श्रीहरिवंश पुराण के दूसरे अध्याय में वैशम्पायन जी जनमेजय को बता रहे हैं की सृष्टि की रचना करने के बाद ब्रह्मा जी ने प्रजाओं की रचना की, जिसके लिए स्वयं ब्रह्मा जी ने अपनी देह के दो भाग कर के एक भाग से मनु नामक पुरुष बन गये और देह के दूसरे भाग से शतरूपा को पत्नीरूप में स्वीकार किया। इस प्रकार अपनी महिमा से द्युलोक (सम्पूर्ण आकाश) को व्याप्त कर के स्थित हुए मनु के धर्म से ही उनकी पत्नी शतरूपा की उत्पत्ति हुई। वह शतरूपा दस हजार वर्षों तक परम दुष्कर तप करके संतान की कामना से तप से चमकते हुए अपने स्वामी के पास आयीं. वे पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं।
उनकी संतानों की संख्या जब बढ़ने लगीं तो उनको संस्कार और शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने “मनुस्मृति” (संविधान) भी बनाई। आज भी उसी मनुस्मृति के 75 प्रतिशत से अधिक संस्कार नीयमों के रूप में सम्पूर्ण दुनिया में जस के तस चल रहे हैं। चाहे इस्लाम हो या क्रिस्चियन या बौद्ध। आज यदि सरकारी कानून आपको भरे बाजार में नंगे होकर नहीं घूमते देता तो ये मनुस्मृति का ही नीयम है और यदि आपको ऐसा करने में शर्म आती है तो ये आपके नहीं मनुस्मृति के ही संस्कार हैं।
अब से यदि यदि कोई कहता है की हमारे सभी के पूर्वज सबसे पहले बंदर थे तो कहो की तुम्हारे ही रहे होंगे। हमारे तो मनु हैं और मनु के पूर्वज ब्रह्मा जी हैं। इसीलिए उनको सृस्टि का निर्माता और परम पिता कहा जाता है।
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