हम जिसे डिजिटल इंडिया या AI का जमाना कह रहे हैं ना, इसके पीछे की असलियत देखोगे तो सब कुछ डरावना ही डरावना नजर आएगा। इस AI वगैरह के डेटा को स्टोर करने के लिए हमें डेटा सेंटर चाहिए होते हैं। तो आपको बता दूँ कि हम बहुत जल्दी दुनिया के डेटा सेंटर कैपिटल बनने जा रहे हैं, दूसरे अमीर देशों के डेटा सेंटर्स भी हमारे यहाँ ही इंस्टॉल होने हैं।
ये ऐसे राक्षस हैं जो हमारी बिजली तो खाएँगे ही, हमारा पानी भी पी जाएंगे और बदले में देंगे ज़हरीली हवा और बंजर ज़मीन।
अमेरिका वग़ैरह में अच्छा ख़ासा विरोध होने के बाद डेटा सेंटर अब ऐसे गरीब देशों में आने हैं, और इस सबके लिए सबसे मुफ़ीद देश कौन सा है, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है, जहाँ ध्यान भटकाने के लिए बे-सिर पैर वाले मुद्दे खूब चलते हों, पब्लिक भी एक दम भेड़ जैसी हो, बिना सोचे समझे कंसीक्वेंसेज़ जाने लग पड़ती हो आई सपोर्ट, आई सपोर्ट। यही यहाँ का भविष्य है। इसे नकारो या स्वीकारो।
ये डेटा सेंटर शब्द सुनने में बड़ा फैंसी लगता है- क्लाउड, सर्वर, AI पर ज़मीन पर ये कंक्रीट के वो तपते हुए रेगिस्तान हैं जिन्हें ठंडा रखने के लिए करोड़ों लीटर पीने वाला पानी इवेपोरेट कर देते हैं। AI से 50 शब्द या एक इमेज बनाने पर लगभग आधा लीटर पानी पी जाती है। लेकिन ये AI मॉडल का 0.1% भी नहीं माना जाता। ये इंडस्ट्री हमारी सोच से भी बहुत ऊपर की बात है।
बेंगलुरु जैसे शहर में जहां लोग एक बाल्टी पानी के लिए तरस रहे हैं, वहां ये डेटा सेंटर रोज़ का 80 लाख लीटर पानी गटक रहे हैं। ये पानी लौटकर नहीं आता, ये बस मशीनों को ठंडा करने के लिए भाप बन कर हमेशा के लिए उड़ जाता है।
रही बात बिजली की तो AI कोई छोटी-मोटी चीज़ नहीं है। ये बिजली का वो भूखा भेड़िया है जो अकेले पूरे के पूरे राज्यों की बिजली अकेला पी सकता है। और हमारे यहाँ आज भी 70% बिजली कोयले से बनती है। मतलब जितना ज़्यादा डेटा, उतना ज़्यादा कोयला जलेगा। इसका सीधा असर वहाँ के आस पास वालों के फेफड़ों पर पड़ना है। लाखों नए अस्थमा के केस, फेफड़ों की बीमारियाँ और असमय मौतें, ये है वो असली कीमत जो हम इस डिजिटल प्रोग्रेस के लिए चुकाएंगे।
कोयला खदानों में काम कर रहे मजदूरों का तो आपको वैसे भी अंदाज़ा होगा ही, कि किस हालात में वो कोयला खोद रहे होते हैं, कितनी जाने असमय जा रही होती हैं, तब हमारे यहाँ तक बिजली आती है।
इन डेटा सेंटर्स को फिलहाल रोज़गार का सोर्स भी बताया जा रहा है, जिसके लिए सरकार इन्हें टैक्स में करोड़ों की छूट देती हैं, पर असलियत ये है कि इन सेंटर्स को चलाने के लिए बस मुट्ठी भर लोग चाहिए होते हैं। जो नौकरियाँ मिलती हैं, वो बस बिल्डिंग बनाने तक की होती हैं। एक बार डेटा सेंटर खड़ा हो गया, तो वो बस एक शांत हत्यारा है जो चुपचाप आपकी ज़मीन, आपका पानी और आपकी हवा को खत्म कर रहा है।
और इन कंपनियां के पास इतनी ताक़त है कि वो कितना पानी पी रही हैं, ये डेटा बताने तक को तैयार नहीं हैं, इसके लिए वो कोर्ट तक से लड़ जा रही हैं।
AI के ये डेटा सेंटर्स सिर्फ पर्यावरण ही नहीं बिगाड़ रहे, ये थर्मल पोल्यूशन भी फैला रहे हैं। जहां ये सेंटर्स होते हैं, वहां का लोकल तापमान 3-4 डिग्री तक बढ़ सकता है, जिससे वहां की बायोडायवर्सिटी पूरी तरह खत्म हो सकती है।
हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया दे रहे हैं जहां इंटरनेट तो बहुत फ़ास्ट होगा, यूट्यूब वीडियो, इंस्टाग्राम रील, फेसबुक तो मस्त चलेंगे, कुछ लोग इन पर पर्यावरण बचाने वाली क्रांति भी करेंगे ही, ऑफ़कोर्स ये तो हमारा नैतिक चरित्र भी है। लेकिन तब देश में पीने की विकट समस्या पैदा हो जाएगी, लोगों के पास पीने को साफ़ पानी नहीं होगा, सांस लेने को हवा नहीं होगी और सुकून से सोने के लिए शांति नहीं होगी।
और ये कोई भविष्य की बातें नहीं हो रहीं, ये वर्तमान में होने लग रहा है।
साभार – मनीष गोदारा जी की वाल से
#Environment
