भारत में हो रहा छात्रों का प्रदर्शन अब ग्लोबल यानी विश्व व्यापी होता जा रहा है। भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के विरोध में UK, आयरलैंड, कनाडा, जर्मनी और नीदरलैंड में भारतीय मूल के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। स्थानीय खबरों के अनुसार, सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर किया गया है।
‘द टेलीग्राफ’ की खबर के अनुसार SFI (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया) की केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य और ग्लासगो में रहने वाले निखिल मैथ्यू ने बताया है कि लंदन, एडिनबर्ग, ग्लासगो और मैनचेस्टर में प्रदर्शन चल रहा है।
ख़बरों के अनुसार दिल्ली में हो रहे इस प्रदर्शन की कवरेज भी दुनियाभर के मीडिया में लगातार हो रही है और इसमें ZenG छात्रों के द्वारा किये जा रहे क्रिएटिव स्लोगन्स के इस्तमाल पर भी खूब चर्चा हो रही है। जबकि उससे भी बड़ी बात है की प्रधानमंत्री मोदी जी का उपहास भी खूब उड़ाया जा रहा है और उनको एक डरपोक विश्वनेता बताया जा रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स हैडिंग “प्रदर्शनकारियों का खून बहा, लेकिन वे डटे रहे” से जाहिर होता है की देश की वास्तविक स्थिति और आम जनता की भावनाओं के सरकार को कुछ भी लेना देना नहीं है।
खबरों के अनुसार, सोशल मीडिया पर हुई बातचीत और अन्य चीजों के आधार पर हमें लगभग 200 लोगों के आने का अनुमान था। लेकिन कल लंदन में कम से कम 1,000 लोग इकट्ठा हुए हैं।
दरअसल, इस प्रदर्शन के माध्यम से छात्रों और अन्य लोगों में पनप रहे आक्रोश का कारण UGC कानून, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण, राजनेताओं की मनमानी, निजी कॉलेजों की महंगी फीस और सरकारी कॉलेज का खस्ता हाल होना बताया जा रहा है।
अधिकतर छात्रों का कहना है कि प्राइवेट कॉलेज खुला-खुला कर सरकार स्वयं उसमें सीट सीट आरक्षित कर रही है। जबकि होना यह चाहिए था कि निजी कॉलेजों की तरह ही सरकारी कॉलेजों की संख्या में भी वृद्धि की जाती। आखिर क्या कारण है कि गवर्नमेंट कॉलेजों में सीट नहीं बढ़ावा जा रहा है? क्या केवल इसीलिए की मध्यम आय वर्ग के परिवार से आने वाले बच्चे पढ़ लेंगे तो वे सरकारों से सवाल पूछने लगेंगे?
जंतर-मंतर पर हो रहे धरना-प्रदर्शन में देखा और सुना जा सकता है कि छात्रों के आरोप और प्रश्न दोनों ही इस प्रकार से हैं कि सरकार को शर्म आ रही होगी कि आखिर हमने जो गलती की है उसका खामियाजा किस प्रकार से भूत आ जाए! अधिकतर छात्रों के प्रश्न है कि नीट काउंसलिंग की आड़ में निजी कालेजों को प्रोत्साहन देने का क्या मतलब बनता है? छात्रों का आरोप है कि आखिर लाखों रुपए काउंसलिंग में भाग लेने की प्रक्रिया के दौरान अभिभावकों द्वारा जमा अमानत राशि के तौर पर निजी कालेजों को एक तरफा देना कहां का न्याय है?
