अजय सिंह चौहान | पिछली शताब्दी में प्लास्टिक ने मानव जीवन को असाधारण रूप से बदल कर जितना आसान बना दिया था, अब वही आसानी मानव की सेहत के लिए महंगी पड़ती जा रही है। इस्तमाल के तौर पर सहज, हल्का, सस्ता, मजबूत और पानी से लगभग अप्रभावित और आसानी से अलग-अलग आकार में ढाला जा सकने वाला यही प्लास्टिक आज भोजन की पैकिंग से लेकर चिकित्सा उपकरणों, मोबाइल फोन, कारों, भवन निर्माण, कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक लगभग हर क्षेत्र में कहीं आवश्यक तो कहीं बेवजह भी थोक के भाव में इस्तेमाल होने लगा है। प्लास्टिक की यही सबसे बड़ी विशेषता और आज दुनियाभर के लिए सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या भी बन गई है।
साधारणतया हमारे लिए प्लास्टिक की एक बोतल या पैकेजिंग कुछ मिनटों या घंटों के लिए ही उपयोग होती है, लेकिन उसके बाद उसका वही पदार्थ हमारे सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण में दशकों तक स्थान बना लेता है और हमारे सेहत को हानि पहुंचता रहता है। वही प्लास्टिक छोटे टुकड़ों में टूटकर micro-plastics बनकर धीरे-धीरे nano-plastics में बदलता रहता है जो हमारी प्रकृति के लिए जहर का काम करता है।
आज समस्या केवल सड़क किनारे दिखने वाले साधारण प्लास्टिक कचरे की नहीं रह गई है। बल्कि अब तो यही प्लास्टिक हमारे घर के हर कमरे, रसोई, बागानों, खेतों, मिट्टी, नदियों, झीलों, हवा, समुद्र, समुद्री जीवों, पशु-पक्षियों और हर प्रकार की खाद्य-श्रृंखला तक पहुँच चुका है। इसीलिए तो संयुक्त राष्ट्र को भी अब ये कहना पड़ रहा है कि मनुष्य अब हर वर्ष 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक पैदा कर रहा है जो हमारे लिए बहुत अधिक घातक है, क्योंकि इसका लगभग दो-तिहाई हिस्सा अपेक्षाकृत अल्पकालिक उत्पादों में जाता है जो शीघ्र ही कचरे में बदल जाते हैं।
कितना प्लास्टिक पैदा हो रहा है? –
वैश्विक स्तर पर हर वर्ष प्लास्टिक उत्पादन और उपयोग कितना अधिक होता जा रहा है इसके लिए Global Plastics Outlook से जो आंकड़े मिलते हैं वे चौकाने वाले हैं। ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी OECD के अनुसार वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन जहां सन 1950 में लगभग 2 मिलियन टन था वहीं सन 2000 में ये लगभग 234 मिलियन टन तक पहुँच चुका था। इसके बाद तो प्लास्टिक का उत्पादन और उपयोग एकाएक दुनियभर में बेतहाशा बढ़ने लगा और 2019 के आते-आते ये आंकड़ा लगभग 460 मिलियन टन पहुंच गया। यानी, सन 1950 से 2019 के बीच प्लास्टिक का वार्षिक उत्पादन लगभग 230 गुना बढ़ गया था। लेकिन सन 2000 से 2019 के केवल 19 वर्षों में ही वार्षिक उत्पादन लगभग दोगुना हो गया।

दरअसल, दुनियाभर में प्लास्टिक उत्पादन अचानक इतनी तेजी से क्यों बढ़ने लगा, इसके कई कारण सामने आते हैं। जिनमें से सबसे बड़ा कारण है इसकी कम कीमत। क्योंकि अन्य कई सामग्रियों की तुलना में प्लास्टिक सस्ता और आसानी से प्राप्त होने लगा है। दूसरे कारणों में इसका हल्का वजन भी प्रमुख है, जिसके कारण परिवहन में इसकी लागत कम लगती है। अन्य पैकेजिंग सामग्रियों की तुलना में प्लास्टिक सबसे टिकाऊपन को दर्शाता है और उन सभी के अधिक आसानी के साथ सुविधाजनक भी है। क्योंकि पानी, नमी और अनेक रासायनिक परिस्थितियों में यह अपेक्षाकृत टिकाऊ और भरोसेमंद लगने लगा है।
प्लास्टिक की Packaging ने एक क्रांति के तौर पर हर एक प्रकार के भोजन, पेय, दवाइयों और अन्य कई उपभोक्ता वस्तुओं की पैकिंग में सबसे अधिक और भरोसेमंद उपयोगिता को तेजी से बढ़ाया। जिसके कारण अब तो तेल और गैस जैसे उद्योगों में भी प्लास्टिक को पैकेजिंग के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है।
प्लास्टिक का Single-use culture –
प्लास्टिक को एक बार इस्तेमाल करके फेंकने के कारण पर्यावरण की समस्या को और भी अधिक गंभीर बना दिया है। OECD के अनुसार सन 2019 में वैश्विक स्तर पर plastic waste का लगभग दो-तिहाई हिस्सा ऐसे applications से आया जिनकी lifetime पाँच वर्ष से कम थी और अकेले ऐसी packaging लगभग 40% plastic waste के लिए जिम्मेदार थी।
कितना प्लास्टिक कचरा पैदा होता है? –
प्लास्टिक का उपयोग करने वाले हर एक व्यक्ति को यह आँकड़ा भी अवश्य जानना चाहिए कि दुनियाभर में कितना प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। तो, ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी OECD के अनुसार, सन 2019 में दुनिया ने लगभग 353 मिलियन टन plastic waste यानी प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा हुआ था। सन 2000 में यही कचरा बढ़कर लगभग 156 मिलियन टन हो चुका था। यानी लगभग दो दशकों में plastic waste दोगुने से भी अधिक हो गया।
यहां ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि उत्पादन किये जाने वाला प्लास्टिक उसी वर्ष कचरे में नहीं बदलता, बल्कि इसके लिए कम से कम दो से तीन साल, या फिर इससे भी अधिक समय लग सकता है। उदाहरण के लिए भवन, वाहन, घरेलु उत्पादन और कुछ औद्योगिक उत्पादों में इस्तेमाल प्लास्टिक कई वर्षों तक उपयोग में रह सकता है।
कितना प्लास्टिक recycle होता है? –
ये जानकर स्थिति बहुत ही चिंताजनक लगने लगती है कि दुनिया में हर साल प्लास्टिक का कितना हिस्सा recycle होता है। ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी OECD के आंकड़ों को आधार माने तो सन 2019 के वैश्विक आंकलन के अनुसार लगभग 15% plastic waste ही recycling के लिए इकठ्ठा किया गया, और उसमें से भी recycling losses के बाद वास्तव में लगभग 9% plastic waste ही recycle में निकल कर सामने आया। जबकि उसमें से लगभग 19% जलकर वायु प्रदुषण के रूप में हवा में फैल गया। इसी तरह लगभग 50% जल और मिट्टी में घुल-मिल गया। जबकि शेष लगभग 22% mismanaged हुआ— यानी अन्य कई तरीकों या लापरवाहियों से पर्यावरण में जहर बन कर रह गया। यहां इसका सीधा सा अर्थ है कि “प्लास्टिक recyclable है” कहना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि Recyclable होना और recycle हो जाना दो अलग बातें हैं।
कितना प्लास्टिक प्रकृति में पहुँचता है? –
सन 2019 में OECD के आकलन के अनुसार लगभग 22 मिलियन टन प्लास्टिक पर्यावरण में घुल-मिल गया और लगभग 19 से 23 मिलियन टन प्लास्टिक हमारी नदियों, झीलों, तालाबों, कुओं और अलग-अलग समुद्रों में पहुँचा है। प्लास्टिक सीधे तौर पर समुद्र में कभी नहीं जाता बल्कि घर से निकल कर ये पहले सड़कों पर बिखरता है, फिर नालियों में जाता है और वहां से नदियों के रास्ते समुद्र में पहुंचता है। इसीलिए हमारी नदियाँ समुद्र तक प्लास्टिक को पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। और ये समस्या किसी एक देश की नहीं बल्कि अब तो सभी देशों की बनती जा रही है।
समुद्र में कितना प्लास्टिक है? –
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP के अनुसार महासागरों में पहले से ही लगभग 75–199 मिलियन टन प्लास्टिक होने का अनुमान है, उसमें भी प्लास्टिक सबसे अधिक है। यानी ये प्लास्टिक कचरा कम-से-कम 85% तक हो सकता है। इसका अर्थ है कि प्लास्टिक केवल तटों पर दिखाई देने वाला कचरा ही नहीं है। बल्कि समुद्र की सतह, समुद्र-तल और समुद्री जीवों के शरीर तक भी पहुँच चुका है।
प्लास्टिक खत्म क्यों नहीं होता? –
आम तौर पर अब हम सभी जानते हैं कि प्लास्टिक “सैकड़ों साल तक नहीं सड़ता।” तो इसका मूल वैज्ञानिक अर्थ ये है कि पारंपरिक तौर पर हमारे आस-पास देखा जाने वाला प्लास्टिक प्राकृतिक और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा आसानी से और पूरी तरह समाप्त होकर पर्यावरण में नहीं मिलता। तेज़ धूप, कम या अधिक तापमान, लहरें, हवा और मशीनों के द्वारा प्लास्टिक के बड़े हिस्सों को पाउडर और पाउडर के एक कण को भी सैकड़ों कानों में तो बना सकते हैं लेकिन उसको प्राकृतिक कचरे की भाँती पर समाप्त नहीं कर सकते। इसलिए यदि कोई प्लास्टिक बोतल गली हुई या मिटटी में मिलने या मिलाने के बाद दिखाई न दे तो ये नहीं समझना चाहिए की प्लास्टिक पदार्थ प्राकृतिक कचरे की भाँती ही प्रकृति में मिलकर गायब हो गया है। क्योंकि ऐसे में वो माइक्रोप्लास्टिक के रूप में पर्यावरण में ज़हर बन कर फैल चुका होता है। वैसे तो सामान्यतः 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, लेकिन ये इससे भी कहीं अधिक छोटे हो सकते हैं।
मिट्टी पर प्लास्टिक का प्रभाव –
प्लास्टिक जब खेतों, खुले मैदानों और जंगलों में पहुँचता है तो वहाँ की मिट्टी में जमा होकर उसके भौतिक गुणों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह शुरुआत में तो नालियों के बहते पानी की गति को रोकता हुआ दिखता है, लेकिन कुछ समय बाद पानी में घुल कर नदियों में चला जाता है और वहाँ से समुद्र में। इसी तरह अब कृषि संबंधी कई प्रकार के उत्पादों और खाद के माध्यम से प्लास्टिक के अवशेष खेतों में आसानी से पहुँचने लगे हैं। ख़ास तौर पर भारत में तो ये समस्या और भी विकराल होती दिख रही है।
नदियों और झीलों पर प्लास्टिक का प्रभाव –
भारत सहित अनेक देशों में नालियों के माध्यम से प्लास्टिक का एक बड़ा हिस्सा नदियों और झीलों में पहुँच रहा है। और फिर नदियाँ उसी प्लास्टिक को ले जाकर अंततः समुद्र तक पहुँचा देती हैं। तमाम वैज्ञानिक शोधों और रिपोर्ट्स से इस बात की जानकारिया मिलती रहती हैं कि नदियों और समुद्र में अब मछलियों द्वारा प्लास्टिक निगला जा रहा है जिसके कारण उनकी मौते होती जा रही हैं। पक्षियों द्वारा भी प्लास्टिक को भोजन समझकर खाया जा रहा है।
पशुओं पर प्लास्टिक का प्रभाव –
अब तो पालतू ही नहीं बल्कि जंगली पशुओं के लिए भी प्लास्टिक खतरनाक होता जा रहा है। पालतू पशुओं पर तो प्लास्टिक का प्रभाव अक्सर हमारे शहरों और गाँवों में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
विशेष रूप से कूड़े के खुले ढेर में भोजन खोजने वाले पशु plastic bags और अन्य कई food packaging को निगते दिख जाते हैं जिनमें सबसे अधिक घनी आबादी वाले शहरों में गाय, भैंस, बकरी, कुत्ते और सूअर की संख्या अधिक है। ये प्लास्टिक इन पशुओं के पेट और आंतों में जमा होकर उनके digestive system को चोट पहुंचाकर भूख में कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करता है जिसके कारण इनकी समय से पहले ही खूब मौतें हो रही हैं।
