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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए कब जायें, कैसे जायें, कहां रूकें ?

admin 15 May 2021
Somnath Jyotirling Temple Gujarat
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अजय सिंह चौहान || भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाला श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर अनादिकाल से भारतवर्ष और हिंदू धर्म की समृद्ध और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रहा है। भगवान शिव को यहां चंद्रमा के रक्षक के रूप में जाना जाता है। चंद्रमा को सोमदेव भी कहा जाता है, और कहा जाता है कि श्री सोमनाथ जी का जो सर्वप्रथम मंदिर बनाया गया था उसे चंद्रमा ने स्वयं बनाया था। और वह मंदिर पूर्ण रूप से सोने की एक संरचना के रूप में था। मध्य युगीन इतिहास में इस मंदिर और स्थान ने अनेकों उतार-चढ़ा देखे और तब से लेकर अब तक यह धर्मस्थल लगभग सत्रह बार टूटा और बनाया गया।

10वीं शताब्दी से लेकर सन 1950 तक इस मंदिर के विध्वंस का सिलसिला लगातार चलता रहा। लेकिन सन 1706 में औरंगजेब के द्वारा किया गया हमला इस मंदिर पर सत्रहवां और आखिरी हमला था। जबकि सन 1024 ईसवी में महमूद गजनवी द्वारा किया गया हमला किसी भी धर्म या धार्मिक स्थल पर किया गया इतिहास का सबसे विभत्स हमला माना गया है।

सन 1024 ईसवी में महमूद गजनवी ने जिस समय सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था उस समय वहां लगभग 25 हजार हिंदू श्रद्धालू और तीर्थयात्री दूर-दूर से मंदिर में पूजन-दर्शन करने आए हुए थे। उन सभी श्रद्धालुओं ने उस हमले का विरोध किया, जिसके बदले में गजनवी ने उन सभी को कत्ल करवा दिया और मंदिर की अपार धन-संपदा को लूटने के बाद उसने पवित्र शिवलिंग को भी खंडित करवा दिया।

गजनवी के बाद अलाउद्दीन खिलजी, महमुद बेकड़ा और औरंगजेब के सेनापति ने भी यहां कई बार मंदिर को लूटा और ध्वस्त किया। राजा भीमदेव, सिद्धराज, कुमारपाल और रा-नवघन ने मंदिर का पुनः निर्माण करवाया। इस तरह सन 1026 से सन 1783 तक मूल स्थान पर ही मंदिर का पुनर्निमाण होता रहा। न जाने कितने ही छोटे-बड़े हमले होते रहे लेकिन आस्था के साथ जुड़ी पुनर्निर्माण की वह शक्ति हर बार विनाश की शक्ति के आगे जीतती रही और वहां मंदिर बनता रहा।

इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है कि औरंगजेब के शासनकाल में सोमनाथ मंदिर पर दो बार आक्रमण किया गया था। जिसमें पहली बार सन 1665 में यहां लूटपाट के बाद भारी उत्पात मचाया गया और इसमें होने वाली पूजा-पाठ को भी प्रतिबंधित करवा दिया। और दूसरी बार जब औरंगजेब को खबर मिली कि हिंदू अब भी उस स्थान पर पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने सन 1706 ईसवी में यहां दौबारा हमला करवा के मंदिर में उपस्थित कई श्रद्धालुओं को कत्ल करवा दिया और उसके आदेश के अनुसार उस स्थान पर एक मस्जिद खड़ी करवा दी गई।

समय और इतिहास आगे बढ़ता गया। धीरे-धीरे मराठाओं की ताकत के आगे मुस्लिम लूटेरों की सल्तनत और ताकत कमजोर होती गई। गुजरात पर मराठाओं का कब्जा होने के बाद सन 1783 में कोल्हापुर के छत्रपति भोंसले, पुणे के पेशवा, नागपुर के राजा भोंसले, ग्वालियर के श्रीमंत शिंदे और इन्दौर की रानी अहिल्याबाई के सामूहिक सहयोग और प्रयासों से सोमनाथ मंदिर की मरम्मत कराई गई।

महारानी अहिल्याबाई ने सोमनाथ मंदिर के मूल स्थान के सामने भूगर्भ में एक नया मंदिर बनवा कर शिव पूजन की परंपरा को सुरक्षित रखा। लेकिन मराठाओं के द्वारा मरम्मत कराये हुए उस मूल मंदिर के खंडहरों को सन 1947 के आते-आते एक लंबा समय बीत चुका था। ऐसे में यह संरचना भी बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की मांग करने लगी थी।

सन 1947 में देश को आजादी मिली, सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले गृहमंत्री बने। 13 नवंबर 1947 को सरदार पटेल, जाम साहेब दिग्विजयसिंह, सौराष्ट के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री उच्छंगराय ढेबर, काका साहब गाडगील और श्री कन्हैयालाल मुनशी ने प्रभास पाटन आकर सोमनाथ मंदिर के अवशेषों का दर्शन किया। सोमनाथ में जनसभा के समय ही श्री सरदार पटेल ने यह ऐलान भी कर दिया कि करोड़ो लोगों की आस्था इस स्थान से जुड़ी हुई है। इन करोड़ो लोगों के लिए यह श्रद्धास्थल का पुनः निर्माण ही आजादी की भावना से जुड़ा हुआ है। हम श्री सोमनाथ मंदिर का पूनर्निमाण करेंगे। के इतना कहते ही वहां मौजूद भीड़ ने जय सोमनाथ के जयकारे के साथ उनका धन्यवाद दिया।

जल्द ही सरदार पटेल की मृत्यु हो गई और मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य की जिम्मेदारी श्री कन्हैयालाल मानकलाल मुंशी ने संभाल ली। अक्टूबर 1950 में मंदिर के उन खंडहरों को वहां से हटवा दिया गया और वहां मौजूद मस्जिद को भी कुछ किलोमीटर दूर स्थानांतरित करवा दिया। श्री मानकलाल मुंशी ने मई 1951 में भारत गणराज्य के प्रथम और तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को मंदिर के स्थापना समारोह में आमंत्रित किया और उन्हीं के द्वारा सोमनाथ ज्योर्तिलिंग की पुर्नस्थापना कराई गई।
मंदिर 1962 में पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। 1 दिसंबर 1995 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने यह मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया। और 11 मई 2001 को प्राण प्रतिष्ठा के स्वर्ण वर्ष में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने महोत्सव का आरंभ किया।

इस शिवलिंग के यहाँ स्थापित होने के पीठे बहुत सी पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना उसी स्थान पर की गयी है जिस स्थान पर भगवान शिव प्रकट हुए थे।

मंदिर के नाम के विषय में बताया जाता है कि सतयुग में सोम देव यानि चंद्रदेव ने यहां पर भगवान शिव के लिए सोने का मंदिर बनवाया था जो बाद में श्री सोमनाथ मंदिर या चंद्रमा के नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। त्रेता युग में रावण ने यहां चांदी का मंदिर बनवाया और द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने चंदन की लकड़ी से सोमनाथ जी का मंदिर बनवाया था।

अब अगर हम श्रीसोमनाथ मंदिर के प्राचीन इतिहास की बात करें तो मध्य युगीन इतिहास के प्रारंभ तक भी जो मंदिर यहां मौजूद था वह न सिर्फ भव्य था बल्कि अति कीमती रत्नों और स्वर्णजड़ित संरचनाओं में से एक था। उस मंदिर में 56 स्वर्ण स्तंभ थे, और संपूर्ण मंदिर में अनगिनत कीमती रत्न और हीरे जड़े हुए थे। अलबेरुनी और मार्कोपोलो ने सोमनाथ मंदिर का जो वर्णन किया है उसके अनुसार संभवतः यह भारतवर्ष के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक था।

अलबेरुनी और मार्कोपोलो ने लिखा है कि श्रीसोमनाथ मंदिर के रखरखाव आदि के लिए दस हजार गांवों की जिम्मेदारी तय की गई थी। भगवान श्रीसोमनाथ के प्रति संपूर्ण भारत में इतनी आस्था थी कि गंगा जी से कांवड़ द्वारा जल लाकर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक होता था। ज्योतिर्लिंग पर चढ़ने वाले कमल के पुष्प हमेशा कश्मीर की डल झील से ही आते थे। मंदिर के गर्भगृह में हीरे जवाहरत की भरमार थी जिनमें अनेकों ऐसी मूर्तियां थीं जो शुद्ध सोने से बनी हुई थीं। एक हजार से भी अधिक पूजारी भगवान की पूजा और हवन आदि में हमेशा व्यस्त रहते थे।

श्रीसोमनाथ मंदिर के दक्षिण और पश्चिम में रत्नाकर सागर है जो आज अरब सागर के नाम से जाना जाता है। इस विशाल अरब सागर की लहरें रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारती हैं। यहां एक सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि पिछले हजारों वर्षों के इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी इस क्षेत्र को हानि नहीं पहुंचाई।

मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों के लिए यहां आकर्षण का एक और प्रमुख केन्द्र है ऐतिहासिक ‘बाण स्तंभ’। मंदिर प्रांगण के दक्षिण दिशा की ओर समुद्र से लगी दिवार के पास बना यह बाण स्तंभ लगभग 1500 साल पुराना बताया जाता है। बाण स्तंभ के शिलालेख के अनुसार – इस स्थान से दक्षिण धु्रव तक सीधी रेखा में एक भी भू-भाग या द्वीप का अवरोध नहीं है। लेकिन, बाण स्तंभ पर लिखी पंक्तियों में जिस ‘ज्योतिर्मार्ग’ का उल्लेख है, वह ‘ज्योतिमार्ग’ क्या है यह एक रहस्य बना हुआ है।
यह तीर्थ क्षेत्र ‘पितृ श्राद्ध’ के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्र और कार्तिक महिनों में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। यहां तीन नदियों कपिला, हिरण और सरस्वती का महासंगम भी होता है जिसमें कुछ विशेष अवसरों पर इस त्रिवेणी स्नान का महत्व है। अनादि काल से यह मंदिर क्षेत्र अखण्ड भारत का सबसे पवित्र तीर्थस्थान माना जाता रहा है।

यह मंदिर ही नहीं बल्कि संपूर्ण सोमनाथ क्षेत्र अतुल्य आध्यात्मिकता का एक अद्भुत प्रतीक और देश की समृद्ध परंपराओं, संस्कृति और विरासत के रूप में जाना जाता है। श्री सोमनाथ मंदिर में पहुंचकर हर तीर्थयात्री को एक दिव्य अनुभव होता है। इस मंदिर में असाधारण वास्तुकला और कई प्रकार की समृद्ध तथा जटिल नक्काशियां हैं।
सात मंजिलों वाले इस नवनिर्मित मंदिर की ऊंचाई 155 फुट है। इसके गर्भगृह में एक मंजिल और शिखर के भाग तक सात मंजिलें हैं। इसकी तीसरी मंजिल पर एक हजार छोटी-छोटी मनमोहक कलश की आकृतियां बनाई गईं हैं। मंदिर का सभागृह और नृत्य मंडप 3-3 मंजिले हैं। नृत्य मंडप के चारों ओर छोटे-छोटे शिखर सुशोभित हैं। मंदिर के शिखर पर सबसे ऊपर की ओर एक शानदार कलश है जिसका वजन लगभग 10 टन बताया जाता है। इसके शिखर पर 37 फुट ऊंचा एक आकर्षक धर्म ध्वज सुशोभित है।

वर्तमान मंदिर का निर्माण कैलाश महामेरुप्रासाद के रूप में किया गया है। यह मंदिर नया जरूर है लेकिन प्राचीनतम नागरा शैली का एक बेहतर उदाहरण है। मंदिर के सभा मंडप में पत्थरों की मूर्तियां और नक्काशियां मनमाोहक हैं। 72 स्तंभो वाले इस मंदिर की विशेषता यह है कि 800 सालों बाद नागरा शैली से निर्माण हुआ यह प्रथम देवालय है। यहां आने वाले हर दर्शनार्थी को यह एहसास होने लगता है कि श्री सोमनाथ के गर्भगृह और स्तंभों को एक बार फिर स्वर्णमंडित करके मंदिर का स्वर्ण युग लौट आया है।

इस मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। यहां आने वाले दर्शनार्थियों के लिए यहां 400 से भी अधिक कमरों का विशेष प्रबंध है किया गया। इसमें बजट के अनुसार कमरे आॅनलाइन भी बुक किये जा सकते हैं। साथ ही दर्शनार्थियों के भोजन के लिए 4 भोजनालयों में भोजन प्रसाद की व्यवस्था है।
श्री सोमनाथ मंदिर में श्रवण मास और शिवरात्रि की विशेष धूम रहती है। इसके अतिरिक्त गोलोकधाम उत्सव और कार्तिक पूर्णिमा मेला भी उत्साह से मनाया जाता है। भगवान सोमनाथ की आरती हर दिन प्रातः 7 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम को 7 बजे की जाती है।

मंदिर प्रांगण में पार्वती जी का मंदिर, द्वादश ज्योतिर्लिंग, कपर्दि विनायक मंदिर, कष्टभंजन हनुमान जी का मंदिर भी दर्शनिय हैं।
मंदिर के प्रति वेगड़ा भील और लाठी के राजकुंवर श्री हमीरजी गोहिल की शहादत की निशानियों के दर्शन आज भी यहां किए जा सकते हैं।

प्रभास पाटन यानी तेजोमय या प्रकाशमान क्षेत्र माने जाने वाली इस भूमि पर भगवान परशुराम सहित अनेकों ऋषि मुनियों ने साधना की है। कभी इस क्षेत्र में भगवान सूर्य देव के 12 भव्य और प्राचीन मंदिर हुआ करते थे, इसलिए इसे आज भी प्रभास या भास्कर क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

सोमनाथ मंदिर के नजदीक ही भालका तीर्थ है जिसके बारे में मान्यता है कि श्रीकृष्ण भालका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे। उस समय एक शिकारी ने उनके पैर के तलुए में बने पद्मचिह्न को हिरण की आंख समझकर धोखे में तीर मार दिया था। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया था। उस स्थान पर आज एक बड़ा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है। सोमनाथ मंदिर से भालका तीर्थ की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है।

नए मंदिर के निर्माण के समय पुरातत्व विभाग के सहयोग से किए गए उत्खनन के दौरान मलबे में से प्राप्त अनेकों प्राचीनतम मूर्तियों और कई प्रकार के अवशेषों को प्रभासपाटन म्यूजियम में देखा जा सकता है।
श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के आसपास के पर्यटन स्थलों में अहिल्याबाई मंदिर, त्रिवेणी संगम घाट, गोलोकधाम तीर्थ, प्राची तीर्थ आदि हैं। सासनगिर नामक एक अन्य पर्यटक स्थल भी है जो मंदिर से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर ही है। इसके अलावा ‘नागोआ बीच’ और ‘दीव किला’ या पुर्तगाली किला यहां से 85 किलोमीटर की दूरी पर है जो पर्यटन के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रीसोमनाथ मंदिर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर जूनागढ़ का मशहूर ऐतिहासिक किला है।

पोरबंदर श्रीसोमनाथ मंदिर से 130 किलोमीटर की दूरी पर है जहां दरबारगढ़ महल, कीर्ति मंदिर या गांधीजी के घर और हुजूर पैलेस जैसी धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतें हैं। द्वारका जो यहां का दूसरा सबसे विशेष और पवित्र स्थान है सोमनाथ मंदिर से 230 किलोमीटर की दूरी पर है। पर्यटन और धार्मिक यात्रा के लिहाज से यहां का द्वारकाधिस मंदिर और भगवान कृष्ण से जुड़े अन्य अनेकों धार्मिक और ऐतिहासिक साक्ष्य और प्रमाण मौजूद हैं।

रेल की यात्रा करके सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए जाने के लिए यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन सोमनाथ रेलवे स्टेशन है जो मंदिर के नजदीक ही है। एक अन्य रेलवे स्टेशन जो वेरावल रेलवे स्टेशन के नाम से है मंदिर से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। हवाई जहाज से आने वाले यात्रियों के लिए यहां का निकटतम हवाई अड्डा दीव हवाई अड्डा है जो यहां से 60 किलोमीटर दूर है। यह स्थान सड़क मार्ग से देश के हर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

सितंबर से मार्च के बीच का का समय सोमनाथ दर्शनों के लिए जाने का सबसे उत्तम समय माना जााता है।

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