अजय चौहान | गर्भावस्था के दौरान गर्भ में बनने वाले एक अस्थायी अंग को गर्भनाल या गर्भजाल कहा जाता है जिसे अंग्रेजी में प्लेसेंटा (Placenta) कहते हैं। इस अंग का काम माँ के गर्भ में शिशु को जोड़े रखने के साथ उस तक ऑक्सीजन और पोषण पहुँचाता है और साथ ही शिशु के अपशिष्ट पदार्थों को गर्भ से बाहर निकालने में भी मदद करना है। शिशु के जन्म के बाद यही गर्भनाल यानी प्लेसेंटा माता के गर्भ से बाहर निकल आता है जिसे काट कर अलग कर दिया जाता है और घर के आँगन में या घर के आस-पास ही कहीं मिट्टी में गहराई के अंदर दबा दिया जाता है लेकिन अब आधुनिक विज्ञान और अस्पतालों ने इसी गर्भनाल के हिस्से को सुरक्षित रखना शुरू कर दिया है जिसे “कॉर्ड ब्लड बैंक” या “प्लेसेंटा बैंक” कहते हैं। असल में उस नाल के साथ बच्चे के जन्म के तुरंत बाद जो रक्त लगा हुआ होता है उसी को एकत्र किया जाता है। इस रक्त में हेमाटोपोएटिक नामक स्टेम सेल (Hematopoietic Stem Cells) होते हैं जिसको बैंक में रखा जाता है। इन Stem Cells या कोशिकाओं को अत्यंत कम तापमान (लगभग -196°C, तरल नाइट्रोजन में) सुरक्षित रखा जाता है। दरअसल, इसके पीछे का कारण है कि भविष्य में कुछ गंभीर बीमारियों के उपचार में इसका लाभ मिल सकता है।
वर्तमान में बैंक में रखी इन Stem Cells या कोशिकाओं का उपयोग मुख्य रूप से रक्त कैंसर (Leukemia), लिम्फोमा, कुछ प्रकार के एनीमिया, थैलेसीमिया, कुछ प्रमुख प्रतिरक्षा तंत्र (Immune system) जैसी कुछ प्रमुख और जन्मजात बीमारियों के विरुद्ध किया जाता है। इसके अलावा कुछ अन्य रोग, जैसे – मधुमेह, पार्किन्सन, रीढ़ की चोट, हृदय रोग आदि पर भी शोध चल रहा है। हालाँकि, इन रोगों के लिए स्टेम सेल से उपचार अभी प्रमाणित नहीं माना जाता।
यहां सवाल ये उठता है कि गर्भनाल को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने से भविष्य में क्या हर बच्चे को इसका लाभ मिलता है तो इस पर विज्ञान स्वयं कहता है कि यह एक आम भ्रांति है कि यदि आप अपने बच्चे के कॉर्ड (Cord) या गर्भनाल को ब्लड बैंक में रखवा देंगे तो भविष्य में हर एक बच्चे की हर एक बड़ी बीमारी का इलाज कर देगा। विज्ञान कहता है कि वास्तव में इसकी आवश्यकता बहुत ही कम लोगों को पड़ती है। यहां तक कि कई रोगों में तो व्यक्ति का अपना स्टेम सेल तक भी उपयोगी नहीं होता और उसके बजाय दूसरे व्यक्ति या डोनर का स्टेम सेल अधिक उपयुक्त होता है। यही कारण है कि अनेक विशेषज्ञ निजी “कॉर्ड ब्लड बैंकिंग” को हर परिवार के लिए इतना आवश्यक नहीं मानते जितना आम मान कर चलते हैं।
क्या भविष्य में इसका दुरुपयोग हो सकता है? –
अब प्रश्न ये भी आता है कि भविष्य में इसका किसी अन्य प्रकार से दुरुपयोग भी हो सकता है तो जानकारों का मानना है कि सैद्धांतिक रूप से देखा जाय तो इसके कुछ जोखिमों पर चर्चा की जा सकती है, जैसे कि बिना अनुमति इसका अन्य शोधों में उपयोग किया जा सकता है। इसी तरह आनुवंशिक यानी DNA संबंधी जानकारी की गोपनीयता का भी उल्लंघन संभव है। साथ ही इसके द्वारा कुछ अवैध जैविक अनुसंधान भी संभव है।
जानकारों का तो यहां तक भी कहना है कि यदि “कॉर्ड ब्लड बैंक” या “प्लेसेंटा बैंक” का सुरक्षा मानक कमजोर पाया जाता है तो डेटा या नमूनों का अन्य प्रकार से भी दुरुपयोग भी संभव है। हालाँकि, भारत में मानव जैविक नमूनों के उपयोग के लिए नियम और नियामक दिशानिर्देश लागू हैं इसलिए किसी भी बैंक का चयन करते समय उसकी विश्वसनीयता, अनुमति और नीतियों की जाँच आवश्यक होती है लेकिन असंभव कुछ भी नहीं है।
क्या प्लेसेंटा से लैब में नया जीव बन सकता है? –
सवाल ये भी उठता है कि क्या प्लेसेंटा या कॉर्ड ब्लड से भविष्य में मनुष्य या ऐसे ही किसी जीव को लैब में बनाया जा सकता है तो विज्ञान और वैज्ञानिकों का उत्तर है कि फिलहाल सीधे कोई नया मनुष्य नहीं बनाया जा सकता लेकिन क्योंकि इनमें DNA होता है और स्टेम सेल भी होते हैं इसलिए भविष्य में शोध, कोशिका आधारित उपचार या सीमित जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग संभव हैं लेकिन किसी व्यक्ति का पूर्ण निर्माण या “क्लोन” केवल प्लेसेंटा या कॉर्ड ब्लड से आज की स्थापित चिकित्सा विज्ञान के अनुसार संभव नहीं है।
धर्म क्या कहता है? –
हिन्दू धर्मग्रंथों में आधुनिक अर्थों में “कॉर्ड ब्लड बैंक” या “प्लेसेंटा बैंक” का उल्लेख नहीं मिलता, क्योंकि यह एकदम आधुनिक चिकित्सा तकनीक होने के साथ ही व्यर्थ की एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग समाज हित में नहीं है परंतु परंपरागत और व्यावहारिक दृष्टि से कुछ बातें देखने को मिलती हैं, जैसे – जन्म के बाद नाल या प्लेसेंटा को शरीर का अस्थायी अंग माना जाता था है। अस्थायी अंग होने के कारण इसको भूमि में सम्मानपूर्वक दबाने या उचित प्रकार से विसर्जित करने की परंपरा रही है। इसके पीछे का उद्देश्य स्वच्छता, सम्मान और धार्मिक शुचिता है अर्थात धार्मिक और पारंपरिक रूप से इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने की प्रथा नहीं रही।
धर्म के अनुसार क्या इसे सुरक्षित रखना चाहिए? –
हालाँकि, इस विषय में कोई सर्वमान्य पौराणिक या शास्त्रीय निषेध या प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो स्पष्ट रूप से कहे कि चिकित्सा प्रयोजन से प्लेसेंटा या नाल को सुरक्षित रखना पाप या निषिद्ध है इसलिए यदि आधुनिक विज्ञान में इसका उद्देश्य भविष्य में होने वाले रोगों के उपचार, जीवन रक्षा और वैज्ञानिक चिकित्सा आदि को लेकर व्यक्ति की सहमति हो तो अनेक आधुनिक हिन्दू विद्वान इसे चिकित्सा उपयोग की श्रेणी में देखते हैं।
प्लेसेंटा को भूमि में दबाने की परंपरा –
सुश्रुत संहिता तथा चरक संहिता के अनुसार यदि प्रसव के बाद अपरा बाहर न निकले (Retained Placenta) तो उसे गंभीर चिकित्सकीय स्थिति माना गया है। इसके उपचार के लिए विभिन्न औषधीय और शल्य उपायों का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय वैद्य प्लेसेंटा के महत्व को समझते थे। शास्त्रों में उल्लेख है कि जन्म के बाद परंपरागत रूप से नाल काटी जाती है, शिशु को स्नान कराया जाता है। इसके बाद जातकर्म संस्कार किया जाता है। भारत के अनेक क्षेत्रों में प्लेसेंटा को स्वच्छ कपड़े में लपेटकर घर के आँगन, खेत या किसी सुरक्षित स्थान पर भूमि में गहराई से दबाया जाता है अर्थात धर्मशास्त्रों का मुख्य ध्यान शिशु के संस्कारों पर है, प्लेसेंटा को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का कोई विधान नहीं मिलता।
क्या वेदों में गर्भनाल उल्लेख है? –
वेदों में गर्भनाल या प्लेसेंटा को आधुनिक तरीकों से सुरक्षित रखने या न रखने जैसा कोई स्पष्ट निर्देश या संकेत उपलब्ध नहीं है जबकि वेदों में गर्भ की रक्षा, स्वस्थ संतान, प्रसूता के कल्याण तथा दीर्घायु के लिए प्रयास और प्रार्थनाएँ करने के उल्लेख हैं अर्थात यहां हम कह सकते हैं कि आधुनिक कॉर्ड ब्लड बैंकिंग जैसी तकनीक पर प्राचीन ग्रंथ स्वाभाविक रूप से मौन हैं।
आयुर्वेद में नाल का वर्णन –
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में प्लेसेंटा यानी गर्भजाल/अपरा को आधुनिक चिकित्सा की तरह अलग विषय के रूप में बहुत विस्तार से नहीं बताया गया है, लेकिन कई आयुर्वेदिक और धर्म-शास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है। आधुनिक विज्ञान के सामने आयुर्वेद का बहुत ही महत्वपूर्ण चिकित्सा-साक्ष्य उपलब्ध है क्योंकि इससे पता चलता है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सकों को नाभिनाल की स्थिति, उसे बाँधने का ज्ञान, काटने और नाभि की देखभाल तथा उसके संक्रमण आदि का व्यावहारिक ज्ञान था।
यदि धार्मिक ग्रंथों से हटकर चरक और सुश्रुत को देखें तो विषय और अधिक स्पष्ट हो जाता है जैसे कि चरक संहिता में प्रसव के बाद नाभिनाल को बाँधने और काटने की विधि दी गई है जिसके अनुसार नाभि से लगभग आठ अंगुल दूरी पर नाल को संभालकर उसे काटने तथा शेष भाग को बाँधने का निर्देश मिलता है। नाभि में संक्रमण या पूय आने पर औषधीय उपचार का भी उल्लेख है।
गरुड़ पुराण में नाल का वर्णन –
गरुड़ पुराण में भी नाल अथवा प्लेसेंटा को सुरक्षित रखने का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालाँकि] इसके विभिन्न प्रकरणों में गर्भ, जन्म, शरीर और नाभि से संबंधित धार्मिक/दार्शनिक अवधारणाएँ मिलती हैं। उदाहरणतः नाभि को मंत्र-न्यास में एक महत्वपूर्ण शारीरिक केंद्र के रूप में लिया गया है लेकिन ऐसा प्रमाणित संकेत नहीं मिलता जिसमें कहा गया हो कि जन्म के बाद प्लेसेंटा को अमुक स्थान पर दफनाना अनिवार्य है या सुरक्षित भी रखा जा सकता है इसलिए इंटरनेट पर प्रचलित दावों को “गरुड़ पुराण का आदेश” कह देना भी उचित नहीं होगा।
जन्म के बाद “नाल” –
भारत के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक और आध्यात्मिक तरीकों से कई समुदायों में प्रसव के बाद “नाल” के रूप में निकलने वाले गर्भजाल/अपरा को अशुद्ध या जैविक अवशेष मानकर उसे जमीन में दबाने की परंपरा रही है। कुछ क्षेत्रों में उसे गड्ढे में रखकर मिट्टी से ढका जाता है तो कुछ क्षेत्रों में उसके साथ हल्दी, नमक, राख, गोबर, अनाज या अन्य स्थानीय पदार्थ रखने की लोकपरंपराएँ मिलती हैं। कुछ समुदायों में इसे बच्चे के भविष्य, सुरक्षा या भूमि से उसके संबंध से जोड़ने की मान्यताएँ भी रही हैं।
