भगवान विष्णु के हंस अवतार का मुख्य वर्णन भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध में मिलता है। यह अवतार अत्यंत दिव्य और ज्ञानमय अवतार माना जाता है। यह युद्ध अथवा दुष्टों के संहार के लिए नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, विवेक और ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के लिए हुआ था।
हंस अवतार की पृष्ठभूमि —
हंस अवतार के संबंध में उल्लेख है की सृष्टि के आरम्भ में सनक, सानंदा, सनातन और सनत्कुमार ने आत्मा और परमात्मा के गूढ़ रहस्यों को जानने की इच्छा की। अतः वे ब्रह्मा जी के पास पहुँचे, परन्तु ब्रह्माजी भी उस समय उनके प्रश्नों का पूर्ण उत्तर नहीं दे सके। तब ब्रह्माजी ने भगवान श्रीहरि विष्णु का ध्यान किया। भगवान एक दिव्य हंस अर्थात राजहंस के रूप में प्रकट हुए। उनका तेज करोड़ों सूर्य के समान था, किन्तु स्वभाव चन्द्रमा जैसा शीतल और शांत।
चारों कुमारों ने श्रीहरि विष्णु जी से पूछा —
हे प्रभु! जीव और मन का सम्बन्ध क्या है? बन्धन कैसे होता है और मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? तब भगवान हंस ने उत्तर दिया कि आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। मन और इन्द्रियों से तादात्म्य ही बन्धन है, और परमात्मा के ज्ञान से वही बन्धन समाप्त हो जाता है।
आत्मानमुभयोरपि
भिन्नं प्रकृतिपुरुषयोः।
पश्यन्नात्मनि चात्मानं
यथा स्वप्नमनोरथौ॥
— श्रीमद्भागवत (11.13.19)
अर्थात जो ज्ञानी पुरुष प्रकृति और पुरुष (जीव) दोनों से भिन्न अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को देखता है, वह समझ लेता है कि संसार स्वप्न और कल्पना के समान है।
हंस का प्रतीक —
भारतीय परम्परा में हंस को विवेक का प्रतीक माना गया है। कहा जाता है कि हंस दूध और पानी में से केवल दूध ग्रहण कर लेता है। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य, आत्मा और शरीर में भेद कर लेता है। इसलिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने हंस रूप धारण कर यह संदेश दिया कि मनुष्य को भी विवेक द्वारा सत्य का ग्रहण करना चाहिए।
हंस अवतार की मुख्य शिक्षाएँ —
शरीर, मन और इन्द्रियाँ परिवर्तनशील हैं; आत्मा शाश्वत है, अर्थात आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न मरती है। विवेक ही आध्यात्मिक जीवन का प्रथम साधन है। आत्मज्ञान और भगवान की भक्ति से जन्म-मरण का बन्धन समाप्त होता जाता है। संसार में रहते हुए भी मन को भगवान में स्थित रखना ही सच्चा योग है।
भगवद गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने भी आत्मा की नित्यता बताई है —
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
— (गीता 2.20)
अर्थात – आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका विनाश नहीं होता।
सनातन परम्परा में भगवान विष्णु का हंस अवतार भी ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का प्रतीक है। उन चार कुमारों को ब्रह्मविद्या का उपदेश देकर इस अवतार ने भी यह संदेश दिया कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप यह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अमर आत्मा है, और परमात्मा की भक्ति तथा आत्मज्ञान से ही जीवन का परम लक्ष्य—मोक्ष—प्राप्त होता है।
हंस अवतार का भी यही संदेश है कि — विवेक के बिना ज्ञान अधूरा है और ज्ञान के बिना भक्ति स्थिर नहीं होती। भक्ति और ज्ञान मिलकर मनुष्य को परम शांति और मोक्ष प्रदान करते हैं। यहां हमें यही शिक्षा मिलती है की प्रत्येक साधक को हंस की भाँति सत्य को ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिए।
