जीव को माता के गर्भ में अनेक जन्मों की बातें याद आती हैं, जिससे व्यथित होकर वह इधर-उधर फिरता और निर्वेद (खेद) को प्राप्त होता है। अपने मन में सोचता है–’अब इस उदर (गर्भ) से छुटकारा पाने पर मैं फिर ऐसा कार्य नहीं करूँगा, बल्कि इस बात के लिये चेष्टा करूँगा कि मुझे फिर गर्भ के भीतर न आना पड़े।’ सैकड़ों जन्मों के दुःखों का स्मरण कर के वह इसी प्रकार चिन्ता करता है। तत्पश्चात् कालक्रम से वह अधोमुख जीव जब नवें या दसवें महीने का होता है तब उसका जन्म हो जाता है। गर्भ से निकलते समय वह प्राजापत्य वायु से पीड़ित होता है और मन-ही-मन दुःख से व्यथित हो रोते हुए गर्भ से बाहर आता है। तदनन्तर वह जीव पहले तो बाल्यावस्था को प्राप्त होता है, फिर क्रमशः कौमारावस्था, यौवनावस्था और वृद्धावस्था में प्रवेश करता है। इसके बाद मृत्यु को प्राप्त होता और मृत्यु के बाद फिर जन्म लेता है। इस प्रकार इस संसारचक्र में वह घटीयन्त्र (रहट)-की भाँति घूमता रहता है। कभी स्वर्ग में जाता है, कभी नरक में। कभी इस संसार में पुनः जन्म लेकर अपने कर्मों को भोगता है, कभी कर्मों का भोग समाप्त होने पर थोड़े ही समय में मरकर परलोक में चला जाता है। कभी स्वर्ग और नरक को प्रायः भोग चुकने के बाद थोड़े से शुभाशुभ कर्म शेष रहने पर फिर इस संसार में जन्म लेता है —
नारकी जीव घोर दुःखदायी नरकों में गिराये जाते हैं। पुण्यवान् स्वर्ग में जाते हैं। स्वर्ग में पहुँचने के बाद से ही मन में इस बात की चिन्ता बनी रहती है कि पुण्यक्षय होने पर हमें यहाँ से नीचे गिरना पड़ेगा। साथ ही नरक में पड़े हुए जीवों को देखकर महान् दुःख होता है कि कभी हमें भी ऐसी ही दुर्गति भोगनी पड़ेगी। यमराज के आदेशानुसार पापी जीव यातना-शरीर प्राप्त करके विविध नरकों में गिराये जाते हैं। फिर, विभिन्न दुःखद योनियों में भेजे जाते हैं। उनका कुछ विवरण यह है-
एक भयानक नरक का नाम है-‘रौरव’ –
इस रौरव नरक की लंबाई-चौडाई दो हजार योजन की है। यह एक गड्ढे के रूप में है। यह नरक अत्यन्त दुस्तर है। इसमें भूमि के बराबर तक अङ्गारक ढेर बिछे हैं। इसके भीतर की भूमि दहकते हुए अङ्गारों से बहुत तपी होती है सारा हक तीव्र वेग से प्रज्वलित होता रहता है। यमराज के दूत पापी प्राणी को इसी के भीतर डाल देते है। वह धधकती आग से जब जलने लगता है, तब इधर-उधर दौड़ता है; किंतु पग-पर पर उसके पैर जल-भुनकर राख होते रहते हैं। वह दिन-रात में कभी एक बार पैर उठाने और रखने में समर्थ होता है। इस प्रकार सहस्रों योजन पार करने पर वह इस नरक से छुटकारा पाता है। (‘यातना देह’ उस देह को कहते हैं जो नरक की पीड़ा भुगताने को दिया जाता है। इसमें जलने कटने आदि की भयानक पीड़ा होती है, पर यह जल या कटकर नष्ट नहीं होता। पीड़ा भोगने के लिये ज्यों- का त्यों बना रहता है।)
अब ‘महारौरव’ का वर्णन सुनिये –
इसका विस्तार सब ओर से बारह हजार योजन है। वहाँ की भूमि ताँबे की हैं जिसके नीचे आग धधकती रहती है। उसकी आँच से तापकर वह सारी ताम्रमयी भूमि चमकती हुई बिजली के समान ज्योतिमंदी दिखायी देती है। उसकी ओर देखना और स्पर्श आदि करना अत्यन्त भयंकर है यमराज के हाथ और पैर बाँधकर पापी जीव को उसके भीतर डाल देते हैं और यह लोटता हुआ आगे बढ़ता है। मार्ग कौवे बगुले, बिच्छू, मच्छर और गिद्ध उसे जल्दी जल्दी नोच खाते हैं। उसमें जलते समय वह व्याकुल हो-होकर छटपटाता है और बारंबार ‘अरे बाप! अरे मैया, हाय मैया हा तात अदि की रट लगाता हुआ करुण क्रन्दन करता है, किंतु उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती। इस प्रकार उसमें पड़े हुए जीव, जिन्होंने दूषित बुद्धि के कारण पार किये हैं, दस करोड़ वर्ष बीतने पर उससे छुटकारा पाते हैं।
‘तम’ नामक नरक –
इसके सिवा ‘तम’ नामक एक दूसरा नरक है, वहाँ स्वभाव से ही कड़ाके की सर्दी पड़ती है। उसका विस्तार भी महारौरव के हो बराबर है; किंतु वह घोर अन्धकार से आच्छादित रहता है। वहाँ पापी मनुष्य सर्दी से कष्ट पाकर भयानक अन्धकार में दौड़ते हैं और एक-दूसरे से भिड़कर लिपटे रहते हैं। जाडे के कष्ट से काँपकर कटकटाते हुए उनके दाँत टूट जाते हैं। भूख-प्यास भी वहाँ बड़े जोर की लगती है। इसी प्रकार अन्यान्य उपद्रव भी होते रहते हैं। ओलों के साथ बहने वाली भयंकर वायु शरीर में लगकर हड्डियों को चूर्ण किये देती है और उनसे जो मज्जा तथा रक्त गिरता है, उसी को वे क्षुधातुर प्राणी खाते हैं। एक दूसरे के शरीर से सटकर वे परस्पर रक्त चाटा करते हैं। इस प्रकार जब तक पापों का भोग समाप्त नहीं हो जाता, तब तक वहाँ भी मनुष्यों को अन्धकार में महान् कष्ट भोगना पड़ता है।
निकृन्तन’ नामक नरक –
इससे भिन्न एक ‘निकृन्तन’ नामक नरक है। उसमें कुम्हार की चाक के समान बहुत-से चक्र निरन्तर घूमते रहते हैं। यमराज के दूत पापी जीवों को उन चक्रों पर चढ़ा देते और अपनी अंगुलियों में कालसूत्र लेकर, उसी के द्वारा उनके पैर से लेकर मस्तक तक प्रत्येक अङ्ग काटा करते हैं। फिर भी उन पापियों के प्राण नहीं निकलते। उनके शरीर के सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं, किंतु फिर वे जुड़कर एक हो जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव हजारों वर्षों तक वहाँ काटे जाते हैं। यह यातना उन्हें तब तक दी जाती है जब तक कि उनके सारे पापों का नाश नहीं हो जाता।
अप्रतिष्ठ’ नामक नरक –
अब ‘अप्रतिष्ठ’ नामक नरक का वर्णन सुनिये, जिसमें पड़े हुए जीवों को असह्य दु:ख का अनुभव करना पड़ता है। वहाँ भी वे ही कुलालचक्र होते हैं। साथ ही दूसरी ओर घटीयन्त्र भी बने होते हैं, जो पापी मनुष्यों को दुःख पहुँचाने के लिये बनाये गये हैं। वहाँ कुछ मनुष्य उन चक्रों पर चढ़ाकर घुमाये जाते हैं। हजारों वर्षों तक उन्हें बीच में विश्राम नहीं मिलता। इसी प्रकार दूसरे पापी घटीयन्त्रों में बाँध दिये जाते हैं; ठीक उसी तरह, जैसे रहट में छोटे-छोटे घड़े बँधे होते हैं। वहाँ बँधे हुए मनुष्य उन यन्त्रों के साथ में जब घूमने लगते हैं तो बारंबार रक्त वमन करते हैं। उनके मुख से लार गिरती है और नेत्रों से अश्रु झरते रहते हैं। उस समय उन्हें इतना दुःख होता है, जो जीवमात्र के लिये असह्य है।
‘असिपत्रवन’ नामक नरक –
अब ‘असिपत्रवन’ नामक अन्य नरक का वर्णन सुनिये। वहाँ एक हजार योजन तक की भूमि प्रज्वलित अग्नि से आच्छादित रहती है तथा ऊपर से सूर्य को अत्यन्त भयंकर एवं प्रचण्ड किरणें ताप देती है, जिनसे उस नरक में निवास करने वाले जीव सदा संत होते रहते हैं। उसके बीच में एक बहुत ही सुन्दर वन है. जिसके पत्ते चिकने जान पड़ते हैं। किंतु वे सभी पत्ते तलवार की तीखी धार के समान हैं उस बन में बड़े बलवान कुत्ते भूँकते रहते हैं, जो दस हजार की संख्या में सुशोभित होते हैं। उनके मुख और दाई बड़ी-बड़ी होती हैं। वे व्याघ्रों कि समान भयानक प्रतीत होते हैं। वहाँ को भूमि पर जो आग बिछी होती है, उससे जब दोनों पैर जलने लगते हैं, तब वहाँ गये हुए पापी जीव ‘हाय माता हाय पिता’ आदि कहते हुए अत्यन्त दुःखित होकर कराहने लगते हैं। उस समय तीव्र पिपासा के कारण उन्हें बड़ी पीड़ा होती है, फिर अपने सामने शीतल छाया से युक्त असिपत्र वन को देखकर ये प्राणी विश्राम की इच्छा से वहाँ जाते हैं। उनके वहाँ पहुँचने पर बड़े जोर की हवा चलती है, जिससे उनके ऊपर तलवार के समान तीखे पत्ते गिरने लगते हैं। उनसे आहत होकर वे पृथ्वी पर जलते हुए अङ्गार के ढेर में गिर पड़ते हैं। वह आग अपनी लपटों में सर्वत्र व्यास हो सम्पूर्ण भूतल को चाटती हुई-सी जान पड़ती है। इसी समय अत्यन्त भयानक कुत्ते वहाँ तुरंत ही दौड़ते हुए आते हैं और रोते हुए पापियों के सब अङ्गों को टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं।
‘तनकुम्भ’ नामक नरक –
अब इससे भी अत्यन्त भयंकर ‘तनकुम्भ’ नामक नरक है। वहाँ चारों ओर आग की लपटों से घिरे हुए बहुत-से लोहे के घड़े मौजूद हैं, जो खूब तपे होते हैं। उनमें से किन्हीं में तो प्रज्वलित अग्नि की आँच से खौलता हुआ तेल भरा रहता है और किन्हीं में तपाये हुए लोहे का चूर्ण होता है। यमराज के दूत पापी मनुष्यों को उनका मुँह नीचे करके उन्हीं घड़ों में डाल देते हैं। वहाँ पड़ते ही उनके शरीर टूट-फूट जाते हैं। शरीर को मज्जा का भाग गलकर पानी हो जाता है। कपाल और नेत्रों की हड्डियाँ चटक कर फूटने लगती हैं।

भयानक गृध्र उनके अलों को नोच-नोचकर टुकड़े टुकड़े कर देते हैं और फिर उन टुकड़ों को उन्हीं घड़ों में डाल देते हैं। वहाँ वे सभी टुकड़े तेल में मिल जाते हैं। मस्तक शरीर, स्नायु, मांग, त्वचा और हड्डियाँ—सभी गल जाती हैं। तदनन्तर यमराज के दूत करतुल से उलट पलटकर खीलते हुए तेल में पापियों को अच्छी तरह मयते हैं। पाँसलेपर पानी पीनेको जाती हुई गौओंको जो वहाँ जानेमे रोक देता है और ये प्यासी रह जाती हैं. इससे उसको भयंकर नरकमें जाना पड़ता है, जो अगकी लपटें निकलती रहनेके कारण घोर दुःखदायों होता है। उसमें लोहेकी-सी चोंचवाले पक्षी रहते हैं, जो पापियोंको चाँचसे नोचा करते हैं। वहाँ पापियोंकि शरीरको कोल्हू में पेरनेके लिये उनके मुखसे रकको धारा बहने लगती है, जिससे रक्त कीचड़ जमा रहता है। तलवालुका और तमकुम्भ नरकोंमें उसे संतरा किया जाता है।
जो नोच मनुष्य काम और लोभ के वशीभूत हो दूषित दृष्टि एवं कलुषित चित्त में परायी स्त्री और पराये धन पर आँखें गड़ाते हैं उनकी दोनों आँखों को ये वज्रतुल्य चोंच वाले पक्षी निकाल लेते हैं और पुनः पुनः इनके नये नेत्र उत्पन्न हो जाते हैं। इन पापी मनुष्योंनि जितने निमेष तक पापपूर्ण दृष्टिपात किया है, उतने हो हजार वर्षों तक ये नेत्र की पीड़ा भोगते हैं। जिन लोगों ने असत् शास्त्र का उपदेश किया है तथा किसी को बुरी सलाह दी है, जिन्होंने शास्त्र का उलटा अर्थ लगाया है, मुँह से झूठी बातें निकाली हैं तथा वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरु की निन्दा की है, उन्हीं की जिह्ना को ये वज्रतुल्य चोंच वाले भयंकर पक्षी उखाड़ते हैं और वह जिह्वा नयी-नयी उत्पन्न होती रहती है। जितने निमेष तक उनके द्वारा जिह्वाजनित पाप हुआ होता है, उतने वर्षों तक उन्हें यह कष्ट भोगना पड़ता है जो नराधम दो मित्रों में फूट डालते हैं। पिता-पुत्र में। स्वजनों में, यजमान और पुरोहित में, माता और पुत्र में, सङ्गी-साथियों में तथा पति और पत्नी में बैर करवा देते हैं. वे ही ये आरे से चरि जा रहे हैं। आप इनकी दुर्गति देखिये। जो दूसरों को ताप देते, उनकी प्रसन्नता में बाधा पहुँचाते, पंखे, हवादार स्थान, चन्दन और खस की टट्टी (घास की जड़ों से बना एक प्राकृतिक और पारंपरिक पर्दा या जाली) आदि का अपहरण करते हैं तथा निर्दोष व्यक्तियों को भी प्राणान्तक कष्ट पहुँचाते हैं, वे ही ये अधम पापी हैं, जो तपायी हुई बालू में पड़कर कष्ट भोगते हैं। जो अपनी अनुचित बातों से साधु पुरुषों के मर्म पर आघात पहुँचाता है, उसको ये पक्षी अत्यन्त पीड़ा देते हैं। इन्हें ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता। जो झूठी बातें कहकर और विपरीत धारणा बनाकर किसी की चुगली खाते हैं, उनकी जिह्वा के इस प्रकार तेज किये हुए छूरों से दो टुकड़े कर दिये जाते हैं।
जिन्होंने उद्दण्डतावश माता, पिता तथा गुरुजनों का अनादर किया है, वे ही यहाँ पीब, विष्ठा और मूत्र से भरे हुए गड्डों में नीचे मुख करके डुबाये जा रहे हैं। जो लोग देवता, अतिथि, अन्यान्य प्राणी, भृत्यवर्ग, अभ्यागत, पितर, अग्नि तथा पक्षियों को अन्न का भाग दिये बिना ही स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे ही दुष्ट यहाँ पीब और गोंद चाटकर रहते हैं। उनका शरीर तो पहाड़ के समान विशाल होता है, किंतु मुख सूई की नोक के बराबर रहता है। जो लोग पंक्ति में बिठाकर भोजन में भेद करते हैं, उन्हें यहाँ विष्टा खाकर रहना पड़ता है। जो लोग एक समुदाय में साथ-साथ आये हुए अर्थार्थी मनुष्य को निर्धन जानकर छोड़ देते और अकेले अपना अन्न भोजन करते हैं, वे ही यहाँ थूक और खखार भोजन करते हैं। जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक जूठे मुँह होकर भी सूर्य-चन्द्रमा और तारों पर दृष्टिपात किया है, उनकी आँखों में आग रखकर यमराज के दूत उसे धौंकते हैं। गौ, अग्नि, माता, ब्राह्मण, ज्येष्ठ भ्राता, पिता, बहिन, कुटुम्ब की स्त्री, गुरु तथा बड़े-बूढ़ों का जो जान-बूझकर पैरों से स्पर्श करते हैं, उनके दोनों पैर यहाँ आग में तपायी हुई लोहे की बेड़ियों से जकड़ दिये जाते हैं और उन्हें अङ्गारों के ढेर में खड़ा कर दिया जाता है। उसमें उनके पैर से लेकर घुटने तक का भाग जलता रहता है। जो नराधम अपने कानों से गुरु, देवता, द्विज और वेदों की निन्दा सुनते हैं और उसे सुनकर प्रसन्न होते हैं, उन पापियों के कानों में ये यमराज के दूत आग में तपायी हुई लोहे की कीलें ठोंक देते हैं। जो लोग क्रोध और लोभ के वश में होकर पोंसले, देवमन्दिर, ब्राह्मण के घर तथा देवालय के सभाभवन तुड़वाकर नष्ट करा देते हैं, उनके यहाँ आने पर ये अत्यन्त कठोर स्वभाव वाले यमदूत इन तीखे शस्त्रों से शरीर की खाल उधेड़ लेते हैं। उनके चीखने चिल्लाने पर भी थे दया नहीं करते। जो मनुष्य गौ, ब्राह्मण तथा सूर्य की ओर मुँह करके मल-मूत्र का त्याग करते हैं, उनकी आँतों को कौए गुदामार्ग से खींचते हैं। जो किसी एक को कन्या देकर फिर दूसरे के साथ उसका विवाह कर देता है, उसके शरीर में बहुत से घाव करके उसे खारे पानी की नदी में बहा दिया जाता है।
जो मनुष्य दुर्भिक्ष अथवा संकटकाल में अपने पुत्र, नृत्य, पत्नी आदि तथा बन्धुवर्ग को अकिंचन जानकर भी त्याग देता और केवल अपना पेट पालने में लग जाता है, वह भी जब इस लोक में आता है तो यमराज के दूत भूख लगने पर उसके मुख में उसके ही शरीर का मांस नोचकर डाल देते हैं और वही उसे खाना पड़ता है। जो अपनी शरण में आये हुए तथा अपनी ही दी हुई वृत्ति से जीविका चलाने वाले मनुष्यों को लोभवश त्याग देता है, वह भी यमदूतों द्वारा इसी प्रकार कोल्हू में पेरे जाने के कारण यन्त्रणा भोगता है। जो मनुष्य अपने जीवनभर के किये हुए पुण्य को धन के लोभ से बेच डालते हैं, वे इन्हीं पापियों की तरह चक्कियों में पीसे जाते हैं। किसी की धरोहर हड़प लेने वाले लोगों के सब अङ्ग रस्सियों से बाँध दिये जाते हैं और उन्हें दिन-रात कीड़े, बिच्छू तथा सर्प काटते-खाते रहते हैं। इसमें लोहे के बड़े-बड़े काँटों से भरा हुआ सेमर का विशाल वृक्ष है। इस पर चढ़ाये हुए पापियों के सब अङ्ग विदीर्ण हो जाते हैं और अधिक मात्रा में गिरते हुए खूनसे ये लथपथ रहते हैं। नरश्रेष्ठ! परायी स्त्रियों का सतीत्व ये नष्ट करने वाले लोग यमराज के दूतों द्वारा घरिया में रखकर गलाये जाते हैं। जो उद्दण्ड मनुष्य गुरु को नीचे बिठाकर और स्वयं ऊँचे आसन पर बैठकर अध्ययन करता अथवा शिल्पकला की शिक्षा ग्रहण करता है, वह इसी प्रकार अपने मस्तक पर शिला का भारी भार ढोता हुआ क्लेश पाता है। यमलोक के मार्ग में वह अत्यन्त पीड़ित एवं भूख से दुर्बल रहता है और उसका मस्तक दिन-रात बोझ ढोने की पीड़ा से व्यथित होता रहता है। जिन्होंने जल में मूत्र, थूक और विष्ठा का त्याग किया है, वे ही लोग इस समय थूक, विष्ठा और मूत्र से भरे हुए दुर्गन्ध-युक्त नरक में पड़े हैं। ये लोग जो भूख से व्याकुल होने पर एक-दूसरे का मांस खा रहे हैं, इन्होंने पूर्वकाल में अतिथियों को भोजन दिये बिना ही भोजन किया है। जिन लोगों ने अग्निहोत्री होकर भी वेदों और वैदिक अग्नियों का परित्याग किया है, वे ही ये पर्वतों की चोटी से बारंबार नीचे गिराये जाते हैं। पतितों का दिया हुआ दान लेने, उनका यज्ञ कराने तथा प्रतिदिन उनकी सेवा में रहने से मनुष्य पत्थर के भीतर कीड़ा होकर सदा निवास करता है। जो कुटुम्ब के लोगों, मित्रों तथा अतिथि के देखते-देखते अकेले ही मिठाई उड़ाता है, उसे यहाँ जलते हुए अङ्गारे चबाने पड़ते हैं। पीठ पीछे बुराई करनेवाले पापी लोगों की पीठ का मांस भयंकर भेड़िये प्रतिदिन खाया करते हैं।
उपकार करने वाले लोगों के साथ कृतघ्नता करने वाले भूख से व्याकुल तथा अन्धे, बहरे और गूँगे होकर भटकते हैं। मित्रों की बुराई करने वाले तप्तकुम्भ नरक में गिराये जाते हैं। इसके बाद चक्कियों में पीसे जाते, फिर तपायी हुई बालू में भूने जाते हैं। उसके बाद कोल्हू में पेरे जाते हैं। तत्पश्चात् असिपत्र वन में यातना दी जाती है। फिर आरे से यह चीरा जाता है। तदनन्तर कालसूत्र से काटा जाता है। इसके बाद और भी बहुत-सी यातनाएँ इसे भोगनी पड़ती हैं। सुवर्ण की चोरी करने वाले, ब्रह्महत्यारे, शराबी तथा गुरुपत्नीगामी – ये चारों प्रकार के महापापी नीचे और ऊपर धधकती हुई आग के बीच में झोंक कर सब ओर से जलाये जाते हैं। इस अवस्था में उन्हें कई हजार वर्षों तक रहना पड़ता है। तदनन्तर वे मनुष्य योनि में उत्पन्न होते तथा कोढ़ एवं यक्ष्मा आदि रोगों से युक्त रहते हैं। वे मरने के बाद फिर नरक में जाते हैं और पुन: उसी प्रकार नरक से लौटने पर रोगयुक्त जन्म धारण करते हैं। इस प्रकार कल्प के अन्त तक उनके आवागमन का यह चक्र चलता रहता है। गौ की बहत्या करने वाला मनुष्य तीन जन्मों तक नीच-से-नीच नरकों में पड़ता है। अन्य सभी उपपातकों का फल भी ऐसा ही निश्चय किया गया है। नरक से निकले हुए पापी जिन-जिन पातक के कारण जिन-जिन योनियों में जन्म लेते हैं, उनका कुछ विवरण इस प्रकार है –
पतित से दान लेने पर ब्राह्मण गदहे की योनि में जाता है। पतित का यज्ञ कराने वाला द्विज नरक से लौटने पर कीड़ा होता है। अपने गुरु के साथ छल करने पर उसे कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ता है तथा गुरु की पत्नी और उनके धन को मन-ही-मन लेने की इच्छा होने पर भी उसे निस्संदेह यही दण्ड मिलता है। माता-पिता का अपमान करने वाला मनुष्य उनके प्रति कटुवचन कहने से मैना की योनि में जन्म लेता है। भाई की स्त्री का अपमान करने वाला कबूतर होता है और उसे पीड़ा देने वाला मनुष्य कछुए की योनि में जन्म लेता है। जो मालिक का अन्न तो खाता है, किंतु उसका अभीष्ट साधन नहीं करता, वह मोहाच्छन्न मनुष्य मरने के बाद वानर होता है। धरोहर हड़पने वाला मनुष्य नरक से लौटने पर कीड़ा होता है और दूसरों का दोष देखने वाला पुरुष नरक से निकलकर राक्षस होता है। विश्वासघाती मनुष्य को मछली की योनि में जन्म लेना पड़ता है। जो मनुष्य धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, कलमी धान, मूँग, गेहूँ, तीसी तथा दूसरे दूसरे अनाजों की चोरी करता है, वह नेवले के समान बड़े मुँह का चूहा होता है। परायी स्त्री के साथ सम्भोग करने से मनुष्य भयंकर भेड़िया होता है। उसके बाद क्रमशः कुत्ता, सियार, बगुला, गिद्ध, साँप, सूअर तथा कौए की योनि में जन्म लेता है।
यज्ञ, दान और विवाह में विघ्न डालने वाला तथा कन्या का दुबारा दान करने वाला पुरुष कीड़ा होता है। जो देवता पितर और ब्राह्मणों को दिये बिना ही अन्न- भोजन करता है, वह नरक से निकलने पर कौआ होता है। जो पिता के समान पूजनीय बड़े भाई का अपमान करता है, वह नरक से निकलने पर क्रौंच पक्षी की योनि में जन्म लेता है। ब्राह्मण की स्त्री के साथ सहवास करने वाला शूद्र भी कीड़े की योनि में जन्म लेता है। यदि उसने ब्राह्मणी के गर्भ से संतान उत्पन्न कर दी हो तो वह काठ के भीतर रहने वाला कीड़ा होता है। उसके बाद क्रमश: सूअर, कृमि, विष्ठा का कीड़ा और चाण्डाल होता है। जो नीच मनुष्य अकृतज्ञ एवं कृतघ्न होता है, वह नरक से निकलने पर कृमि, कीट, पतंग, बिच्छू, मछली, कौआ, कछुआ और चाण्डाल होता है। शस्त्रहीन पुरुष की हत्या करने वाला मनुष्य गदहा होता है। स्त्री और बालकों की हत्या करने वाले का कीड़े की योनि में जन्म होता है। भोजन की चोरी करने से मक्खी की योनि में जाना पड़ता है। साधारण अन्न चुराने वाला मनुष्य नरक से छूटने पर बिल्ली की योनि में जन्म लेता है। तिलचूर्णमिश्रित अन्न का अपहरण करने से मनुष्य को चूहे की योनि में जाना पड़ता है। घी चुराने वाला नेवला होता है। नमक की चोरी करने पर जलकाग की और दही चुराने पर कीड़े की योनि में जन्म होता है। दूध की चोरी करने से बगुले की योनि मिलती है। जो तेल चुराता है, वह तेल पीने वाला कीड़ा होता है। मधु चुराने वाला मनुष्य डाँस और पूआ चुराने वाला चींटी होता है। हविष्यान्न की चोरी करने वाला बिसतुइया होता है।
लोहा चुराने वाला पापात्मा कौआ होता है। काँसे का अपहरण करने से हारीत (हरियल) पक्षी की योनि मिलती है और चाँदी का बर्तन चुराने से कबूतर होना पड़ता है। सुवर्ण का पत्र चुराने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है। रेशमी वस्त्र की चोरी करने पर चकवे की योनि मिलती है तथा रेशम का कीड़ा भी होना पड़ता है। हरिण के रोएँ से बना हुआ वस्त्र, महीन वस्त्र, भेड़ और बकरी के रोएँ से बना हुआ वस्त्र तथा पाटम्बर चुराने पर तोते की योनि मिलती है। रूई का बना हुआ वस्त्र चुराने से क्रौंच और अग्नि के अपहरण से बगुला अथवा गदहा होना पड़ता है। अङ्गराग और पत्तियों का साग चुराने वाला मोर होता है। लाल वस्त्र की चोरी करने वाले को चकवे की योनि मिलती है। उत्तम सुगन्धयुक्त पदार्थों की चोरी करने पर छछूंदर और वस्त्र का अपहरण करने पर खरगोश की योनि में जाना पड़ता है। फल चुराने वाला नपुंसक और काष्ठ की चोरी करने वाला घुन होता है। फूल चुराने वाला दरिद्र और वाहन का अपहरण करने वाला पङ्गु होता है। साग चुराने वाला हारीत और पानी की चोरी करने वाला पपीहा होता है। जो भूमि का अपहरण करता है, वह अत्यन्त भयंकर रौरव आदि नरकों में जाकर वहाँ से लौटने के बाद क्रमशः तृण, झाड़ी, लता, बेल और बाँस का वृक्ष होता है । फिर थोड़ा-सा पाप शेष रहने पर वह मनुष्य की योनि में आता है। जो बैल के अण्डकोष का छेदन करता है, वह नपुंसक होता है और इसी रूप में इक्कीस जन्म बिताने के पश्चात् वह क्रमशः कृमि, कीट, पतङ्ग, पक्षी, जलचर जीव तथा मृग होता है। इसके बाद बैल का शरीर धारण करने के बाद चाण्डाल और डोम आदि घृणित योनियों में जन्म लेता है। मनुष्य-योनि में वह पङ्गु, अन्धा, बहरा, कोढ़ी, राजयक्ष्मा से पीड़ित तथा मुख, नेत्र एवं गुदा के रोगों से ग्रस्त रहता है। इतना ही नहीं, उसे मिरगी का भी रोग होता है तथा वह शूद्र की योनि में भी जन्म लेता है। गाय और सोने की चोरी करने वालों की दुर्गति का भी यही क्रम है। गुरु को दक्षिणा न देकर उनकी विद्या का अपहरण करने वाले छात्र भी इसी गति को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य किसी दूसरे की स्त्री को लाकर दूसरे को देता है, वह मूर्ख नरक की यातनाओं से छूटने पर नपुंसक होता है। जो मनुष्य अग्नि को प्रज्वलित किये बिना ही उसमें हवन करता है, वह अजीर्णता के रोग से पीड़ित एवं मन्दाग्नि की बीमारी से युक्त होता है। (मार्कण्डेय पुराण के आधार पर)
(साभार – परलोक और पुनर्जन्मांक)
