Homeधर्मतीर्थ यात्राआन्ध्र, कर्नाटक तथा केरल के कुछ प्रसिद्ध गणेश मंदिर

आन्ध्र, कर्नाटक तथा केरल के कुछ प्रसिद्ध गणेश मंदिर

हम्पी – विजयनगर – राज्य की इस प्राचीन राजधानी को अब ‘हम्पी’ कहा जाता है । इसका घेरा चौबीस मील हम्पी के मध्य में श्रीविरूपाक्ष – मन्दिर है । यह मन्दिर हॉस्पेट से नौ मील दूर है। विरूपाक्ष के निज मन्दिर के उत्तरवाले मण्डप में भुवनेश्वरी देवी की प्रतिमा है और उनसे पश्चिम पार्वतीजी विराजती हैं। उनके समीप ही श्रीगणेशजी तथा नवग्रह विराजमान हैं। विरूपाक्ष- मन्दिरसे अग्निकोण में पास ही ऊँची भूमि पर एक मण्डप में लगभग बारह हाथ ऊँची बड़े गणेशजी की मूर्ति है। बड़े गणेशजी से थोड़ी दूर दक्षिण-पश्चिम एक छोटे मण्डप में छोटे गणेशजी की भग्नमूर्ति है। यह स्मरण रखने की बात है कि यह हम्पी – नगर दक्षिण के वैभवशाली राज्य विजयनगर की राजधानी थी। दक्षिण के मुसलमानी राज्यों के सम्मिलित आक्रमण से यह राज्य ध्वस्त हुआ । आक्रमणकारियों ने उसी समय और पीछे भी यहाँ के मन्दिरों तथा मूर्तियों को नष्ट-भ्रष्ट किया।

कुमारस्वामी – यह सुंडूर से छ: मील की दूरी पर पड़ता है। यहाँ पर्वत पर स्वामिकार्तिकेय का भव्य मन्दिर है। मुख्य मन्दिर के पास हेरम्ब- गणपति का मन्दिर है । कहा जाता है कि गणेशजी और स्वामिकार्तिकेय में कुछ विवाद हो गया था। गणेशजी का विवाह पहले हो गया; इससे रुष्ट होकर स्वामिकार्तिकेय कैलास छोड़कर दक्षिण चले आये और यहीं क्रौंचगिरि पर उन्होंने अपना निवास बनाया। पीछे स्वामिकार्तिकेय के स्नेहवश भगवान् शंकर तथा पार्वतीजी भी कैलास से दक्षिण आकर श्रीशैलपर स्थित हुए।

गोकर्ण – समुद्र-तट पर छोटी पहाड़ियों के बीच में गोकर्ण एक छोटा नगर है। यह हुबली से सौ मील है। गोकर्ण में भगवान् शंकर का आत्मतत्त्वलिंग है। महाबलेश्वर- मन्दिर में आत्मतत्त्वलिंग का दर्शन करके गर्भगृह से बाहर आने पर सभा मण्डप में गणेश तथा पार्वती की प्रतिमाएँ मिलती हैं। महाबलेश्वर-मन्दिर के पास चालीस कदम पर सिद्धगणपति की मूर्ति है। इसमें गणेशजी के मस्तक पर रावण द्वारा आघात करने के चिह्न हैं। इनका दर्शन-पूजन करके ही आत्मतत्त्वलिंग के दर्शन-पूजन की विधि है । इसकी कथा इस प्रकार है-
कहते हैं कि एक बार रावण ने कैलास पर तपस्या करके भगवान् शंकर से आत्मतत्त्वलिंग प्राप्त किया। रावण जब गोकर्ण-क्षेत्र में पहुँचा, तब संध्या होने को आयी। रावण के पास आत्मतत्त्वलिंग होने से देवता बड़े चिन्तित थे। उनकी माया से रावण को शौचादि की तीव्र आवश्यकता हुई। देवताओं की प्रार्थना से गणेशजी वहाँ रावण के पास ब्रह्मचारी के रूप में उपस्थित हुए। रावण ने उन ब्रह्मचारी के हाथ में वह लिंग-विग्रह दे दिया और स्वयं शौचादि से निवृत्त होने के लिये चला गया। इधर सहसा मूर्ति भारी हो गयी। ब्रह्मचारी बने गणेशजी ने तीन बार नाम लेकर रावण को पुकारा; पर वह नहीं आ पाया और उसके न आने पर उस ब्रह्मचारी ने मूर्ति को पृथ्वी पर रख दिया।

रावण शौचादि से निवृत्त होकर जब वहाँ आया तो वह बहुत परिश्रम करने पर भी उस मूर्ति को उठा न सका। खीझकर उसने गणेशजी के मस्तक पर प्रहार किया और निराश होकर लंका को चला गया। रावण के प्रहार से व्यथित गणेशजी वहाँ से चालीस कदम जाकर खड़े रह गये। भगवान् शंकर ने प्रकट होकर उन्हें आश्वासन दिया और वरदान दिया कि ‘तुम्हारा दर्शन किये बिना जो मेरा दर्शन-पूजन करेगा, उसे उसका पुण्यफल नहीं प्राप्त होगा।’ गोकर्ण के ‘पट्टविनायक’ और ‘केतकी – विनायक’ भी दर्शनीय हैं।

रेजंतल – यह स्थान जहिराबाद रोड (बीदर ) – के पास है । यहाँ का गणेश मन्दिर पर्वत की गोद में स्थित है। ये शिवप्रभु महागणपति अद्भुत चमत्कारी हैं। कहते हैं, शक संवत् १७२३ पौष शुक्ल की विनायकीचतुर्थी के दिन गणेशभक्त श्रीशिवराम महाराज चिंतलगिरि ने पूजा के समय ‘जय सिद्धविनायक’ कहकर भूमि पर हाथ रखा। तत्काल श्रीशिवप्रभु महागणपति की मूर्ति भूमि से साकार प्रकट हो गयी। पश्चात् महाराज ने यथाविधि उसकी पूजा की। तभी से इसकी बड़ी मान्यता है।

अइनविल्लि – प्रसिद्ध शैवक्षेत्र मुक्तीश्वरम् से एक किलोमीटर पर अइनविल्लि में गणपति-क्षेत्र तथा तीन किलोमीटर पर भगवान् षण्मुख का क्षेत्र है। अइनविल्लि में स्थित गणपति बड़े प्रसिद्ध तथा प्रत्यक्ष फलदायक हैं।

(फ्रेंच) यानाम् – गोदावरी-तट पर स्थित यहाँ का गणपति मन्दिर प्रसिद्ध है। यह मन्दिर दक्षिणाभिमुख है । यहाँ के गणपति भी प्रत्यक्ष फलदायक कहे जाते हैं । साठ वर्ष पूर्व एक साधु ने इस गणपति- मन्दिर में रहकर सैकड़ों रोगियों को आरोग्य-दान दिया था।

भद्राचलम् — राजमहेन्द्री से भद्राचलम् लगभग अस्सी मील है। गोदावरी के किनारे भगवान् श्रीरामका यह प्राचीन मन्दिर है। मुख्य मन्दिर के अतिरिक्त अन्य मन्दिरों में हनुमान्, गणेश आदि देवता प्रतिष्ठित हैं।

विजयवाड़ा – राजमहेन्द्री से तिरानबे मील पर बैजवाड़ा (विजयवाड़ा) एक प्रसिद्ध नगर है। विजयवाड़ा में एक पर्वत पर पुराना जीर्ण-शीर्ण किला है । उसमें चट्टान काटकर कई बौद्धगुफाएँ बनी हैं। विजयवाड़ा नगर के पूर्वोत्तर बड़ी पहाड़ी के पादमूल में एक छोटी गुफा में श्रीगणेशजी की मूर्ति है।

कुरूडमडे (कर्नाटक) — मन्दिर का महाद्वार, प्राकार तथा मुखमण्डप विजयनगर-कालका है । मन्दिर में हरे संगमरमर की श्रीसुब्रह्मण्यम् की मूर्ति है। मन्दिर के गर्भगृह में महागणपति की हरे संगमरमर की मूर्ति है। इसकी कारीगरी प्रमाणबद्ध एवं सुन्दर है। मूर्ति के आगे एक बड़ा चूहा है।

इडगुंजी (कर्नाटक) – यहाँ के पंचखाद्यप्रिय महागणपति की मूर्ति द्विहस्त तथा सर्पालंकारभूषित है। ये गणेशजी बाल ब्रह्मचारी हैं।

कोक्कड (कर्नाटक) — कोक्कड-गाँव में एक मैदान में एक पेड़ के नीचे ये गणेशजी हैं । यहाँ के चरवाहे इन गणेशजी को ककड़ी का नैवेद्य चढ़ाते हैं। इनका कोई मन्दिर नहीं बना; क्योंकि गणेशजी ने सपने में आकर मन्दिर बनाने के लिये मना कर दिया था।

मंगलूर (कर्नाटक) – यहाँके ‘शरऊ-गणपति’ कर्नाटक एवं केरल राज्यों में जाग्रत्-देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इस मूर्ति की स्थापना एक तान्त्रिक ने की थी। यहाँ की विशेष बात यह है कि यहाँ पर कुटुम्बी लोग ही गण-हवन करने आते हैं। गणेश-चतुर्थी को यहाँ एक हजार नारियल फोड़े जाते हैं।

कासरगोड – केरल में मद्रास – मंगलोर रेलवे लाइन पर कासरगोड स्टेशन है। यह स्थान पयस्विनी नदी पर है। श्रीसमर्थ स्वामी रामदास, पुरन्दरदास आदि संत इस स्थानपर आये और रहे थे। इस स्थान के पास ही माधुरे नामक स्थान पर श्रीमहागणपति – मन्दिर है। कहते हैं, यह प्रतिमा स्वयं उद्भूत है। एक बार एक हरिजन- स्त्री घास के मैदान में घास काट रही थी। अचानक उसका हँसिया प्रतिमा से जा टकराया। उस समय गणपति की प्रतिमा ३×१३ इंच बाहर निकली हुई थी। हँसिया लगने से, कहते हैं कि उनके अंग से रक्त बहने लगा। स्त्री अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गयी और उसने अन्य लोगों को बुलाया। लोगों ने इसी समय वहाँ पर भगवान् का गर्भगृह बना दिया और पूजा प्रारम्भ हो गयी। यह घटना आठ सौ वर्ष पुरानी कही जाती है। तबसे मूर्ति लगातार बढ़ती जाती है। अब वह १०x४३ इंच की हो गयी है तथा उसने प्रायः समूचे गर्भगृह को ढक लिया है।

कर्नाटक में कुमढ़ा के लवणेश-गणपति, अग्निहोत्र- गणपति और चिंतामणि- गणपति, शिशी के महागणपति, सिद्धापुर के सिद्ध-गणपति और मधुरै के मदनेश्वर- सिद्धि विनायक का दर्शन भक्तों को करना चाहिये। कर्नाटक- प्रदेश के श्रीक्षेत्र धर्मस्थल, मुंडाजे, कारकल, सेडी, कुणीगल, हलेविद, कडलेकालु, बेलूर, मुत्तुर, शिरानी, अणेगड्डे, गिब्बलगुड्डे, कोडसाद्री, तंबढे, गिरकेमठ, लंबापुर, उरकेरी, हालनगद्दे, अग्रहार, बनवामी, शृंगेरी आदि स्थानों के श्रीगणेश मन्दिर एवं विग्रह दर्शनीय हैं। भक्तों को आन्ध्रप्रदेश के द्राक्षाराम तथा आरासवल्लीला की गणपति प्रतिमाओं का भी दर्शन करना चाहिये।  (लेखक – श्रीचल्लपल्लि भास्कर रामकृष्णमाचार्युलु एवं श्रीमाणिकराव कोहिरकर)
साभार – श्रीगणेश-अंक से

admin
adminhttp://dharmwani.com
देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments