सोलर एनर्जी के लिए राजस्थान (Solar energy plants in desert of India) की मरू भूमि पर 25 लाख पेड़ काटे तो 5° पारा बढ़ गया। नतीजा मरुस्थलीय पेड़ों और विभिन्न जीव जंतुओं को पिछले 14 साल में 4 जिलों से ग्रीन एनर्जी के नाम पर लगभग तबाह कर दिया। आश्चर्य तो इस बात का है कि जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर व जैसलमेर जैसे क्षेत्रों से गांव के गांव पलायन करने को विवश हैं क्योंकि अब वहां पीने का पानी भी नहीं बचा।
सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिए लगाए जा रहे सोलर प्लांट मरुस्थलीय पेड़ों और जैव विविधता के विनाश का कारण बन गए हैं। बीते 14 साल में जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर व जैसलमेर में 21,788 मेगावाट क्षमता के सरकारी और निजी कंपनियों के सोलर प्लांट स्थापित किए गए। करीब 1.08 लाख बीघा जमीन में ये प्लांट लगाने के लिए करीब 25 लाख पेड़ों की बलि चढ़ाई गई। जमीन समतल करने के लिए काटे गए पेड़ों में 70% से ज्यादा राज्य वृक्ष खेजड़ी हैं। इसके अलावा रोहिड़ा, देसी बबूल, झाल, कूमटिया भी शामिल है। कंटिली झाड़ियां, घास के बीज नष्ट हो गए हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने से सोलर साइट पर औसतन 4-5 डिग्री तापमान बढ़ गया है। वहीं, थार की जैव विविधता नष्ट हो रही हैं। इसका खुलासा बीकानेर के महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार छंगाणी और बिट्स रांची की रिमोट सेसिंग विभाग की डॉ. ऋचा शर्मा की स्टडी में हुआ। पेड़ों को बचाने के लिए इन साइट्स की पर्यावरण ऑडिट तो दूर रजिस्ट्रेशन के समय ही जमीन पर पेड़ न होने का झूठा सर्टिफिकेट भी दिया जा रहा है। ऐसे में राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम (आरआरईसी) और ऊर्जा विभाग ने काटे गए पेड़ों के बदले नए पेड़ लगाने की कोई पॉलिसी ही नहीं बनाई। भास्कर ने इस काले सच को उजागर करने के लिए चारों जिलों में बीते एक सप्ताह में कई बड़े प्लांट का इन्वेस्टिगेशन किया।
– दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के आधार पर।