अजय सिंह चौहान | महाभारत के अनुसार राजा का प्रमुख कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना। इसीलिए सर्वप्रथम एक राजा को साहसी होना आवश्यक होता था। क्योंकि एक लोभी, लालची और कमजोर व्यक्तित्व और कमजोर निर्णय लेने वाला राजा राष्ट्र, धर्म और प्रजा के हित में नहीं माना गया है, न ही प्राचीन काल में और न ही आज के दौर में। न ही भारत में और न ही पश्चिमी सभ्यता में। असल में यही प्रमुख कारण है कि पश्चिमी देशों में तो उनकी अपनी-अपनी सरकारें अपने अनुसार ही चल रहीं हैं, लेकिन भारत में भी पश्चिमी कानूनों और मानसिकता के अनुसार पश्चिमी कानूनों के आधार पर ही सरकार चल रही है। जबकि हमारे शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है की एक राजा के कर्तव्य क्या हैं और किस प्रकार से उसको शासन करना चाहिए।
मनुस्मृति सहित हमारे तमाम धर्मग्रन्थ यही बताते हैं की यदि कोई राजा अपनी प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता है तो ऐसे राजा को हटा देना चाहिए। और उसको हटते समय यदि विकल्प न भी हो तो सोचना नहीं चाहिए की इस राजा का विकल्प नहीं है इसलिए हम उसे हटाएँ अथवा उसके अत्याचारों या उसकी कमजोरियों को झेलते रहें और अपने राष्ट्र और धर्म का पतन होते देखते रहें। क्योंकि यदि राजा अपने राष्ट्र, धर्म और प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता हो तो ऐसे राजा को किसी भी प्रकार से हटाना राष्ट्र, धर्म और प्रजा की आत्मरक्षा कहलाता है। क्योंकि आत्मरक्षा से ही संसार में जीवित रहा जा सकता है। अतः राजा का भी सर्वप्रथम यही कर्त्तव्य है कि वो अपनी प्रजा, अपने धर्म और अपने राष्ट्र की रक्षा पर ध्यान दे और इसके लिए हर प्रकार से शान्ति स्थापित करने की सुव्यवस्था करनी चाहिए।
जब तक की राजा अपने राज्य में शत्रुओं को नष्ट नहीं करेगा, तब तक शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती है। अतः वेदों और पुराणों में अनेक मन्त्रों के द्वारा राजा को शत्रु के नाश का आदेश दिया गया है। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ ने राज्याभिषेक के समय ही राजा का कर्तव्य बता दिया है, जिसके अनुसार, ‘अमित्राणां हन्ता’ अर्थात् शत्रुओं को नष्ट करे। इसी प्रकार से ‘यजुर्वेद’ का कथन है कि राक्षसों और पापियों के नाश के लिए तुझे राजा बनाया गया है, न की सत्ता भोगने के लिए।
मनुस्मृति सहित पुराणों और अन्य यही धर्मग्रंथों में भी राजा के लिए यही स्पष्ट आदेश है कि किसी भी प्रकार से वह शत्रु की सेना पर विजय प्राप्त करे और उपद्रवी एवं कपटी लोगों को उसी युद्ध भूमि में नष्ट करे। राज्याभिषेक के समय भी यही प्रार्थना की जाती है कि राजा अपने शत्रुओं को पैर से रौंद दे और हर युद्ध में उनको सर्वथा समाप्त कर दे। अपनी प्रजा की रक्षा के लिए, राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए और धर्मानुसार न्यायपूर्ण युद्ध लड़ने के लिए उसे साहस, धैर्य और कूटनीति से शत्रुओं को परास्त करना चाहिए, साथ ही आत्म-बलिदान के लिए सदैव तत्पर रहते हुए राजा को व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर प्रजा का कल्याण सुनिश्चित करना चाहिए।
राजा को हर संभव अपनी सेना का मनोबल बढ़ाते रहना होता है, जिसके लिए जासूसों के माध्यम से शत्रु की कमजोरियों का पता लगाना और चतुर सेनापति नियुक्त करना उसका उसका कर्तव्य होना चाहिए। युद्ध के दौरान भी, राज्य में न्याय व्यवस्था बनाए रखना और राज्य की प्रशासनिक, आर्थिक व्यवस्था को सुचारू रखना आवश्यक होता है इसलिए राजा को चाहिए की अपने मंत्रियों को भी वह निर्देश देता रहे ही विकत स्थिति में किस प्रकार से संयम बरता जाता है।