनी मादा साथी को आकर्षित करने का एक तरीका है।

आहार के रूप में मोर एक सर्वाहारी पक्षी है जिसे अंग्रेजी में Omnivorous कहा जाता है। ये अनाज, फल, कीड़े-मकोड़े और यहां तक कि छोटे सांपों को भी मार कर खा जाते हैं। उड़ने की क्षमता के बारे में देखें तो भारी और लंबी पूंछ होने के बावजूद मोर उड़ तो सकते हैं, लेकिन बहुत ही कम दूरी तक ही उड़ान भरते हैं जिसमें मात्र कुछ ही मीटर तक की दूरी होती है।

मुख्य रूप से दुनियाभर में मोर की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से मुख्य रूप से एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों में पाये जाने वाले मोर आते हैं। भारतीय मोर एक आम प्रजाति का पक्षी है जो नीले रंग में होता है यह मुख्यतः भारत व श्रीलंका में पाया जाता है। इसके अलावा हरा मोर अंग्रेजी में Pavo muticus के नाम से जाना जाता है जो ‘जावानीस मोर’ के नाम से भी जाना जाता है, जो दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों – म्यांमार से जावा तक में पाया जाता है, लेकिन अब यह एक लुप्तप्राय प्रजाति हो चुकी है। इसी प्रकार से कांगो मोर Afropavo congensis भी है जो अफ्रीका के कांगो बेसिन में पाई जाने वाली एक प्रजाति है। हालांकि, इसके अलावा, सफेद मोर भी होते हैं, जो एक आनुवंशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutation) के कारण होते हैं न कि कोई अलग प्रजाति।

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