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ब्रह्मांड का उल्लेख हिंदू धर्म में ही क्यों मिलता है?

admin 29 January 2023
Universe in Hinduism in Hindi
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क्या किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है कि केवल हिंदू धर्म में ही ब्रह्मांड (Universe in Hinduism) का उल्लेख क्यों मिलता है? ऐसा क्या कारण है कि केवल हिंदू धर्म ही ब्रह्मांड के बारे में जानता है? जबकि हिंदू धर्म तो इस ब्रह्मांड में धूल के एक कण के बराबर भी नहीं है.

प्राचीनकाल की भले ही कितनी भी सभ्यताएं और संस्कृतियां रही हों. लेकिन अब वे समाप्त हो चुकी हैं, और, उनमें से अब मात्र एक ही सभ्यता और संस्कृति ऐसी है जो जीवित है, और वो है सनातन हिंदू सभ्यता. यहां ये भी जान लेना चाहिए कि केवल हिंदू धर्म ही है जिसने अभी भी अपने उस ज्ञान को संरक्षित किया हुआ है जो दुनिया को यह साबित करके चुनौति देता है और घोषणा करता है कि इस संसार और ब्रह्मांड (Universe in Hinduism) की सभी संभावनाएं भारत में ही उत्पन्न हुई हैं.

दरअसल, जर्मन मूल की एक लेखिका हैं मारिया विर्थ. मारिया विर्थ ने अपने एक लेख के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त किया है और दुनिया के तमाम जानकारों और बुद्धिजीवियों तथा ज्ञानियों से पूछा है कि ब्रह्मांड का उल्लेख केवल हिंदू धर्म में ही क्यों मिलता है?

मारिया विर्थ लिखती हैं कि – भारत में अभी भी हजारों-लाखों मूल्यवान प्राचीन ग्रंथ मौजूद हैं. बावजूद इसके, भारत में उन लाखों लोगों को केवल इस आधार पर या मात्र इस बात पर उन आक्रमणकारियों द्वारा जला दिया गया था कि अब भविष्य में केवल और केवल एक ही पुस्तक की आवश्यकता है.

मारिया विर्थ आगे लिखती हैं कि- हिंदू धर्म के पास न सिर्फ सूर्य के सिद्धान्त विषय पर, बल्कि ब्रह्मांड (Universe in Hinduism) के तमाम रहस्यों के बारे में अविश्वसनीय ज्ञान के साथ कई ऐसी पुस्तकें उपलब्ध हैं जो कम से कम 10,000 साल पहले रची जा चुकी थीं. जी हां, ये सच है। क्योंकि प्राचीन भारतीय ये बात जानते थे कि पृथ्वी गोल है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है.

प्राचीन भारतीय ये भी जानते थे कि सूर्य और चंद्रमा के बीच की दूरी क्या है, वे ये बात भी जानते थे कि दूरी से संबंधित व्यास का 108 गुना है – यही कारण है कि सूर्य और चंद्रमा, पृथ्वी से एक ही आकार के दिखाई देते हैं. दरअसल, प्राचीन भारतीयों का ये ज्ञान वास्तव में प्रेरित था उस ‘ईश्वर शक्ति‘ से जो आज भी विद्यमान है.

पुराणों या पुराण का सीधा-सा अर्थ है पुराना, यानी कि इतिहास, और परंपरा के अनुसार वेद व्यास द्वारा लगभग 5,000 साल पहले रचा गया महाभारत भी एक पुराण ही है, जिसे अक्सर विदेशी लोग केवल और केवल एक मिथक के रूप में ही मानते आ रहे हैं. पुराण न सिर्फ ज्ञान का खजाना हैं बल्कि हिंदू धर्म का इतिहास भी है.

मारिया विर्थ ने लिखा है कि- हिंदू धर्म के सभी पुराण, ब्रह्मांड (Universe in Hinduism) के निर्माण के बारे में भी बात करते हैं और संस्कृति की झलक भी दिखाते हैं. पुराण ‘बिग बैंग‘ और ‘ब्रह्मांड के विस्तार‘ के सिद्धांत को भी बताते हैं. पुराणों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समुचित ब्रह्मांड को ही अपना घर मानते थे. श्रीमद्भागवत महापुराण तो यहां तक ​​दावा करता है कि ‘ब्रह्मांड मात्र एक या दो, नहीं बल्कि इनकी संख्या असंख्य‘ हैं.

मारिया विर्थ साफ-साफ लिखती हैं कि- अगर हम इसकी तुलना पश्चिमी धर्मों से करें, तो इनमें ब्रह्मांड के निर्माण के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं लिखा गया है, लेकिन, मात्र हम पृथ्वी की ही बात करें तो यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म के अपने-अपने दावे हैं कि पृथ्वी मात्र 6 से 7 हजार साल पुरानी है. हैरानी तो इस बात पर होती है कि हिंदू धर्म के अलावा अन्य कोई भी धर्म इस दृष्टिकोण को बिल्कुल भी चुनौती नहीं देता. शायद ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म के अलावा अन्य कोई भी धर्म इस पृथ्वी से परे सोचते भी नहीं थे.

हालांकि, मारिया विर्थ ने अपने इस लेख में पश्चिमी धर्मों को लेकर कई ऐसी विवादास्पद बातों को साफ-साफ लिखा है जो हम यहां देना नहीं चाहते. क्योंकि, उसमें आज के पश्चिमी धर्मों को ऐतजार हो सकता है. लेकिन, उन्होंने लिखा है कि – आप कल्पना कीजिए कि आज से मात्र 400 साल पहले तक भी यूरोप का विज्ञान ये बात नहीं जान पाया था कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है. जबकि भारत का विज्ञान दस हजार साल पहले ही यह बात लिख चुका था.

मारिया विर्थ ने लिखा है कि ईसाइयत से हट कर अगर हम इस्लाम की बात करें तो वे लोग तो आज तक पृथ्वी को भी ठीक से नहीं समझ पाये हैं. जबकि ब्रह्मांड की विशालता के बारे में हिंदू धर्म के अलावा अन्य कोई भी स्पष्ट रूप से अपने विचार नहीं बताता. इसका कारण साफ है कि उनके पास इसके बारे में कोई जानकारी थी ही नहीं.

मारिया विर्थ के अनुसार – इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछली कुछ शताब्दियों में या पिछले कुछ वर्षों के दौरान विज्ञान की अचानक और जबरदस्त हुई प्रगति में भारतीय ज्ञान और विज्ञान ही प्रेरणा का माध्यम रहा है. और कुछ पश्चिमी वैज्ञानिकों ने खुद सीधे-सीधे इस बात को स्वीकार किया है. आइंस्टीन ने तो यहां तक कहा था कि ‘हम पर भारतीयों का बहुत बड़ा उपकार है.’

हालांकि, वर्तमान दौर में, खास तौर पर हिंदू धर्म और हिंदूत्व में, बहुत कुछ बदलता जा रहा है. वे ब्राह्मण, जिन्होंने हजारों वर्षों से ज्ञान प्रणाली को संरक्षित रखा, उन्हीं को अब कुछ अन्य धर्मों द्वारा गलत तरीकों से अपमानित किया जा रहा है और उनका मजाक बनाया जा रहा है.

मारिया विर्थ हैरानी भरे शब्दों में लिखती हैं कि – आज की हिंदू पीढ़ी स्वयं ही अपने इतिहास से अनजान होती जा रही है और पश्चिमी प्रभाव में पड़ कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा काम कर रही है. क्योंकि आज की हिंदू पीढ़ी स्वयं ही सनातन के इन ब्राह्मण संरक्षकों को पोंगा पंडित, अंधविश्वासी, कर्मकांडी जैसे नाम से संबोधिक करने लगी है और उन्हें गाली देने लगी है.

मारिया विर्थ ने लिखा है कि उन्हीं ब्राह्मणों, पुजारयों, सनातन के संरक्षकों को गाली देने वाले वे लोग भूल जाते हैे कि ब्राह्मण और पुजारी नहीं होते तो संभव है कि आज यह सबसे प्राचीन सभ्यता भी खतना करवा चुकी होती या फिर गले में क्रॉस लटका कर घूम रही होती.

– अमृति देवी

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