अजय चौहान | खानपान के मामलों में मिलावटखोरी के आंकड़ों को देखें तो (Food Adulteration) वर्तमान में यह एक बड़ी और अति गंभीर स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौती बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में भले ही FSSAI यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के माध्यम से नियमों को कड़ा करने और तकनीक का उपयोग बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन धरातल पर इसका कितना असर है ये हमें कहीं नहीं दीखता।
संसद के समक्ष प्रस्तुत ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो, भारत में परीक्षण किए गए प्रत्येक पांच खाद्य नमूनों में से लगभग एक नमूना अपने सुरक्षा मानकों को पूरा करने में विफल रहता है। हालांकि थोड़ा राहतभरी खबर यह भी कही जा सकती है कि इसमें ओडिशा के आंकड़े राष्ट्रीय औसत से बेहतर पाए गए हैं, लेकिन इन सभी राज्यों के आंकड़ों पर करीब से नज़र डालने पर चिंता से भरा प्रश्न यह भी उठता है कि क्या समस्या की गंभीरता का सही प्रकार से आकलन और पर्याप्त परीक्षण भी हो रहा है? क्योंकि, वर्ष 2024 से 2026 के बीच के कुछ नवीनतम आंकड़ों और सरकारी तथ्यों के आधार पर एक विस्तृत विश्लेषण देखें तो हमें ही नहीं बल्कि स्वयं सरकार को भी विषय पर गौर करना चाहिए की वो कहना क्या चाहती है और कर क्या रही है।
सबसे पहले तो यहां ये जान लें कि सरकार अपने आंकड़ों में कहना क्या चाहती है और करना क्या चाहती है। दरअसल, सरकार की उपलब्धियां कह रही हैं कि – मोदी सरकार ने ‘ईट राइट इंडिया‘ (Eat Right India) अभियान और डिजिटल निगरानी के जरिए मिलावटखोरी पर नकेल कसने की कोशिश की है। लेकिन एक्शन और प्रवर्तन के (Enforcement Data) नवीनतम सरकारी आंकड़ों (PIB, फरवरी 2026) के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में केवल दूध और डेयरी उत्पादों के 33,405 नमूने लिए गए। इसी अवधि में नियमों का उल्लंघन करने वाले खाद्य ऑपरेटरों (FBOs) के खिलाफ 12,057 मामले दर्ज किए गए। जबकि इससे पहले दोष सिद्ध होने पर वर्ष 2023-24 में देशभर के हजारों मामलों में करोड़ों रुपये का जुर्माना भी लगाया गया और कई लाइसेंस भी रद्द किए गए। लेकिन नतीजा फिर भी कुछ नहीं निकल पाया। इससे यही सिद्ध होता है कि इसके बुनियादी ढांचे में एक बड़े सुधार की आवश्यकता है, न की खानापूर्ति करने और दंड से प्राप्त राशि के माध्यम से खजाने को भरने की।
फूड सेफ्टी से जुड़े आंकड़ों और मंत्रालय की बात करें तो वर्तमान में “फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स” (FSW) के पास दूरदराज के इलाकों में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए लगभग 305 ऐसी मोबाइल लैब संचालित हैं जो मौके पर ही जांच कर सकती हैं। जबकि उनमें से 246 एनएबीएल यानी मान्यता प्राप्त लैब और 24 रेफरल लैब हैं। हालाँकि सरकार ने आम नागरिकों के लिए घर पर ही मिलावट की जांच करने के लिए ‘डिडेक्टिंग एडल्टरेंट्स विद रैपिड टेस्टिंग‘ का भी मैन्युअल जारी किया है लेकिन उसके कोई बड़े परिणाम अभी तक सामने नहीं आये हैं।
आश्चर्य होता है कि वर्ष 2024 से लागू कुछ नए कानूनी बदलाव के बावजूद परिणाम सुखद नहीं मिल पा रहे हैं। जबकि खाद्य मिलावट के लिए दंड के प्रावधानों को और भी अधिक स्पष्ट और शख्त किया गया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जुर्माने की राशि और सजा की अवधि में अभी भी सुधार की गुंजाइश है। क्योंकि सख्त कानूनों के बावजूद, जमीन पर मिलावटखोरी का ग्राफ अब भी चिंताजनक ही बना हुआ है।
सुधार के सन्दर्भ में दिए गए राष्ट्रव्यापी आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक की स्थिति में कहीं भीं सुखद परिणाम नहीं दिख पा रहे हैं। अप्रैल 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत में लिए गए हर 7 में से 1 नमूना यानी करीब 14% आंकड़े मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। आश्चर्य तो इस बात का है की ये आंकड़े घटने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं। क्योंकि बड़े पैमाने पर दूध में यूरिया, डिटर्जेंट और मसालों में सिंथेटिक रंगों की मिलावट को पूरी तरह रोकने में सरकार को बड़ी तो क्या छोटी सफलता भी नहीं मिल पा रही है।
सरकार का विभाग और प्रशासनिक अधिकारी अधिकतर इसको तकनीकी बाधाओं और स्टाफ की कमी से जोड़ कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में देखा जाय तो वे भी कुछ हद तक ठीक ही कह रहे हैं, क्योंकि कई राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के स्वीकृत पदों में 30 से 40% पद तो खाली पड़े हैं, जिसके कारण नियमित होने वाले निरीक्षण नहीं हो पाते और उसका परिणाम मिलावटखोरी को बल मिलना कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त विषय से जुड़े कई मामले ऐसे होते हैं जो कोर्ट में वर्षों तक खिंचते हैं, जिससे मिलावटखोरों में कानून का डर कम हो जाता है या फिर वे बिलकुल ही निडर हो जाते हैं।
हालाँकि यह भी सत्य है कि भारत का लाभगत 70% से अधिक खाद्य बाजार जैसे रेहड़ी-पटरी, स्थानीय मिठाई की दुकानें आदि असंगठित क्षेत्र से आता है, जहां FSSAI की पहुंच बहुत सीमित ही हो पाती है। लेकिन यहां मिलावट की संभावनायें भी बहुत काम ही रहती हैं क्योंकि ये क्षेत्र सीधे नियमित उपभोक्ता और आम आदमी के संपर्क में होने के कारण बड़ी और भ्रष्ट कंपनियों से सीधे जुड़े हुए नहीं होते हैं।
प्राप्त आंकड़ों के उदहारण को देखें तो गुजरात में लिए गए 12,387 सैंपलों में 7% मानक के विपरीत रहे। इसी तरह तमिलनाडु से लिए गए 7,839 आंकड़ों में से 14% और तेलंगाना में यह बढ़ कर 15.8% हो गया। सर्वाधिक मिलावटखोरी वाले राज्यों की बात करे तो इनमें उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर रहा। वर्ष 2024-25 और 2025-26 के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश की स्थिति तो बेहद गंभीर और डरावनी बनी हुई है। यानी वर्ष 2024-25 में लिए गए 30,380 नमूनों में से 16,500 यानी करीब 54% नमूने मानकों के विपरीत पाए गए। इसके बाद राजस्थान का नाम आता है। वर्ष 2024 की जांचे गए नमूनों में से राजस्थान में लगभग 25.5% नमूने फेल हुए हैं। वहीं अकेले जयपुर जैसे बड़े शहर में यह आंकड़ा 28.5% तक पाया गया।
आश्चर्य तो इस बात का है की सरकार ने डेयरी क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया है, लेकिन इसके बावजूद भी इसके आंकड़े डराने वाले निकले हैं। क्योंकि प्राप्त आंखों के अनुसार वर्ष 2024-25 में दूध और डेयरी उत्पादों के 33,405 नमूने लिए गए। जिनमें से 12,780 नमूने यानी करीब 38% मानकों के विपरीत पाए गए।
पनीर जैसे सबसे ख़ास खाद्य पदार्थ के विषय में अकेले पंजाब और हरियाणा से लिए गए नमूनों में 47% तक मिलावट या सब-स्टैंडर्ड गुणवत्ता पाई गई जिसमें मुख्यतः स्टार्च और डिटर्जेंट जैसे खतरनाक केमिकलों का उपयोग हुआ। इसी तरह मसालों की बात करें तो वर्ष 2022-2024 के बीच लिए गए 23,898 मसालों के नमूनों में से लगभग 1,559 नमूने असुरक्षित या सब-स्टैंडर्ड पाए गए। इनमें हानिकारक रंग यानी Metanil Yellow और कीटनाशकों यानी जिनको (Pesticides कहा जाता है के अवशेष मिले हैं।
सरकार का विभाग और प्रशासनिक अधिकारी अधिकतर इसको तकनीकी बाधाओं और स्टाफ की कमी से जोड़ कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में देखा जाय तो वे भी कुछ हद तक ठीक ही कह रहे हैं। क्योंकि कई राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के स्वीकृत पदों में 30 से 40% पद तो खाली पड़े हैं, जिसके कारण नियमित होने वाले निरीक्षण नहीं हो पाते और उसका परिणाम मिलावटखोरी को बल मिलना कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त विषय से जुड़े कई मामले ऐसे होते हैं जो कोर्ट में वर्षों तक खिंचते हैं, जिससे मिलावटखोरों में कानून का डर कम हो जाता है या फिर वे बिलकुल ही निडर हो जाते हैं।
हालाँकि यह भी सत्य है कि भारत का लाभगत 70% से अधिक खाद्य बाजार जैसे रेहड़ी-पटरी, स्थानीय मिठाई की दुकानें आदि असंगठित क्षेत्र से आता है, जहां FSSAI की पहुंच बहुत सीमित ही हो पाती है। लेकिन ये भी जान लेना चाहिए की यहां मिलावट की संभावनायें भी बहुत काम ही रहती हैं क्योंकि ये क्षेत्र सीधे आम आदमी से जुड़े होने के कारण बड़ी और भ्रष्ट कंपनियों से सीधे जुड़े हुए नहीं होते हैं।
मिलावटखोरी के कारण सरकार की दंडात्मक कार्रवाई में आंकड़ों को देखें तो फरवरी 2026 की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, किये गए मुकदमों के आधार पर वर्ष 2024-25 में दोषी खाद्य व्यवसाय ऑपरेटरों के खिलाफ कुल 12,057 नए मामले दर्ज किए। इसके अलावा वर्ष 2023-24 में नियमों के उल्लंघन पर देश भर में करोड़ों रुपये का प्रशासनिक जुर्माना भी लगाया गया।
हालाँकि मोदी सरकार ने तकनीक पोर्टल और निगरानी के जरिए सिस्टम को पारदर्शी बनाने पर जोर दिया है, लेकिन “जीरो टॉलरेंस” की स्थिति अभी भी कोसों दूर है। क्योंकि जब तक हर राज्यों और जिलों से लेकर तहसील स्तर तक में टीमें मजबूत नहीं होंगी तब तक जमीनी स्तर पर इसमें सुधार नहीं होने वाला है।