अजय चौहान | अक्सर हम सुनते और बातें करते हैं कि आज विज्ञान कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया है और फिर आज के हर एक उत्पाद में हम विज्ञान को ही श्रेय देने लगते हैं, इसलिए आज यहां ये जानने का प्रयास करेंगे कि क्या मानव शरीर की तरह ही लैब में ऐसी कोशिकाएं भी तैयार की जा सकती हैं जो बढ़ती भी हैं यानी विभाजित होकर अपनी नई कोशिकाएं जिन्हें लैब की भाषा में कंनहीजमत बमससे कहा जाता है, को भी बना सकती हैं और बीमार भी हो सकती हैं और तंदुरुस्त भी हो सकती हैं?, तो तमाम रिसर्च और जानकारियों के आधार पर इसका उत्तर कहीं भी स्पष्ट नहीं मिलता।
अब ये कितना सच है कितना नहीं, इस विषय में हम दावा तो नहीं कर सकते, लेकिन यहां ये तो सच है कि आजकल कई तरह से जेनेटिकली माॅडिफाइड भोजन से जुड़े खाद्य उत्पाद को बाजार में देख ही रहे हैं लेकिन क्या ऐसा भी संभव है कि एक दिन लैब में मनुष्य भी बनकर तैयार हो जाय? इंटरनेट पर कई प्रकार से उपलब्ध तथ्यों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि स्टेम सेल (Stem Cells) लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बना तो सकती हैं और इन्हें प्रयोगशाला में वर्षों तक जीवित भी रखा जा सकता है लेकिन प्राकृतिक रूप से बनने वाली कोशिकाओं का मुकाबला नहीं किया जा सकता।
दावा तो ये भी हो रहा है कि लैब में बनाने वाली इन्हीं स्टेम सेल से त्वचा, रक्त, तंत्रिका और हृदय आदि की कोशिकाएँ बनाई जा सकती हैं लेकिन असल में मानव शरीर से कोशिकाएँ निकालकर वैज्ञानिक इन विशेष पोषक माध्यम (culture medium) में उगाते हैं। यही कोशिकाएँ धीरे-धीरे बढ़ती रहती हैं और विभाजित भी होती रहती हैं। इनमें से कुछ कोशिकाएँ, जैसे HeLa cells, दशकों से प्रयोगशालाओं में लगातार विभाजित हो भी रही हैं। इन कोशिकाओं का उपयोग विभिन्न टीकों, दवाओं और कैंसर अनुसंधान आदि में भी होता रहा है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में हमारे वैज्ञानिक पूरी तरह से ऐसी नई जीवित कोशिका बना सकते हैं जो मनुष्य के शरीर में होती हैं, तो इसका उत्तर अभी तक नहीं में ही मिलता है, क्योंकि यह तो मात्र एक बार ही बनी है और अब आगे भी युगों तक यही जारी रहने वाली है। लैब में वैज्ञानिकों द्वारा बनी कृत्रिम डीएनए यानी synthetic DNA भले ही बना लिया जाय, कुछ बैक्टीरिया के जीनोम कृत्रिम रूप से तैयार करके उन्हें जीवित कोशिकाओं में स्थापित भी कर दिया जाय, लेकिन प्राकृतिक कोशिकाओं की भांति शून्य से मानव जैसी पूरी जीवित कोशिका बनाना जो कि स्वयं से बढ़े, ऊर्जा भी बनाए, अपनी मरम्मत भी करे और अनिश्चित काल तक अपनी काॅपी भी करती जाय, ऐसा अभी तक तो संभव नहीं हुआ है।
अधिकतर वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में भले ही यह भी संभव हो सकता है कि प्राकृतिक रूप से बनने वाली कोशिकाओं की तरह ही आने वाले दशकों में सिंथेटिक बायोलाॅजी (Synthetic Biology) और स्टेम सेल तकनीक की मदद से और भी अधिक जटिल कृत्रिम कोशिकाएँ बनाई जा सकती हैं लेकिन मानव कोशिका अत्यंत जटिल होती हैं इसलिए उसमें हजारों प्रकार के प्रोटीन, ओर्गनल, झिल्ली और जीन नियामक तंत्र मिलकर काम करते हैं। यही कारण है कि इसे पूरी तरह कृत्रिम रूप से बनाना विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और यह काम संभव ही नहीं है।
क्या भविष्य में स्टेम सेल बनाना संभव हो सकता है? कई वैज्ञानिक मानते हैं कि आने वाले दशकों में सिंथेटिक बायोलाॅजी (Synthetic Biology) और स्टेम सेल तकनीक की मदद से और अधिक जटिल कृत्रिम कोशिकाएँ बनाई जा सकती हैं। हालांकि, मानव कोशिका अत्यंत जटिल होती है, उसमें हजारों प्रकार के प्रोटीन, ओरर्गेनेल, झिल्ली और जीन नियामक तंत्र मिलकर काम करते हैं इसलिए इसकी नकल करके पूरी तरह कृत्रिम रूप से बनाना अभी भी विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
दरअसल, अधिकतर किये जाने वाले दावों में हमें अब तक जो संकेत मिले हैं उनके अनुसार मानव कोशिकाओं को लैब में जीवित रखा और बढ़ाया तो जा सकता है, वे विभाजित होकर अपनी प्रतियां भी बना सकती हैं, लेकिन शून्य से मानव जैसी, स्वयं प्रजनन करने वाली कोशिका का निर्माण अभी संभव नहीं हुआ है।
प्रश्न ये उठता है कि क्या अभी तक इसका कोई प्रमाण या उदाहरण वर्तमान में देखने को मिलता है जिसमें कृत्रिम स्टेम सेल (Stem Cells) प्राकृतिक स्टेम सेल की भाँति ही प्रत्यक्ष रूप से प्रयोगशाला में कोशिकाओं को बढ़ाने और पूरी तरह शून्य से मानव कोशिका बनाने के काम कर रहे हों? तो इस विषय में हमें उदाहरण मिलते हैं कि 1951 में एक महिला के कैंसर ऊतक से प्राप्त कोशिकाओं से HeLa cell line बनाई गई थीं जो आज भी दुनिया भर की हजारों प्रयोगशालाओं में बढ़ाई जाती हैं। ये कोशिकायें अब तक लाखों-करोड़ों बार विभाजन कर चुकी हैं और पोलियो वैक्सीन, कैंसर, वायरस और अन्य कई प्रकार की दवा परीक्षण शोधों में इनका उपयोग हो चुका है।
दरअसल, कई बड़ी प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक मानव स्टेम कोशिकाओं को उगाते हैं जो लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाती हैं जिनमें त्वचा, रक्त, तंत्रिका और हृदय जैसी विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ विकसित की जा सकती हैं। इन कृत्रिम कोशिकाओं का उपयोग गंभीर रूप से जल चुके मरीजों के उपचार के लिए उनकी अपनी त्वचा की कुछ कोशिकाएँ लेकर प्रयोगशाला में लाखों नई त्वचा कोशिकाएँ उगाई जाती हैं। बाद में इन्हें रोगी के शरीर पर प्रत्यारोपित किया जाता है। यही चिकित्सा आज कई देशों में वास्तविक रूप से उपयोग में है।
इसके अलावा विषय से जुडी खोज से ये भी जानकारी मिलती है कि लैब में वैज्ञानिक ऐसे ही अन्य कई Mini Organs भी बनाते आ रहे हैं जो पूर्ण अंग तो नहीं होते, लेकिन इनमें वास्तविक अंगों की कई विशेषताएँ दर्शाते हैं और शोध में भी इनका उपयोग किया जाता है जैसे – मिनी मस्तिष्क (Brain organoid), मिनी आंत (Gut organoid), मिनी लीवर (Liver organoid) और मिनी किडनी (Kidney organoid) आदि लेकिन प्रश्न ये है कि क्या कोई लैब या वैज्ञानिक पूरी तरह से ऐसी एकदम नई और जीवित कोशिका भी बना चुका है या इस पर काम हो रहा है तो उसका उत्तर संभवतः यही होगा कि अभी नहीं।
हालाँकि, इसके बावजूद यहां हमें कुछ अन्य जानकारियां बताती हैं कि सन 2010 में J. Craig Venter नामक एक वैज्ञानिक और उनकी टीम ने प्रयोगशाला में एक कृत्रिम बैक्टीरियल जीनोम तैयार किया और उसे एक बैक्टीरिया की कोशिका में स्थापित किया था। वह कोशिका उसी कृत्रिम जीनोम के निर्देशों के अनुसार जीवित रही और विभाजित भी हुई। वैज्ञानिक जगत में यह सिंथेटिक बायोलाॅजी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।
यानी यहां इस बात के भी प्रमाण मौजूद हैं कि मानव कोशिकाओं को लैब में बढ़ाया जा सकता है और वे कोशिकाएं अपनी प्रतियाँ बनाती रहती हैं लेकिन यह भी सच है कि अभी तक वैज्ञानिक पूरी तरह शून्य से मानव जैसी जीवित कोशिका नहीं बना पाए हैं, जो बिना किसी पहले से मौजूद कोशिका के स्वयं उत्पन्न होकर बढ़ने और विभाजित होने लगे।
