श्री हरिवंश पुराण के अनुसार, नरकासूर का मित्र और पुड्र देश का राजा पौण्ड्रक बहुत ही बलवान था। स्वयं को परशुराम की भाँती ही समझता था। हालांकि यदुवंश से और ख़ासकर श्रीकृष्ण से उसका सबसे अधिक द्वेष था क्योंकि वह श्रीकृष्ण से कई युद्ध हार चुका था। फिर भी श्रीकृष्ण को परास्त करने के अनुचित अवसर की तलाश में लगा रहता था। वह हर बार यही सोचता था की जब कभी भी श्रीकृष्ण द्वारिका से बाहर होंगे तभी वह उस द्वारिका पर धावा बोलकर सभी यदुवंशियों को समाप्त कर देगा।
एक बार जब श्रीकृष्ण कैलाश पर शिवजी से भेंट करने गए थे, तब पौण्ड्रक ने अपने अन्य मित्र राजाओं के साथ मिलकर द्वारिका पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण का वह समय रात का था और आक्रमण के समय वह एक बड़ी भयंकर और आक्रामक सेना लेकर अचानक से आया था। उसके सैनिकों के हाथों में माशालें, और अन्य सभी अस्त्र-शास्त्र आदि भी थे।
क्योंकि पौण्ड्रक ने द्वारिका पर वह आक्रमण रात के समय किया था इसलिए उस समय समस्त यदुवंशी निद्रा के आगोश में और किसी भी बड़े खतरे से अनजान होकर सो रहे थे। हालांकि वे प्रतिउत्तर के लिए पहले ही से सजग थे किन्तु उनको इसका बिल्कुल भी अनुमान नहीं था की शत्रु उनपर रात में भी आक्रमण कर सकता है, क्योंकि उन दिनों सूर्य अस्त और सूर्य उदय से पूर्व होने वाला युद्ध नियमों के विरुद्ध होता था।
हालांकि युद्ध हुआ, घनघोर युद्ध हुआ। किन्तु यदुवंशी सेना अधिक देर तक नहीं टिक पाई और हारती गई। पौण्ड्रक ने अपने साथी राजाओं और सैनिकों को आदेश दिया की जाओ और द्वारिका के परकोटे को नष्ट कर दो। महलों और अट्टालिकाओं पर चढ़ कर गिरा दो। अंदर की कीमती वस्तुओं को छीन लाओ और सुन्दर वस्तुओं को नष्ट कर दो, यादव स्त्रियों, कन्याओं और दासियों को खिंच कर ले आओ और अपने अधिकार में कर लो। सारी धनराशि एकत्र कर ले चलो।
पौण्ड्रक की सेना और सहयोगियों की सेना ने वही किया और द्वारिका को हानि पहुंचाने लगे। पूर्वी द्वार के बहुत से बड़े-बड़े परकोटे नष्ट होकर गिरने की आवाज सुनकर सात्यकि क्रोध से मूर्च्छित हो गए। सात्यकि सोच रहे थे की श्रीकृष्ण मुझे इस नगर की रक्षा का दायित्व सौंप कर कैलाश पर गए हैं। अतः मुझे इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिए। मन ही मन यह सोचकर वे तुरंत धनुष लेकर एक रथ ओर सवार हुए और दारुक के पुत्र को अपना सारथी बनाकर कवच धारण करते हुए शत्रु को ललकारने चल दिए।
उनके पीछे बलराम भी अपनी गदा लेकर चल दिए, साथ में एक विशाल सेना भी युद्ध के लिए तैयार हो चुकी थी। चारों तरफ यदुवंशी सेना की माशालों का उजाला होने लगा। यदुवंशी सेना ने पौण्ड्रक के लुटेरे सैनिकों पर धावा बोल दिया। भयंकर हमला जानकार शत्रु सैनिक पौण्ड्रक की शरण में जा पहुंचे।
शत्रु सेना के समक्ष पहुँचते ही महाबली सात्यकि ने ललकारा – दुरात्मा नीच पौण्ड्रक इस समय कहाँ है? मैं भगवान् श्रीकृष्ण का सेवक सत्यकि पौण्ड्रक का वध करने आया हूं। रात में जब समस्त महात्मा यादव सौ रहे हों तब कौन श्रेष्ट इस तरह चोर की भाँति जघन्य कर्म कर सकता है? यह कार्य किसी भी बलवान राजा का नहीं अपितु किसी कायर और चोर का ही कार्य होता है।
इस कथा का अभिप्राय यही है कि व्यक्त चाहे कितना भी स्वयं को सुरक्षित कर ले, कोई भी सुरक्षात्मक पहरा लगा ले, लेकिन शत्रु बोध और शत्रु के विषय में विश्वस्त जानकारियों न हो तो वह स्वयं तो हारेगा ही अपितु अपने परिवारों को भी खतरे में दाल देगा। शत्रु पहले भी रात के अँधेरे में ही आक्रमण करते थे और आज भी वे रात के अँधेरे में ही आक्रमण करते हैं, क्योंकि उनकी पैशाचिक और दानवी शक्तियां रात में ही जाग्रत होती हैं।