पुलिस-अधिकारियों की एक पार्टी में एक अधिकारी ने अपने साथ खड़ी महिला की ओर संकेत करते हुए मुझसे कहा– “सर, ये मेरी बेगम हैं।” मैंने प्रश्न किया (ध्यातव्य है कि प्रश्न पूछा नहीं जाता; सवाल पूछा जाता है) – “भाई, जब आप ‘बेग’ नहीं हैं तो ये ‘बेगम’ कैसे हुईं?” जानना चाहिए कि ‘बेग’ का स्त्रीलिंग रूप ‘बेगम’ है। पति का स्त्रीलिंग ‘पत्नी’ है और उसे ‘बेगम’ से प्रति-स्थापित नहीं किया जा सकता।
किसी भी शब्द के प्रयोग से पूर्व उसके अर्थ और उसकी पृष्ठभूमि का परिज्ञान आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, जब हम उपाधि के बारे में बात करें तो यह ध्यान में रहना चाहिए कि उपाधि अर्जित की जाती है; प्राप्त नहीं की जाती। जो आप प्राप्त कर सकते हैं, वह खो भी सकता है। इसी प्रकार, यह संबोध आवश्यक है कि किसी लब्धप्रतिष्ठ(लब्धप्रतिष्ठित अशुद्ध है) व्यक्ति को अभिनन्दनपत्र, अंगवस्त्र आदि भेंट किया जाता है, प्रदान नहीं किया जाता। भिखारी को आप भोजन, वस्त्र आदिक प्रदान कर सकते हैं।बड़ों के द्वारा छोटों को कुछ प्रदान किया जा सकता है; परंतु किसी छोटे द्वारा बड़ों को कुछ प्रदान नहीं किया जा सकता। हाँ, राष्ट्रपति वा किसी विशिष्ट विभूति(विभूतियों अशुद्ध है) द्वारा जब कोई पुरस्कार दिया जाए तो प्रदान करना साधु-प्रयोग है। स्मरण रहे कि राष्ट्रपति भी पुरस्कार तो प्रदान कर सकते हैं; सम्मान प्रदान नहीं कर सकते। सम्मान से तो सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार, विचार करना चाहिए कि लड़ाई भले ही लड़ी जाती हो, युद्ध नहीं लड़ा जाता। युद्ध सदैव किया जाता है। जीवन में कष्ट हो सकता है, इसे भोगा भी जा सकता है; लेकिन भाषा में ‘तक्लीफ़(तकलीफ़ अशुद्ध है) उठाना’ की तर्ज़ पर कष्ट ‘उठाना’ प्रयोग देखना भी कम कष्टप्रद नहीं होता।
दुःख होता है, जब हमारे गो-रक्षक ‘गोहत्या’ का विरोध तो करते हैं; पर ‘गोहत्या’ के बदले ‘गोकशी’ शब्द का प्रयोग करते हैं। समाचारपत्रों में भी यह शब्द बहुधा प्रयुक्त होता है। जानना चाहिए कि संस्कृत शब्द ‘गौ’ के सामासिक-रूप ‘गो’ के साथ फ़ारसी प्रत्यय ‘कुशी’ लगाकर गोकुशी(ख़ुदकुशी की तर्ज़ पर) शब्द तो बनाया जा सकता है, ‘गोकशी’ नहीं। ख़ुदकुशी को ‘ख़ुदकशी’ कोई नहीं कहता। अतः, गोकुशी नहीं, प्रत्युत ‘गोहत्या’ शब्द ही व्याकरणसम्मत है। ऐसे भी, जिस भाषा का शब्द हो, प्रत्यय भी उसी भाषा का प्रयुक्त होना चाहिए। यही कारण है कि हिंदुस्थान को ‘हिंदुस्तान’ लिखना भी व्याकरणसम्मत नहीं है। भाषा की दृष्टि से हिंदुस्थान को ‘हिंदुस्तान’ कहना उतना ही ग़लत है, जितना पाकिस्तान को ‘पाकिस्थान’ कहना। स्थान को फ़ारसी में ‘स्तान’ अवश्य कहते हैं और यह स्थान से ही बना भी है; परंतु जब ‘हिंदू’ संस्कृत शब्द है और ‘स्थान’ भी तत्सम शब्द है तो हिन्दू में फ़ारसी प्रत्यय ‘स्तान’ लगाना निश्चित ही हीनताबोध है; अंधानुकरण है और इसलिए त्याज्य है। ‘गोवध’ शब्द का प्रयोग करना भी उचित नहीं है। किसी राक्षस अथवा दुष्ट के संहार के लिए ‘वध’ का प्रयोग उपयुक्त है।
तथ्य है कि अरबी-फ़ारसी के ही शताधिक शब्दों को हमने अशुद्ध-वर्तनी के साथ और ग़लत अर्थ में ग्रहण कर लिया है, जो लोकप्रयोग में रच-बस गए हैं। यथा– समंदर शब्द का समुद्र से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। फ़ारसी में समंदर कहते हैं– अग्निकीट अर्थात् आग के इर्दगिर्द मँडराने वाले एक पतंगे को। प्रथमतः, यह शाइरी(शायरी अशुद्ध है) में प्रयुक्त हुआ। फ़ारसी की जानकारी न होने के कारण लोगों ने इसे समुद्र का उर्दू-पर्याय समझ कर प्रयोग करना शुरू कर दिया और कालांतर में यह इसी अर्थ में रूढ(रूढ़ अशुद्ध है) हो गया। यह भी जानना चाहिए कि समंदर की जगह अगर ‘समंद’ लिख दिया तो इसका अर्थ अश्व या घोड़ा हो जाएगा।
विचारणीय है कि श्रीमान्, महाशय, महोदय आदिक उपयुक्त शब्दों के होते हुए साहिब को ‘साहब’ बनाकर लिखने से हिंदी का भला कैसे होगा? विष, हलाहल आदिक प्रयोग को त्यागकर ज़ह्र को ज़हर बनाकर प्रयोग करने से किस प्रयोजन की सिद्धि होगी? बहुधा, प्रायः आदि हिंदी-शब्दों के प्रयोग से बचना तथा विदेशज शब्द अक्सर को ‘अक़सर’ या ‘अक़्सर’ बनाकर लिखना भाषा के प्रति घोर-औदासीन्य का परिचायक ही माना जाएगा। अल्प-श्रम से ही किसी मानक उर्दू-कोश में देखा जा सकता है कि अक़्सर का अर्थ बहुत छोटा या लघु होता है। हाँ, नुक़्ते के बिना ‘अक्सर’ का अर्थ ‘प्रायः’ अवश्य है; लेकिन इसमें भी ‘प्रायः’ का सौंदर्य कहाँ? इसी प्रकार, बुद्धिमान्, धीमत्, मेधावी, विद्वान् आदि शब्दों का प्रयोग न कर अक़्लमंद को ‘अकलमंद’ लिखना अग्राह्य है।
कोई व्यंजन सुस्वादु हो सकता है; यदि उसका स्वाद सबसे अच्छा हो तो स्वादिष्ठ हो सकता है; पर स्वादिष्ट नहीं हो सकता। शुद्ध-वर्तनी ‘स्वादिष्ठ’ है, जिसमें उत्तमावस्थासूचक ‘इष्ठन्’ प्रत्यय है, जो श्रेष्ठ, वरिष्ठ, कनिष्ठ आदि में है। यह भी जानना चाहिए कि भोजन ‘स्वादिष्ठ’ तो हो सकता है, स्वदिष्ठतम नहीं। इसी प्रकार, वरिष्ठतम, कनिष्ठतम आदि शब्द चाहे जहाँ भी लिखे हों, ग़लत हैं; क्योंकि उत्तमावस्था की उत्तमावस्था नहीं हो सकती। जब ‘घनिष्ठ-मित्र’ का अर्थ ही है– ‘जिस मित्र से मैत्री सबसे अधिक प्रगाढ़ हो’ तो ‘घनिष्ठतम-मित्र’ लिखने का क्या प्रयोजन है? ध्यातव्य है कि कोई विद्यार्थी किसी विद्यार्थिपरिषद् का सदस्य तो हो सकता है; पर विद्यार्थीपरिषद अथवा विद्यार्थीपरिषद् का नहीं। वस्तुतः, संस्कृत में ‘विद्यार्थिन्’ शब्द है, जिसकी संधि ‘परिषद्’ से हुई जिससे ‘विद्यार्थिपरिषद्’ शब्द की निर्मिति हुई। इसी प्रकार योगी, सन्न्यासी(संन्यासी, सन्यासी, संयासी आदि अशुद्ध रूप हैं), प्राणी आदि शुध्द हैं; परंतु योगिराज(योगिन् से), प्राणिविज्ञान(प्राणिन् से) तथा सन्न्यासिवृन्द(सन्न्यासिन् से) लिखा जाना चाहिए।
इसी प्रकार, वैज्ञानिक-दृष्टि, वैज्ञानिक-चेतना एवं वैज्ञानिक-अभिरुचि से संपृक्त व्यक्ति को वैज्ञानिक(साइंटिफ़िक) नहीं, विज्ञानी(साइंटिस्ट) कहना चाहिए। जब कोई दिवंगत होता है तो उसकी अरथी उठती है, अर्थी नहीं उठती। अर्थी का अर्थ है– चाहनेवाला। विद्यार्थी, शिक्षार्थी, धनार्थी आदि में ‘अर्थी’ का यह अर्थ स्पष्टत: बोधगम्य है। अरथी का अर्थ है– शरीर रूपी रथ का रथी नहीं रहा, प्रस्थान कर गया और इसप्रकार यह अ-रथी वा ‘अरथी’ हो गया। अभीष्ट है कि ‘सब चलता है’ और ‘भाषा बहता नीर’ के नाम पर जो भाषिक-अज्ञान रूपी अंधकार चहुँओर व्याप्त हो रहा है, उसे दूर करने के लिए हिंदीसेविजन प्रयास करें। किसी लड़के का नाम सूर्या, कृष्णा, शिवा, भीमा आदिक सुनकर बहुत ही भद्दा लगता है; क्योंकि इनके पुंल्लिंग रूप क्रमशः सूर्य, कृष्ण, शिव, भीम आदिक हैं। विदित है कि ‘आ’ प्रत्यय से स्त्रीलिंग रूप की निर्मिति होती है, यथा– छात्र से छात्रा, प्रिय से प्रिया, अग्रज से अग्रजा, अनुज से अनुजा आदि।
– कमलेश कमल
भाषा-विज्ञानी एवं बेस्टसेलर लेखक
बहुचर्चित पुस्तक : ‘भाषा संशय-शोधन’