प्रतापगढ़ (23 मई)। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘१००८’ जी की ऐतिहासिक 81 दिवसीय ‘गविष्ठी (गौरक्षार्थ धर्मयुद्ध)’ (3 मई – 24 जुलाई 2026) के इक्कीसवें दिन आज प्रतापगढ़/ कौशाम्बी जिले की पांच विधानसभाओं में विशाल जनसभाएँ सम्पन्न हुईं। मानिकपुर बाजार स्थित पौराणिक एवं सुप्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर के पावन सानिध्य में आयोजित एक विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर अनंतश्रीविभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘१००८’ जी महाराज ने सनातन समाज को झकझोरते हुए गौ-माता की रक्षा के लिए शक्ति संचय का आह्वान किया और कहा कि इस संसार में छोटे से छोटा काम भी बिना शक्ति के नहीं चलता। जब देवताओं ने भगवती से रक्षा की प्रार्थना की थी, तो आदि-शक्ति ने भी सभी देवताओं से उनकी थोड़ी-थोड़ी शक्ति मांगी थी और जब सबकी शक्ति इकट्ठा हुई, तब असुरों का संहार हुआ।
महाराज श्री ने मानिकपुर की पावन धरती से दो टूक कहा कि आज राजनीति की असली शक्ति यानी वोट जनता के हाथों में है, लेकिन जनता ने अपनी शक्ति ऐसे नेताओं को दे दी, जिन्होंने गाय को पशु मानकर डॉलर के लिए कटने को छोड़ दिया, इसलिए यदि हमारे द्वारा कहलवाई गई बात आपके मन की है, तो इसे केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण में धारण करें। ढोंग मत करना, सचमुच धारण करो और घोषणा कर दो कि जो पार्टी गाय को पशु सूची से हटाकर माँ के रूप में दर्ज नहीं करेगी, उससे कोई संबंध नहीं रखा जाएगा।
जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने कड़ा धार्मिक दंड बताते हुए सचेत किया कि जब तक कोई राजनीतिक पार्टी गौ-माता को पशु सूची से हटाकर माँ के रूप में दर्ज करके सामने नहीं आती, तब तक उससे संबंध रखना महापाप है, ऐसा करने वालों का हिंदुत्व समाप्त हो जाएगा और नरक का दरवाजा उनके लिए खुल जाएगा, क्योंकि यहाँ चेहरा देखकर निर्णय नहीं होता, जो बात है सो है।
महाराज श्री ने देश के सभी नेताओं को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि आप चाहे प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो, सभासद हो, पार्षद हो या किसी भी पद पर रहो, यह पद ‘चार दिन की चांदनी’ है और जब मरोगे, तो यमराज के सामने सबको खड़ा होना पड़ेगा, जहाँ यमराज यह देखकर निर्णय नहीं करेंगे कि यह किस पद से सेवानिवृत्त होकर आया है, बल्कि यह देखेंगे कि इसका चरित्र और आचरण कैसा रहा है, और यही हिंदू धर्म की विशेषता है।
पूज्य श्री ने राजनेताओं के पाखंड पर तीव्र प्रहार करते हुए आक्रोश व्यक्त किया कि 78 वर्ष से देश आज़ाद है और बहुसंख्यक हिंदू समाज बार-बार गौ-हत्या बंद करने की मांग कर रहा है, लेकिन आज देश में प्रतिदिन लगभग 1 लाख गायें मारी जा रही हैं और उनका मांस पैकेटों में भरकर विदेशियों को डॉलर के लिए बेचा जा रहा है, जबकि नेता कैमरे और मंच के सामने आकर ढोंग करते हैं कि उनके राज्य में गाय को खरोंच नहीं लग सकती, जबकि हर थाने-जिले में गायें कट रही हैं। इस पाखंडी समाज से अच्छे तो वनवासी (आदिवासी) हैं, जो कम से कम जो मन में होता है वही बोलते और करते हैं।
उद्बोधन के अंतिम भाग में ज्वाला देवी मंदिर परिसर में जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने उपस्थित समस्त जनता को जाग्रत करने के लिए दाहिना हाथ उठवाकर ‘सुदर्शन चक्र मुद्रा’ यानी तर्जनी उंगली खोलने की विशेष मुद्रा की दीक्षा दी और इसका रहस्य समझाते हुए कहा कि ईश्वर का अंश होने के कारण आप सभी में रक्षा की शक्ति समाहित है और जब भगवान किसी की रक्षा करना चाहते हैं, तो यही मुद्रा बनाते हैं जिसे देखते ही सुदर्शन चक्र समझ जाता है कि भगवान अब किसी की रक्षा करना चाहते हैं, इसलिए जब-जब याद आए, दाहिना हाथ उठाकर पहली उंगली खोल लेना और भावना करना कि मेरी उंगली में भी सुदर्शन चक्र आ रहा है और मैं गौ-माता की रक्षा करने में समर्थ हो रहा हूँ।
इसके साथ ही महाराज श्री ने देवराज इंद्र द्वारा वृत्रासुर नाम के असुर (जो गायों को सताता था) के वध के समय मुख से निकले प्राचीन वैदिक महामंत्र “अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ” का तीन बार सामूहिक जाप करवाया और कहा कि जिस प्रकार इंद्र ने वज्र प्रहार करके गायों को सताने वाले असुर का वध किया था, वैसे ही इस मंत्र के अभ्यास से आप में शक्ति उत्पन्न होगी और आपको भी गायों को सताने वाले आधुनिक असुरों को पछाड़ना है।
सभा के अंत में शंकराचार्य जी महाराज के सम्मुख मानिकपुर की हज़ारों जनता ने दोनों हाथ उठाकर माँ ज्वाला देवी के पावन सानिध्य में यह प्रतिज्ञा ली कि “मैं आज भगवती ज्वाला देवी के पावन सानिध्य में यह घोषणा करता/करती हूँ कि गाय मेरी माता है और मेरी गौ-माता को जो कोई भी चोट पहुँचाएगा या चोट पहुँचाने वालों से कोई संबंध-संपर्क रखेगा, लेन-देन करेगा, साठ-गाँठ रखेगा, तो वह व्यक्ति, वह संस्था, वह पार्टी मेरी दुश्मन होगी; आज के बाद जिस पार्टी को मेरा वोट चाहिए, वह सबसे पहले गौ-माता को पशु सूची से हटवाकर गौ-माता के रूप में दर्ज करवाकर आए, तभी मेरे दरवाजे आए और बिना इसके आने पर हम उसका स्वागत नहीं कर सकेंगे, बुरा न लगे।
