Wednesday, July 29, 2026
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छात्र आंदोलन में ‘संस्कारी’ वर्ग की भागीदारी और प्रमाण

अचानक देश के तथाकथित ‘संस्कारी’ वर्ग को भाषा के उच्च मानक याद आ गए हैं। छाती पीटी जा रही है, मातम मनाया जा रहा है कि — “हे भगवान! ये जेन-जी (Gen-Z) कितनी बदतमीज और गालीबाज़ हो गई है।”

वाह! क्या बात है। ये ज्ञान की गंगा बहा भी कौन रहे हैं? वही ‘गालीबाज़ ट्रोल आर्मी’ जिनका सूर्योदय फेसबुक पर ‘जय श्री राम’ या किसी ईश्वर/फूल की डीपी के पीछे छुपकर होता है, और फिर दिन भर महिलाओं के लिए ‘रंडी’, ‘कुतिया’ या ‘धारा 377’ छाप यौनिक गालियाँ उगलने के बाद रात को ‘राधे-राधे’ लिखकर सो जाते है। असली जीवन में ‘सभ्य और संस्कारी’ मुखौटा पहने इन लोगों का असली चरित्र तो तब बाहर आता है जब ये फेक प्रोफाइल का नक़ाब ओढ़ते हैं। असल चेहरे में तो इनका मुखौटा होता है, असली नग्नता तो इनकी फेक डीपी के पीछे दिखती है।

अरे भाई, तुम्हें जलन भाषा से नहीं है। जलन इस बात की है कि इस नई पीढ़ी के टीन-एजर्स और युवाओं ने तुम्हारे जैसे किसी ‘पहचान’ या ‘संस्कार’ के झूठे लबादे के बिना, अपने असली चेहरे और असली आवाज के साथ वह सब कह दिया, जो तुम अपनी कुंठाओं में कभी कह ही नहीं पाए। इन्होंने सभ्यता में लिपटी तुम्हारी झूठी भाषा के दोहरे मानकों को एक झटके में तोड़ दिया।

हाँ, उन्होंने गालियाँ दीं, टैबू शब्दों का इस्तेमाल किया (जिसका समर्थन कोई नहीं करता)। लेकिन ध्यान रहे—वे ऑनलाइन हों या ऑफलाइन, अपनी 100% ऑर्गेनिक पहचान के साथ हैं, वे तुम्हारी तरह ‘हवसी’ और छद्म-संस्कारी नहीं हैं।

slogans in student movement at Jantar Mantar in hindi Students Protest at Jantar Mantar New Delhi-1

गाली का ठेका और ‘संस्कारों’ का एकाधिकार –
प्रधानमंत्री जी या किसी भी शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को गाली देना गलत है, मैं भी इसे गलत मानती हूँ। पर जनाब, आपका दोहरा मापदंड तो देखिए—तकलीफ इस बात से है कि लड़कियों ने गाली क्यों दी? क्यों भाई? क्या गालियाँ बकने का ‘कॉपीराइट’ सिर्फ लड़कों के पास है?

आज लड़कियों के संस्कारों पर उंगली उठाने वालों, सुनो! कोई माँ-बाप अपने बच्चे को गाली देना नहीं सिखाता। बच्चा समाज से सीखता है।

सवाल तो उस समाज से है— जहाँ ज़्यादातर गालियाँ औरतों के वजूद और उनके गुप्तांगों पर ही क्यों बनीं? किसने बनाईं और क्यों धड़ल्ले से इस्तेमाल की गईं? तब यह संस्कारी जमात कहाँ सो रही थी? क्या समाज के पास इसका कोई जवाब है? बिल्कुल नहीं!

‘धुरंधर’ देखकर ताली बजाने वाले संस्कारी लोटे –
ज़रा अपनी सहूलियत का चश्मा उतारकर देखिए। जिन लोगों ने ‘मिर्ज़ापुर’ और ‘धुरंधर’ जैसी वेब सीरीज़ और फ़िल्मों को रिपीट मोड में देख-देखकर अपने वीकेंड का मनोरंजन किया, ऐसे कंटेंट को ब्लॉकबस्टर बनाया… आज वही लोग जब Gen-Z की भाषा पर प्रवचन देते हैं, तो बिन पेंदे के लुढ़कते लोटे जैसे लगते हैं।

Students Protest at Jantar Mantar New Delhi-1

जब नेशनल टीवी पर प्रवक्ताओं की अमर्यादित भाषा को जायज ठहराया जाता है, जब संसद में भाषाई मर्यादा की धज्जियाँ उड़ती हैं, तब तुम्हारे संस्कार कहाँ घास चरने जाते हैं? क्या आज तक किसी ‘संस्कारी’ ने मुद्दा उठाया कि फिल्मों, सीरीज़ और यूट्यूब पर गालियाँ प्रतिबंधित हों? क्या कभी माँग की कि पब्लिक प्लेस पर गाली देने वाले को सजा मिले या बच्चे जहाँ से गाली सीख रहे हैं उस सोर्स पर कार्रवाई हो?

नहीं। क्योंकि तुम्हें तो हर वीकेंड गालियों पर तालियाँ बजाने का चसका है।
मैनिफेक्चरिंग से लेकर डिलीवरी तक… प्रोडक्ट तो आपका ही है।

लीजिए, जरा अपना रिपोर्ट कार्ड भी देख लीजिए –
> पैदा किया आपने,
> परवरिश दी आपने,
> हाथ में मोबाइल थमाया आपने,
> वाई-फाई रिचार्ज कराया आपने,
> कंटेंट क्रिएटर बनने की छूट दी आपने,
> डीजीटल क्रिएटर कहकर पुकारा आपने,
> ‘मिर्ज़ापुर’ और गालियों वाला ट्रेंड फैलाया आपने…

जब तक ये Gen-Z क्रिएटर सोशल मीडिया से पैसा छाप-छापकर आपको दे रहे थे तब तो बड़े अच्छे लग रहे थे लेकिन अब जब उन्होंने अपनी क्रिएटिविटी का प्रयोग अपने अधिकारों‌ के लिए किया तो सबको संस्कार याद आ गए और रिएक्शन तो देखिए कैसे रिएक्ट कर रहे हैं…. छी। यह तो हमारी औलाद नहीं है।

और यह रिएक्शन ठीक उसी तरह से है जैसे दो जवान लोग पहले अपनी हवस की पूर्ति करते हैं और‌ जब लड़की बिन ब्याही मां बनी जाती है तब दोनों डिसाइड करते हैं कि यह बच्चा या तो किसी कचरे के डब्बे में डाल देते हैं या किसी अनाथ आश्रम के बाहर पालने में पटक देते हैं क्योंकि यह हमारा नहीं है हमें तो संस्कारी रूप धारण करने के बाद पूरे रीति रिवाज से शादी करके बच्चा पैदा करना होगा वरना समाज क्या कहेगा।

साथ सोते टाइम तुम्हें यह संस्कार याद नहीं आए,
बस यही सेम फीलिंग ये सो काल्ड संस्कारी लोग दे रहे हैं…

अब जब ये ‘क्रिएटिव क्रांतिकारी’ बन गए, तो पेट में दर्द हो रहा है?
> सर जी, मैनिफैक्चरिंग से लेकर डिलीवरी तक—ये Gen-Z का ये दिमाग आपका ही ब्रांड है!

‘गांडू’, ‘झाँटू’, ‘लौड़ा-लहसुन’ जैसी शब्दावली कोई ZenG पेट से सीखकर नहीं आई थी। यह पिछली पीढ़ी की ही दी हुई ‘विरासत’ है, जो अब घूमकर उसी पीढ़ी के मुँह पर तमाचा बनकर टूट पड़ी है।

‘ओके ब्रो’, ‘लोल’ भेन…चो … मादर चो… ये पिछली पीढ़ी की भाषा है। लेकिन इस पीढ़ी को अब अचानक बदतमीज कहना तुम्हारे दोगलेपन की पराकाष्ठा है।

सलाम इन बच्चों को, और लानत उस सोच को –
सच तो यह है कि सारा ‘संस्कार’ सहेजने का ठेका आज की पीढ़ी ने ही नहीं ले रखा। ये बच्चे हम बड़ों से ज़्यादा समझदार और स्मार्ट हैं। जो जैसा बोलता और करता है, ये उसको उसी भाषा में आइना दिखा देते हैं।

इस आंदोलन में इन बच्चों ने बड़ों को प्रेरित किया है। इनका साल खराब हुआ, इनका भविष्य दाँव पर है, इनके अभिभावक टैक्स भरते हैं—तो गुस्सा क्यों न आए? इनकी समझदारी, संयम और हौसले को सलाम है।

और लानत है उस दोहरा चरित्र जीने वाले समाज पर, जिसकी भाषा में खुद ‘साला’, ‘हरामज़ादा’ और ‘मादरचोद’ भरा पड़ा है, लेकिन जो दूसरों को संस्कार का पाठ पढ़ाने का ढोंग रचाता है।

साभार – Anu Writes की वाल से

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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