Thursday, May 28, 2026
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मलबे में दबता इंदौर का अपनापन

प्राप्त खबरों के अनुसार आजकल इंदौर शहर में कुछ ऐसा विकास हो रहा है जो वहां के मूल वोटरों और मूल निवासियों को बिलकुल भी रास नहीं आ रहा है। एक खबर के अनुसार जो की सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है उसमें दर्शाया गया है की जी प्रकार से शहर में तोड़फोड़ हो रह है उससे आम जनता खूब आक्रोश में दिख रही है और प्रशासन का विरोध करते हुए कई प्रकार से अपने विरोध की आवाज़ दो बुलंद करने का प्रयास कर रही है।
ऐसी ही एक खबर जो आज सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रही है उसको दे रहे हैं –

ये है नया इंदौर, जहाँ विकास की तस्वीरों में चमक है लेकिन जमीन पर धूल उड़ रही है। जहाँ प्रोजेक्ट्स की प्रेस कॉन्फ्रेंस हैं लेकिन लोगों की परेशानियां सुनाई नहीं देतीं। जहाँ शहर को स्मार्ट बनाने की जल्दबाजी में शायद इंसानों को असुविधा मान लिया गया है।

इंदौर की छावनी आज केवल एक इलाका नहीं है। वह इस शहर के विकास मॉडल का आईना बन चुकी है।
मलबे के ढेर… धूल के गुबार… बंद रास्ते… ठप व्यापार और उन लोगों की आँखों में बेबसी जिनका जीवन रोज़ की कमाई पर चलता है।

सड़क चौड़ीकरण जरूरी है, शहर का विकास भी जरूरी है। लेकिन क्या विकास का मतलब यह है कि पूरा इलाका हफ्तों तक मलबे में डूबा रहे? क्या विकास का मतलब यह है कि व्यापारी बर्बादी गिनें और प्रशासन केवल मशीनों की आवाज़ सुने?

सबसे दर्दनाक बात शायद ये पोस्टर नहीं है जिस पर लिखा है आज हमारी, कल तुम्हारी बारी। सबसे दर्दनाक बात यह है कि लोगों को अब यह भरोसा नहीं रहा कि उनकी पीड़ा कोई सुनेगा भी और यही किसी भी शहर का सबसे बड़ा संकट होता है जब नागरिक व्यवस्था से नहीं, व्यवस्था के सामने खुद को असहाय महसूस करने लगें।

विडंबना देखिए… इंदौर स्वच्छता में नंबर 1 है लेकिन आज छावनी धूल और मलबे की पहचान बन चुकी है। शहर लिवेबल सिटी बनने का सपना देख रहा है। लेकिन जिन लोगों ने वर्षों तक इस क्षेत्र को जिंदा रखा, उनके लिए जीना मुश्किल हो गया है।

कार्रवाई हुई… तोड़फोड़ हुई … लेकिन उसके बाद?

ना समय पर मलबा उठा… ना वैकल्पिक व्यवस्था बनी… ना संवाद हुआ… ना संवेदनशीलता दिखाई दी और शायद यही “नए विकास मॉडल” की सबसे बड़ी समस्या है जो इंफ्रास्ट्रक्चर तो देखता है, इंसान नहीं।

सड़क कितनी चौड़ी होगी, इसकी प्लानिंग है। लेकिन उस दौरान व्यापारियों का नुकसान कैसे रुकेगा, इसकी नहीं। मशीनों की गति तय है लेकिन लोगों की जिंदगी रुक जाए तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता और फिर हम कहते हैं शहर आगे बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है क्या शहर सच में आगे बढ़ रहा है यदि उसके अपने नागरिक पीछे छूट रहे हैं? क्योंकि शहर केवल फ्लाईओवर, चौड़ी सड़कें और प्रोजेक्ट्स से नहीं बनता। शहर उन लोगों से बनता है जो सुबह दुकान खोलते हैं, जो उसी बाजार में जीवन बिताते हैं, जो उस जगह को इलाका नहीं, अपना संसार मानते हैं।

आज छावनी में जो दर्द है, वह केवल एक क्षेत्र का दर्द नहीं है। वह उस डर का दर्द है कि कहीं विकास के नाम पर इंसान की गरिमा सबसे सस्ती चीज़ न बन जाए।

याद रखिए जिस शहर में विकास संवेदनहीन हो जाता है, वहाँ चमक तो बचती है लेकिन अपनापन मरने लगता है।

(इस सन्देश के माध्यम से यहां आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की आम लोगों का दर्द क्या है और उनको कौन सी और कैसी दवा की आवश्यकता है)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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