पौराणिक कालगणनानुसार आज से ५,२५४ वर्ष पूर्व (३२२८ ई.पू.) भगवान् श्रीकृष्ण का आविर्भाव महाभारतकालीन मथुरा के शासक कंस के कारागार में हुआ। कंस का वह कारागार ‘कटरा केशवदेव’ कहलाता है। विद्वानों के मतानुसार आज का ‘कटरा केशवदेव’ ही प्राचीन मथुरा का केन्द्रस्थान है। विदेशी विद्वान् कनिंघम तथा ग्राउस ने मथुरा के प्राचीन इतिहास का अनुसन्धान करने के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘कटरा केशवदेव’ के उत्तर-पश्चिम की ओर फैले हुए खण्डहरों का सिलसिला ही प्राचीन मथुरा नगर है। पुरातत्त्व-विभाग की खोजों से, ‘कटरा केशवदेव’ में प्राप्त हुए अवशेषों से तथा विदेशी यात्रियों के वर्णनों से भी इस बात का पता चलता है कि इस स्थान पर अनेकानेक भव्य मन्दिरों का निर्माण समय-समय पर हुआ था। परन्तु उनमें से कुछ तो काल के प्रभाव से नष्ट हो गये और कुछ को विदेशी आक्रान्ताओं ने नष्ट कर दिया।
पौराणिक कथा और जनश्रुति के अनुसार इस स्थान पर सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने मुनि शाण्डिल्य की आज्ञा से अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मन्दिर बनवाया था। पुरातत्त्व की दृष्टि से सबसे पुराना शिलालेख महाक्षत्रप शोडास के समय (८०-५७ ई.पू.) का मिला है। यह ब्राह्मी-लिपि में लिखा हुआ है जिससे पता चलता है कि शोडास के राज्यकाल में ‘वसु’ नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्णजन्मस्थान पर एक मन्दिर, तोरणद्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। उसके पश्चात् दूसरा बड़ा मन्दिर ४०० ई. के लगभग सम्राट् चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में बना। उस समय मथुरा नगरी संस्कृति एवं कला का एक बड़ा केन्द्र थी और यहाँ हिंदू-धर्म के साथ-साथ बौद्ध तथा जैन-धर्म का भी उत्कर्ष था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा निर्मित इस भव्य मन्दिर को महमूद गजनवी ने सन् १०१७ ई. में लूटा और तोड़ा। इस विशाल मन्दिर का तथा मथुरा की तत्कालीन समृद्धि का वर्णन स्वयं महमूद गजनवी के मीर मुंशी अल्-उत्-नवी ने अपनी ‘तारीख़-ए-यामिनी’ नामक पुस्तक में इस प्रकार किया है- ‘महमूद ने एक निहायत उम्दा इमारत देखी, जिसे लोग इन्सान की न मानकर देवनिर्मित मानते थे। शहर के बीचोंबीच एक बहुत बड़ा आलीशान मन्दिर था जो सबसे ज़्यादा खूबसूरत था। उसका बयान लफ़्जों या तस्वीरों से नहीं किया जा सकता। सुल्तान महमूद ने इस मन्दिर के बाबत खुद लिखा है कि अगर कोई आदमी इस तरह की इमारत बनवाना चाहे, तो उसे 10 करोड़ दीनार (सोने की अशर्फियाँ) खर्च करने पड़ेंगे और उसको बनवाने में २०० साल से कम नहीं लगेंगे, चाहे उसके लिये ऊँचे-से-ऊँचे तजुर्बेकार कारीगरों को ही क्यों न लगा दिया जाये।’
संवत् १२०७ (११५० ई.) में, जब महाराजा विजयपालदेव मथुरा के शासक थे, ‘जज्ज’ नामक एक व्यक्ति ने श्रीकृष्णजन्मस्थान पर एक नया मन्दिर बनवाया। इसकी जानकारी ‘कटरा केशवदेव’ से प्राप्त एक संस्कृत-शिलालेख से लगता है। सन् १५१५ ई. के लगभग चैतन्य महाप्रभु इस मन्दिर में पधारे थे।
यह विशाल एवं भव्य मन्दिर भी सिकन्दर लोदी के शासनकाल अर्थात् 16वीं शताब्दी के आरम्भ में नष्ट कर दिया गया। इसके लगभग १२५ वर्ष बाद जहाँगीर के शासनकाल में, ओरछा के राजा वीरसिंहदेव बुन्देला ने उसी जन्मस्थान पर लगभग २५० फीट ऊँचा ३३ लाख रुपये की लागत से एक दूसरा भव्य मन्दिर बनवाया और उसके चारों ओर ऊँची प्राचीर बनवायी। उस प्राचीर के दक्षिण-पूर्व कोने में एक विशाल कुआँ और उसके ऊपर एक ऊँचे बुर्ज (स्तम्भ) का निर्माण हुआ। उस कुएँ का पानी लगभग ६० फीट ऊँचा उठाकर मदिर के प्रांगण में फव्वारे चलाए जाते थे।
फ्रांसीसी यात्री जीन बैपटिस्ट टेवर्नियर (१६०५-१६८९) ने भी अपने यात्रा-वृत्तान्त में श्रीकृष्णजन्मस्थान पर निर्मित केशवदेव मन्दिर की ऊँचाई और भव्यता का अद्भुत वर्णन किया है। इसी तरह इतालवी अन्वेषक निक्कोलो मनूची (१६३८-१७१७) भी भारत में बहुत वर्षों तक रहा और उसने भी केशवदेव मन्दिर का वर्णन किया है।
इस भव्य मन्दिर को मुग़ल-शासक औरंगजेब ने सन् १६६९ में नष्ट कर दिया और मन्दिर के ही एक भाग पर ध्वस्त मन्दिर के मलबे से एक ईदगाह बनवा दी। सन् १८०३ ई. में मथुरा का प्रदेश ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया। सन् १८१५ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ‘कटरा केशवदेव’ को नीलाम कर दिया, जिसे बनारस के तत्कालीन राजा पटनीमल (१७७०-१८४४) ने खरीदा। उनकी प्रबल इच्छा थी कि जन्मस्थान पर भगवान् केशवदेव के मन्दिर का पुनर्निर्माण करा दिया जाय। परन्तु उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। उनके बाद उनके उत्तराधिकारी वंशजों का अधिकार एवं स्वामित्व कटरा केशवदेव पर बना रहा। मथुरा के मुसलमानों ने दो बाद सिविल कोर्ट में कटरा के तत्कालीन स्वामी राय कृष्णदास के अधिकार को चुनौती दी। परन्तु उनकी पराजय हुई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों बार यह फ़ैसला दिया कि कटरा पर राय कृष्णदास का ही वास्तविक स्वत्व एवं अधिकार है।
भारतभूषण महामना पं. मदनमोहन मालवीयजी (१८६१-१९४६) का भक्ति-विभोर हृदय उपेक्षित श्रीकृष्णजन्मस्थान के खण्डहरों को देखकर द्रवित हो उठा। उन्होंने इसके पुनरुद्धार का संकल्प लिया। उसी समय सन् १९४३ के लगभग ही बाबू जुगलकिशोर बिरला (१८८३-१९६७) मथुरा पधारे और श्रीकृष्णजन्मभूमि की ऐतिहासिक भूमि के दर्शनार्थ गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनका हृदय अत्यन्त दुःखित हुआ। इधर मालवीयजी ने बिरलाजी को श्रीकृष्णजन्मस्थान की दुर्दशा के सम्बन्ध में पत्र लिखा और उधर बिरलाजी ने उनको हृदय की व्यथा लिख भेजी।
महामना मालवीयजी की प्रेरणा से दिनांक ०८ फरवरी, १९४४ को श्री जुगलकिशोर बिरला ने कटरा केशवदेव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारी सुप्रसिद्ध कला-इतिहासकार श्री राय कृष्णदास (१८९२-१९८०) से खरीद लिया। महामना इस मन्दिर के पुनर्निर्माण के लिये इतने चिन्तित थे कि कटरा केशवदेव के विक्रय-पत्र का विलेख उन्होंने स्वयम् अपने नाम से तैयार किया था और फिर मथुरा में उसी की रजिस्ट्री हुई।
परन्तु महामना ने श्रीकृष्णजन्मभूमि के पुनरुद्धार की जो योजना बनायी थी, वह उनके जीवनकाल में पूरी न हो सकी। उनके देहावसान (१२.११.१९४६) के कुछ ही दिन पहले जब सुप्रसिद्ध एडवोकेट तथा अवकाशप्राप्त ज़िला न्यायाधीश श्री द्वारकानाथ भार्गव तथा श्री देवधर शर्मा उनसे मिले, तब महामना ने श्रीकृष्णजन्मस्थान का पुनरुद्धार अपने जीवनकाल में न देख सकने की मार्मिक वेदना व्यक्त करते हुए यह उद्गार प्रकट किया : ‘‘मुझे अपने सहयोगी सेठ जुगलकिशोरजी बिरला पर पूरा भरोसा है। जिस प्रकार उन्होंने हमारे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ-मन्दिर का निर्माण-कार्य प्रारम्भ कर दिया है, उसी प्रकार श्रीकृष्णजन्मस्थान के पुनरुद्धार-कार्य को भी आगे बढ़ायेंगे और उनको देश के समस्त श्रीकृष्णप्रेमियों का सहयोग प्राप्त होगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने पावन जन्मस्थान को अब अधिक दिनों तक दुर्दशाग्रस्त नहीं रहने देंगे और उसका पुनरुद्धार होकर रहेगा।’’ महामना की अन्तिम इच्छानुसार बिरलाजी ने श्रीद्वारकानाथ भार्गव के परामर्श से दिनांक 21 फरवरी, 1951 को श्रीकृष्णजन्मभूमि ट्रस्ट के नाम से एक न्यास स्थापित किया।
दिनांक ०८ फरवरी १९४४ को ‘कटरा केशवदेव’ नामक १३.३७ एकड़ की जो ज़मीन राजा पटनीमल के उत्तराधिकारी राय कृष्णदास द्वारा महामना मालवीय, गोस्वामी गणेशदत्त एवं भीखनलाल आत्रेय को १३,४००/-रुपये में एक रजिस्टर्ड डीड द्वारा बेची गई थी और जिसकी खरीद के लिए महामना को वित्तीय सहायता बाबू जुगलकिशोर बिड़ला द्वारा प्रदान की गई थी, उस डीड का पाठ इस प्रकार है :
मैं राय कृष्णदास, पिता का नाम स्वर्गवासी राय प्रह्लाददासजी और मेरा पुत्र राय आनंदकृष्ण, जाति वैश्य अग्रवाल, निवासी रामघाट, काशी के हैं. आगे हम लोगों की एक कित्ता जमीन जिसका नंबर पहले बंदोबस्त सन् १३१२ फसली में २९१ था और हाल बंदोबस्त में २५५ है तथा जिसका रकबा १३ एकड़ ३७ डिसमल है और जो कटरा केशवदेव के नाम से विख्यात है, मथुरा में स्थित है. उक्त भूभाग को हमारे पूर्वज राजा पटनीमल्ल बहादुर ने कंपनी सरकार से १६ मार्च सन् १८१५ ई. को खरीद किया था और खरीददारी की तारीख से उसपर अपना पूर्ण स्वत्व तथा अधिकार रखते थे. उक्त राजा साहब के दो पुत्र राय श्री कृष्ण तथा राय रामकृष्ण थे और उक्त राय श्रीकृष्ण के दो पुत्र राय नारायणदास तथा राय नरसिंहदास थे और उक्त राय रामकृष्ण के चार पुत्र राय केशवराय, राय सीताराम, राय पुरुषोत्तमदास और राय विष्णुचंद्र थे. उक्त राय श्रीकृष्ण और राय रामकृष्ण के देहावसान के पश्चात् उक्त भूभाग के अधिकारी तथा पूर्ण मालिक उन लोगों के उक्त छ: पुत्र हुए और इन दोनों शाखाओं के बंटवारे में उक्त भूभाग के मालिक राय नारायणदास तथा राय नरसिंहदास हुए और उन्हीं का नाम भी खेवट इत्यादि पर चढ़ा था और उन्हीं का पूर्ण अधिकार उक्त भूभाग पर था तथा वही उसकी आय इत्यादि लेते रहे और उसका पूर्ण प्रबंध मालिकाना करते रहे, तत्पश्चात् उक्त दोनों भाइयों के बंटवारे में उक्त भूभाग राय नरसिंहदास के अंश में आया और उनके स्वत्व तथा अधिकार में रहा और उनके पश्चात् उनके एकमात्र पुत्र, मुझ राय कृष्णदास के पिता राय प्रह्लाददास का भूभाग के मालिक तथा अधिकारी हुए और अब हम दोनों, राय कृष्णदास और मेरे पुत्र राय आनंदकृष्ण उसके पूर्ण मालिक तथा एकमात्र उत्तराधिकारी हैं. सन् १९२० ई. में जब कटरा केशवदेव के एक हिस्से पर स्थित गंगामंदिर की मरम्मत उसके मालिक पंडित प्रह्लाद जी करा रहे थे तो मथुरा के मुसलमानों ने उन्हें रोका था और यह दावा किया था कि मंदिर की जमीन मुसलमानों की जायदाद है और वे उसपर काबिज हैं. यह मामला अदालत में पेश हुआ और अदालत ने फैसला दिया कि जमीन राजा पटनीमल्ल और उनके वारिसों की है, मुसलमानों की नहीं. यह फैसला अपील में भी कायम रहा. देखो मुकदमा दीवानी नं. ७६, सन् १९२० ई., अदालत सब जजी, मथुरा. सन् १९२८ ई. में मथुरा के मुसलमानों ने कटरा केशवदेव की जमीन पर फिर अपना हक कायम करने की कोशिश की थी लेकिन वे नाकामयाब रहे. मुंसिफी से हाईकोर्ट तक हार गए और तीनों अदालतों ने यह फैसला दिया कि यह जमीन राजा पटनीमल्ल के वंशज हमलोगों की है. देखो मुकदमा दीवानी नं. ५४७, १९२८ ई. अदालत मुंसिफी, मथुरा, मुकदमा अपील नं. १३१, १९३२ ई., अदालत सब जजी, मथुरा और मुकदमा अपील नं. ६९१, १९३५ ई., अदालत हाईकोर्ट, इलाहाबाद. उक्त भूभाग की बिक्री आदि करने का हम लोगों को पूरा अधिकार है, उक्त भूभाग से हम लोगों को कोई विशेष आय नहीं है और बनारस से दूर होने के कारण उसके प्रबंध तथा देखभाल में बहुत असुविधा पड़ती है और व्यय अधिक होता है तथा इस समय उसको लेने के लिये महामना श्री पं. मदनमोहन मालवीय जी, सभापति, अखिल भारतीय सनातनधर्म महासभा, काशी; गोस्वामी गणेशदत्त जी, प्रधानमंत्री, सनातनधर्म प्रतिनिधि सभा, पंजाब, लाहौर और डॉ. भीखनलालजी आत्रेय, प्रोफेसर, फिलासफी, हिंदू विश्वविद्यालय, काशी उद्यत हैं तथा वे उसको लेकर श्रीकृष्णजन्मभूमि मंदिर का, जो आदि में इस भूभाग पर था तथा जिसको औरंगजेब ने गिरवा दिया था, यथासंभव उद्धार करना चाहते हैं जो कि हमको भी अभीष्ट है क्योंकि इसी उद्देश्य से हमारे मूल पुरुष उक्त राजा साहब ने इसका क्रय किया था. उक्त भूभाग का मूल्य १३४०० रु. अंकन तेरह हजार चार सौ रुपए में खर्च के उक्त महामना श्री पं. मदनमोहन मालवीय जी, गो. गणेशदत्तजी तथा डा. भीखनलाल जी आत्रेय दे रहे हैं जो कि हमलोगों की समझ में सब स्थिति को देखते हुए, उचित है. इसलिये हम दोनों अर्थात राय कृष्णदास और राय आनंदकृष्ण प्रसन्नतापूर्वक बिना किसी दबाव के भली भांति समझ बूझकर यह विक्रयपत्र उक्त भूभाग के विषय में, जिसका विवरण ऊपर लिखा हुआ है और जिसकी चौहद्दी नीचे दी हुई है, उक्त महामना श्री पं. मदनमोहन मालवीय जी महाराज, गो. गणेशदत्त जी तथा डा. भीखनलालजी आत्रेय के प्रति लिखकर अपने को तथा अपने प्रतिनिधियों एवं उत्तराधिकारियों को नीचे लिखी शर्तों से बद्ध करते हैं,
१. यह कि, संपूर्ण मूल्य रु. १३४००, अंकन तेरह हजार चार सौ रुपए जो तै हुआ है उसमें से रु. ४००, अंकन चार सौ रुपए बतौर बयाने के हमको मिल चुके है और बाकी रु. १३००० अंकन तेरह हजार रुपर बजरिए क्रास चेक नं. डी. टी.००५२२६ तारीख १८ जनवरी १९४४ ई., ऊपर, दि यूनाइटेड कमर्शिल बँक लि., दिल्ली, सब रजिस्ट्रार मथुरा के सामने, रजिस्ट्री के समय, हम लोगों को अपने मुख्ताराम श्री विश्वनाथ सिंह के हस्ते मिले हैं. अब कुछ बाकी नहीं है.
२. यह कि, आज की मिति से उक्त भूभाग पर उक्त महामना श्री पं. मदनमोहन मालवीय जी, गो. गणेशदत्त जी, तथा डा. भीखनलाल जी आत्रेय का पूर्ण स्वत्व और अधिकार हमलोगों ने करा दिया. उनको अधिकार है कि अपने नाम आवश्यक कागदों पर चढ़वा लेवें और मंदिर के जीर्णोद्धार के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार चाहें कटरा केशवदेव का उपयोग करें. अब उसमें हम लोगों का कोई अधिकार बाकी नहीं रहा और न उससे हम लोगों का कोई संबंध रहा. जो जो अधिकार उक्त भूभाग में हम लोगों को प्राप्त थे वे अब इस बेनामे के द्वारा उक्त महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी, गो. गणेशदत्त जी तथा डा. भीखनलाल जी आत्रेय को प्राप्त हो गए हैं.
३. यह कि, उक्त भूभाग हर प्रकार के बार देन से रहित है. यदि कोई बात इसके विरुद्ध प्रकट हो जिसके कारण कोई बार उक्त महामना श्री पं. मदनमोहन मालवीय जी, गो. गणेशदत्त जी तथा डा. भीखनलाल जी आत्रेय या उनके प्रतिनिधियों या उत्तराधिकारियों को देना पड़े तो उसे व्यय और नुकसानी सहित देने के लिये हम दोनों विक्रेता व हमारे प्रतिनिधि तथा उत्तराधिकारी बाध्य होंगे. परंतु इसके अतिरिक्त और किसी बात की जिम्मेदारी हम लोगों तथा हमारे प्रतिनिधियों तथा उत्तराधिकारियों पर नहीं रहेगी. जो और जितने अधिकार इस समय कटरा केशवदेव में हमलोगों को प्राप्त हैं उन सबको इस विक्रयपत्र द्वारा उक्त तीनों सज्जनों को देते हैं.
इसलिये यह विक्रयपत्र हमलोगों ने लिख दिया कि प्रमाण रहे और समय पर काम आवे. चौहद्दी उक्त कटरा केशवदेव की, जिसका बैनामा किया जाता है, पूरब, रेलवे लाइन, बी.बी.सी.आई. रेलवे. पच्छिम, मंदिर जो कि केशवदेव के नाम से प्रसिद्ध है,.उत्तर, जमीन नजूल. दक्षिण जमीन उफ्तादा व कच्चा रास्ता, दगरा.
टाइपकर्ता : शंभुनाथ वाजपेयी, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी, ०८.०२.१९४४।
साक्षी : त्रिलोचन पन्त, हिंदू विश्वविद्यालय, काशी
साक्षी : शंभु नारायण चौबे, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी
श्रीकृष्णजन्मस्थान मन्दिर अभिलेखागार, मथुरा।
– कुमार गुंजन अग्रवाल
(साभार – सोशल मीडिया)
#KrishnaJanmabhoomi #KatraKeshavdev #MathuraHistory #ShriKrishnaBirthplace #HinduHeritage #TempleRestoration #MadanMohanMalaviya #BirlaTrust #AncientMathura #KeshavdevTemple #श्रीकृष्णजन्मस्थान #कटराकेशवदेव #मथुराइतिहास #श्रीकृष्णजन्मभूमि #हिंदूविरासत #मंदिरपुनरुद्धार #महामनामालवीय #बिरलाट्रस्ट #प्राचीनमथुरा #केशवदेवमंदिर
