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अय्यप्पा स्वामी के नियम : आत्म संयम, समर्पण और भक्ति के प्रतीक

admin 14 January 2026
Sri Ayyappa Swami Temple in Kerala
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अजय सिंह चौहान । दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख धार्मिक स्थलों और तीर्थों में से एक अत्यंत पूजनीय देवता श्री अय्यप्पा स्वामी जी का मंदिर भी है। भगवान अय्यप्पा स्वामी को भले ही उत्तर भारत में बहुत कम लोग जानते हैं लेकिन दक्षिण भारत में उनके भक्तों की संख्या कम नहीं है। अय्यप्पा स्वामी की उपासना विशेष रूप से केरल के सबरीमाला मंदिर में की जाती है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन तप और नियमों का पालन करते हुए दर्शन करने आते हैं। सनातन धर्म में अय्यप्पा स्वामी को धर्म, संयम, अनुशासन और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

अय्यप्पा स्वामी के जन्म और उद्देश्य की बात करें तो एक कथा के अनुसार वे भगवान विष्णु के मोहिनी रूप और भगवान शिव के दिव्य संगम से प्रकट हुए हैं। इसी कारण उन्हें “हरिहरपुत्र” यानी हरि अर्थात विष्णु जी और हर यानी शिव जी के पुत्र कहा जाता है। इसी से साफ पता चलता है कि उनका जन्म दुष्ट शक्तियों के संहार और धर्म की पुनः स्थापना के लिए हुआ।

भगवान अयप्पा को समर्पित यह मंदिर सबरीमाला तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है जो दक्षिण भारत के केरल राज्य में पथानामथिट्टा जिले के पश्चिमी घाट में स्थित है। यह मंदिर सबरीमाला नाम की एक पहाड़ी पर है, जो समुद्र तल से लगभग 3,000 फीट ऊंची है। इसलिए मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को लंबी और कठिन चढ़ाई वाली यात्रा करनी पड़ती है।

सबरीमाला मंदिर तीर्थ की उत्पत्ति से संबंधित पौराणिक कथा है कि भगवान परशुराम जी द्वारा अयप्पन पूजा के लिए इसकी स्थापना की गई थी। इसके अलावा यह भी बताया जाता है कि मंदिर का नाम माता शबरी के नाम पर पड़ा है, जिनका उल्लेख रामायण में आता है। जबकि कुछ ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि शैव तथा वैष्णव की परंपरा में एकता के उद्देश्य से भी इस मंदिर का निर्माण हुआ था।

विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं?

मंदिर की इस वर्तमान संरचना के बारे में कोई सटीक वर्ष या शिलालेख उपलब्ध नहीं हैं जिनसे इस वर्तमान संरचना के निर्माण तिथि की निश्चित जानकारी मिल सके। लेकिन अधिकतर प्रमाणों मे इतिहासकार इसे 12वीं सदी के बाद का निर्मित मानते हैं। मंदिर की वास्तु-शैली पारंपरिक केरल मंदिर स्थापत्य के अनुसार है।

सबरीमाला मंदिर की मुख्य विशेषताओं में इसकी प्रमुख 18 पवित्र सीढ़ियाँ हैं, जो मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए प्रतीक मानी जाती हैं। हर साल यहां 4 से 5 करोड़ श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते हैं, जिसके कारण यह मंदिर विश्व के सबसे बड़े और सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में शामिल है।

सबरीमाला तीर्थ में विशेष पूजन के लिए जाने से पहले श्रद्धालु 41 दिनों का कठिन व्रत और तपस्या करते हैं, जिसमें ब्रह्मचर्य, सात्त्विक भोजन जैसे कई प्रकार के सांसारिक संयम और सरल जीवन बिताना शामिल है। इसके अलावा व्रत और तपस्या के दौरान भगवान अयप्पा को समर्पित भजनों का नियमित जाप करने या उनसे जुड़े साहित्य आदि को पढ़ने की सलाह दी जाती है।

श्रद्धालु को 41 दिनों के इस कठिन व्रत और तपस्या से पहले एक विशेष माला पहनना होता है जो ‘वृतम’ यानी व्रत और नियमों के आरंभ का प्रतीक होती है। व्रत रखने वाले भक्तगण को यह माला शनिवार या एक विशेष ‘उत्तरम नक्षत्र’ के अवसर पर ही पहनना होता है। क्योंकि उत्तरम नक्षत्र श्री अय्यप्पन स्वामी का जन्म नक्षत्र है। असल में 41 दिवसीय ‘वृतम’ का उद्देश्य भक्त के जीवन में अनुशासन और स्वस्थ आदतों को विकसित करना और उन्हें एक आदत बनाना होता है।

सबरीमाला तीर्थ में खास तौर पर महिलाओं की आयु को लेकर चल रहे विवाद की बात करें तो इसमें 10 वर्ष से लगभग 50 वर्ष की उस विशेष रजस्वला प्राप्त आयु तक की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। भले ही संवैधानिक नियमों के अनुसार महिलाओं को इसमें जबरजस्ती सनातन धर्म के विरोध में अनुमति दी जा रही हो, लेकिन जो मूल सनातनी यानी हिंदू महिलाएं हैं उनको इसमें प्रवेश करने से स्वयं परहेज करना चाहिए। जबकि लगभग 50 वर्ष से अधिक और 10 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के लिए मंदिर में प्रवेश पर कोई रोक नहीं है।

इसमें व्रत और अनुशासन की बात करें तो अय्यप्पा स्वामी के भक्त “इयप्पन” या “स्वामी” कहलाते हैं। व्रत के दौरान भक्त काले या नीले वस्त्र धारण करते हैं, नंगे पाँव रहते हैं और किसी भी प्रकार की बुराई से स्वयं को दूर रखते हैं। और उनका यही अनुशासन उनके भीतर आत्मसंयम, सहनशीलता और भक्ति की गहराई को विकसित करता है।

इसमें मलिकप्पुरथम्मन मंदिर में गुरुस्वामी यानी व्रत करवाने वाले मुख्य गुरु अपने शिष्यों को ख़ास तौर पर काले वस्त्र और काली माला पहनाते हैं। इसी के बाद वे शिष्य “स्वामी शरणम् अयप्पा” कहते हुए काले वस्त्र में सादगी और भक्ति के साथ सबरीमाला की ये यात्रा करते हैं। दरअसल, काले वस्त्र या काले रंग को समानता, वैराग्य, शिव और शक्ति का प्रतीक माना जाता है और पापों का नाश करने वाले रंग के तौर पर देखा जाता है।

भगवान अयप्पा को समर्पित इस सबरीमाला तीर्थ पर जाने से पहले याद रखें कि श्रद्धालु को शुद्ध शाकाहारी भोजन ही खाना चाहिए और मांस, शारीरिक या मौखिक हिंसा, शराब, तंबाकू और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए। इस तीर्थयात्रा के दौरान श्रद्धालु को अपने बाल या नाखून काटने से भी परहेज करना होता है। 

मंदिर की यात्रा से पहले भक्तों को एक विशेष माला या रुद्राक्ष पहनना होता है। जिसके बाद भक्त को ज़मीन पर सोना चाहिए, लकड़ी के तख्ते को तकिये की तरह इस्तेमाल करना चाहिए और नंगे पैर चलना चाहिए। भक्त का कर्तव्य है कि वो अपने आसपास उपस्थित अन्य सभी भक्तों को “भगवान अय्यप्पन” मानकर उनकी हर तरह से सेवा और सहयोग करे। सबरीमाला तीर्थ पर जाने से पहले के ये सारे नियम ठीक उसी तरह से है जैसे उत्तर भारत में हर एक कांवड़िया अपनी संपूर्ण कांवड़ यात्रा के दौरान सनातन धर्म के कठिन नियमों का पालन करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश की बात करें तो अय्यप्पा स्वामी की उपासना केवल पूजा और व्रत आदि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके द्वारा भक्त के लिए अपने आचरण और जीवनशैली को शुद्ध बनाने का सबसे बड़ा मार्ग है। उनके संदेश में “तत्त्वमसि” — अर्थात् “तू वही है” का सिद्धांत सबसे प्रमुख है, जिसका अर्थ है कि – ईश्वर प्रत्येक जीव में विद्यमान है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सभी सनातनी हिंदू एक समान हैं और सबके साथ प्रेम, करुणा और भाईचारे का व्यवहार करना चाहिए।

असल में अय्यप्पा स्वामी की भक्ति पूर्ण रूप से अनुशासन और आत्मसंयम पर ही आधारित है। इसलिए उनकी उपासना हमें यह सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा तभी सार्थक है जब हम आत्मा को शुद्ध करें और प्रेम, दया तथा समानता के मार्ग पर चलें। इसीलिए सबरीमाला की कठिन यात्रा जीवन के संघर्षों का प्रतीक है, और उसका संदेश भी यही है कि धैर्य और भक्ति से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।

आज भले ही देशभर में एक विशेष वर्ग के लिए राजनीतिक एजेंडों के प्रतीक के तौर पर सेक्युलरवाद का डंका बज रहा है, लेकिन, फिर भी दक्षिण भारत ही वो क्षेत्र है जिसने अपनी पुरातन सनातन परंपराओं और धरोहरों, गुरुकुलों और मान्यताओं को आज तक उत्तर भारत से भी अधिक अच्छे से संभलकर रखा हुआ है।

सही मायनों में देखा जाय तो हमारे लिए आज भी सनातन धर्म की प्रमुख नगरी और धर्मरक्षक क्षेत्र के तौर पर दक्षिण भारत के राज्य ही सबसे आगे हैं जहां वर्तमान की धर्म विरोधी और विशेष वर्ग के लिए काम करने वाली संवैधानिक व्यवस्थाओं बावजूद यहां के तीर्थों और मंदिरों में साक्षात देवी-देवताओं के अलावा हमारी संस्कृति, परंपराएं, मान्यताएं, वेद, पुराण, गीता और सनातन धर्म आदि सबकुछ सुरक्षित है।

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