Saturday, May 9, 2026
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युद्धो और युद्धाभ्यासों से पर्यावरण को कितना खतरा है?

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अजय सिंह चौहान  |  दुनियाभर के कई महत्वपूर्ण देश आये दिन युद्धाभ्यासों और परस्पर युद्धों में उलझे हुए रहने लगे हैं। ऐसे देश अपनी इन गतिविधियों के द्वारा उन गोला-बारूदों को खपाने का प्रयास करते हैं जो जल्द ही आयु सीमा तय करने वाली होती है जिसे अंग्रेजी में एक्सरायरी डेटेट कहा जाता है। असल में ये देश उन्हीं गोला-बारूदों का इस्तमाल शक्ति प्रदर्शन और युद्धों में करते रहते हैं। लेकिन ऐसे देश ये भूल जाते हैं कि इससे प्रकृति और पर्यावरण का कितना नुकसान होता है। हालांकि, देखा जाये तो युद्धाभ्यासों के दौरान होने वाली बमबारी का ग्लोबल वार्मिंग पर सीमित ही सही लेकिन कुछ हद तक गहरा प्रभाव तो पड़ता ही है, क्योंकि ये गतिविधियाँ पर्यावरण पर कई तरह से असर डालती हैं। हालांकि, इनका प्रभाव औद्योगिक गतिविधियों, जीवाश्म ईंधन के उपयोग, या वनों की कटाई जैसे प्रमुख ग्लोबल वार्मिंग कारकों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। आइए इसे हम विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं –

ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन –
ईंधन की खपतः- युद्धाभ्यासों में विमान, टैंक, जहाज और अन्य सैन्य वाहनों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, जो जीवाश्म ईंधन (जैसे डीजल और जेट ईंधन) जलाते हैं। इससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂ ) और अन्य ग्रीनहाउस गैसें (जैसे मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड ) निकलती हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती हैं। उदाहरण के लिए, सैन्य विमानों की उड़ानें और नौसैनिक अभ्यासों में जहाजों का संचालन उच्च मात्रा में CO₂ उत्सर्जन का कारण बनता है।
विस्फोट और आगः- बमबारी के दौरान होने वाले विस्फोटों और आग से कार्बन मोनोऑक्साइडड, कालिख (black carbon), और अन्य प्रदूषक निकलते हैं। कालिख, जो एक शक्तिशाली शाॅर्ट-लिव्ड जलवायु प्रदूषक है, सूर्य की गर्मी को अवशोषित कर वायुमंडल को गर्म करती है और ग्लेशियरों पर जमा होने पर उनके पिघलने की गति को बढ़ा सकती है।

प्राकृतिक संसाधनों का विनाश –
वन और मिट्टी का क्षरणः – युद्ध और बमबारी से जंगल, घास के मैदान और मिट्टी की ऊर्वरकता नष्ट हो सकती है। वन CO₂ को अवशोषित करने का प्राकृतिक स्रोत हैं। इनके नष्ट होने से कार्बन अवशोषण की क्षमता कम होती है, जिससे वायुमंडल में CO₂ की मात्रा बढ़ती है।
जंगल की आगः- युद्ध या युद्धाभ्यासों के दौरान लगने वाली आग (जैसे, बमबारी से उत्पन्न) बड़े पैमाने पर CO₂ और मीथेन उत्सर्जन का कारण बन सकती है। उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्व युद्ध और वियतनाम युद्ध में बमबारी से जंगलों में व्यापक आग लगी थी, जिसने ग्रीनहाउस गैसों को बढ़ाया।

सैन्य गतिविधियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव –
पुनर्निर्माण और संसाधन खपतः- युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में सीमेंट, स्टील और अन्य सामग्रियों का उपयोग होता है, जिनके उत्पादन में भारी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है और CO₂ उत्सर्जन होता है।
रासायनिक हथियार और प्रदूषणः- कुछ युद्धों में रासायनिक हथियारों या तेल रिसाव (जैसे, खाड़ी युद्ध में तेल कुओं में आग) का उपयोग पर्यावरण को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव बढ़ सकते हैं।

मात्रा और प्रभाव की सीमा –
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, सैन्य गतिविधियों से होने वाला उत्सर्जन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का वैसे तो एक छोटा हिस्सा (लगभग 1-5 प्रतिशत) है लेकिन फिर भी पर्यावरण के लिए यह बहुत ही घातक होता है। उदाहरण के लिए, कुछ अनुमानों के अनुसार, वैश्विक सैन्य गतिविधियाँ प्रति वर्ष लगभग 0.5-1 गीगाटन CO₂ के बराबर उत्सर्जन करती हैं, जो कि कुल वैश्विक उत्सर्जन (लगभग 50 गीगाटन CO₂) की तुलना में कम है।

हालांकि, युद्धों के दौरान होने वाला पर्यावरणीय विनाश (जैसे, जंगलों और जंगली पुश-पक्षियों की हानि या मिट्टी का क्षरण) दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन प्रभावों को बढ़ाता है, जो तत्काल उत्सर्जन से अधिक गंभीर हो सकता है।

क्या युद्धाभ्यास ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख खतरा है? –
हालांकि, बमबारी और युद्धाभ्यास ग्लोबल वार्मिंग में योगदान तो देते हैं, लेकिन फिर भी आधुनिक विज्ञान इसको प्राथमिक कारण नहीं मानता, जबकि प्रमुख कारणों में जीवाश्म ईंधन का व्यापक उपयोग, औद्योगिक गतिविधियाँ, वनों की कटाई और कृषि संबंधी उत्सर्जन को इसमें शामिल किया जाता है।

फिर भी, यह सत्य है कि बारूद बरसाने वाले युद्ध और सैन्य अभ्यासों का स्थानीय पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाला कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए, खाड़ी युद्ध (1991) में तेल के कुओं में लगी भीषण आग से लगभग 700 मिलियन बैरल तेल जला था, जिससे भारी मात्रा में ब्व्₂ और कालिख उत्सर्जन हुआ।

रोकथाम के उपाय –
नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग – सैन्य अभ्यासों में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे, सौर या बायोफ्यूल) का उपयोग बढ़ाकर उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।
पर्यावरणीय मानकों का पालन – युद्धाभ्यासों में पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए सख्त नियम लागू किए जा सकते हैं।
वनों का संरक्षण – युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में वनों और वन संपदा आदि के विशेष संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग – युद्ध और सैन्य गतिविधियों को कम करने के लिए वैश्विक शांति प्रयासों को बढ़ावा देना।

किसी भी देश या क्षेत्र में होने वालील बमबारी और युद्ध अभ्यास सबसे पहले उसी के आसपास की ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देते हैं, उसके बाद वह अन्य क्षेत्रों में फैलता है जिसको हम मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और पर्यावरणीय विनाश के माध्यम से देख सकते हैं। हालांकि, इनका प्रभाव वैश्विक स्तर पर अपेक्षाकृत सीमित ही होता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह गंभीर खतरा हो सकता है। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे प्रमुख खतरा वैसे तो औद्योगिक और मानवीय गतिविधियों से ही है, लेकिन सैन्य गतिविधियों को पर्यावरणीय दृष्टिकोण से नियंत्रित करना भी आवश्यक हो गया है।

इस विषय में अभी तक वैश्विक स्तर पर विशिष्ट वैज्ञानिक अध्ययन बहुत सीमित या न के बराबर हैं। हालांकि, सैन्य उत्सर्जन के आंकड़े अक्सर गोपनीय होते हैं, जिससे सटीक प्रभाव का आकलन करना मुश्किल होता है। फिर भी, पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए सैन्य रणनीतियों में स्थिरता को शामिल करना सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।

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