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क्यों कहा जाता है जन्‍म से मृत्‍यु तक की गतिविधियों को लोककला?

admin 13 December 2021
Art & Culture_6
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किसी भी सभ्य समाज की संस्कृति और कला को ही साधारण भाषा में भले ही सभ्यता या संस्कृति कहा जाता है लेकिन, वास्तव में तो यह लोककला ही कही जाती है। किसी भी क्षेत्र विशेष की सभ्यता या लोककला मानव के साथ ही प्रारंभ हुई है और उसके साथ ही चलती भी आ रही है। सभ्यता, संस्कृति या लोककला धार्मिक विश्‍वासों और आस्‍थाओं के साथ ही पलती है और बड़ी भी होती है। हालांकि सभ्यता के प्रारंभ में लोककलाओं का अध्‍ययन नहीं होता था। लेकिन पिछली कुछ शताब्दियों से सभ्यता, संस्कृति और लोककलाओं पर स्‍वतंत्र विषय भी बनने लगे हैं और इसकी सीमाओं और क्षेत्रों की परिभाषाओं के संबंध में विभिन्‍न विद्वानों के मत भी सामने आने लगे।

जहां एक ओर हमारी लोककलाओं की विभिन्न प्रकार की परिभाषाओं के संबंध में विभिन्‍न विद्वानों के मत भी विभिन्न हैं वहीं उन सभी मतों का निचोड़ यदि देखा जाये तो यही निकलता है कि जनसाधारण की सहज अभिव्‍यक्ति का ही एक स्‍वरूप लोककला होती है।

लोककला को प्राचीनता और आधुनिकता के बीच की एक अहम कड़ी माना जाता है। हालांकि लोककलाओं का कोई निश्चित काल क्रमिक इतिहास सुलभ नहीं है, किंतु माना यह जाता है कि लोककलाओं का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि ग्रामीण सभ्यता का।

लोककलाओं का विकास आदिम कला से ही माना जाता है, और आदिम कला दरअसल मनुष्‍य की उस अवस्‍था की कला को माना जाता है जब मनुष्‍य घने जंगलों में रहता था और संघर्षमय जीवन व्‍यतीत करता था। विपरीत परिस्थितियों से स्‍वयं को सुरक्षित रखने के प्रयासों के स्वरूप आदि मानव पहाड़ों की गुफाओं में अपना जीवन काटता था।

आदिम काल का मनुष्य उन विषमताओं से जूझते हुए भी फूर्सत के कुछ क्षण मिलने पर अपने मन की बात या अपने हूनर को अनायास ही व्‍यक्‍त करने का प्रयत्‍न किया करता था। या फिर अपने जीवन संघर्ष के विभिन्‍न अवसरों को किसी न किसी तरह चित्रित किया या फिर उन्हें कोई आकार दिया करता था। उसकी वह कला संभवतः उसे आत्मिक शांति दिया करती थी। तभी तो वह उनमें नीत नए प्रयोग करता रहता था।

आदिम मानव के वही प्रयास धीरे-धीरे किसी न किसी माध्यम से कुछ न कुछ आकर लेते गए। उसके वही फूर्सत के कुछ क्षण परिश्रम में परिवर्तित होते गए और यह क्रिया निरन्‍तर चलती रही। आदिम मानव के वे प्रयास आदिम कला में बदल गए और उसके विभिन्न रूपों की वह विकास यात्रा आज किसी एक देश या जाति से संबंधित नहीं है, बल्कि समस्‍त मानव जाति से है।

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परम्‍परागत विश्‍वास, धारणाएं आस्‍थाऐं, रहस्‍यात्‍मक संकेत और अतीत की प्रेरणाओं के आधार ही लोककला का आधार माने जाते हैं। क्योंकि, लोककला चाहे किसी भी क्षेत्र की हो, आत्मिक शांति, मर्यादा, हर्ष एवं मंगल की भावना से ओतप्रोत होकर या प्रेरित होकर ही विकासमान होती है। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो यह है कि लोककला का उदय मूल रूप से समाज के विभिन्न रीति-रिवाजों पर आधारित होता है और परम्‍परागत रीति रिवाजों में समय के साथ-साथ होने वाले परिवर्तनों के साथ ही इसका रंग और रूप भी बदलता जाता है।

लोककला को समझने से पहले हमें अपने वेदों के माध्यम से लोक का शरल और स्पष्ट अर्थ भी जरूर समझना चाहिए। वेदों के ज्ञाताओं के अनुसार, हमारे प्राचीन भारतीय शास्‍त्रों में लोक शब्‍द का अर्थ वेद से भिन्‍न अथवा संसार से परे है। वैसे लोक का अर्थ है ‘देखना‘, और अवलोकन शब्‍द भी इसी आधार पर बना है।

सांस्कृति विचारधारा के प्रमुख उपन्यासकार और निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘‘लोक शब्‍द का अर्थ किसी भी जनपद या ग्राम से नहीं है बल्कि किसी भी नगर और अनेकों गांवों में फैली हुई वह समूची जनता से है जिनके विभिन्न आचरणों और व्‍यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियों में नहीं पाया जाता।

लोक के लिये अंग्रेजी शब्‍द ‘फोक‘ का प्रयोग किया जाता है और अंग्रेजी के शब्दकोश के अनुसार फोक का शाब्दिक अर्थ किसी समुदाय विशेष के लोगों के जीवन की पारंपरिक अभिव्यक्ति से है। या फिर सामान्य तौर पर माने जाने वाले लोग या परंपराओं का पालन करने वाले समूह के लोग होते हैं।

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तो इसका अभिप्राय यही हुआ कि सभी व्‍यक्ति लोक की किसी न किसी परम्‍परा से पूरी तरह या आंशिक रूप से, प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हुए होते हैं। लोक में भूत, भविष्‍य और वर्तमान समाहित होते हैं। जबकि कुछ विद्वानों का मानना है कि लोककला जन सामान्‍य, विशेषकर ग्रामीण जन-जीवन की सामूहिक अनुभूति की अभिव्‍यक्ति का नाम है इसलिए इसे कई विद्वानों ने कृषकों की कला के रूप में भी माना है।

लोक मनुष्‍य के कठीन प्ररिश्रम, रीतियों, रूढ़ियों, हजारों विश्‍वासों, परम्‍पराओं व्‍यवहारों और संकल्‍पों से मिलकर बनता है। लोक अनंत है, असीम है, जहां जहां तक मनुष्‍य की कल्‍पना पहुंचती है वहां-वहां तक लोक की सीमा मानी जा सकती है ।

लोक में जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की सभी गतिविधियां आ जाती है। मनुष्य पहली बार इसी लोक में आँख खोलता है, यहीं आँख बंद करता है और इस अवधि में वह कई प्रकार के अनुभवों से गुजरता भी है और उन्‍हीं अनुभवों के आधार पर जो ताना-बाना बुना जाता है वही लोक है। यानी लोक का सरल और सीधा अभिप्राय ‘सामान्‍य जीवन‘ भी है और लोक का रूढ़ अर्थ संसार भी है।

वर्तमान जीवन की लोककला भले ही आदिम लोककला से अगे निकल कर आधुनिक हो गई हो, लेकिन यह आज भी पुस्‍तकीय ज्ञान से भिन्‍न और व्‍यवहारिक ज्ञान पर आधारित ही है। क्योंकि इसमें आज भी सामान्‍य जनसमुदाय के मन की बात को ही महत्व दिया जाता है।

भले ही आज की लोककला का विकास और उत्‍पत्ति अन्‍धविश्‍वासों, धार्मिक भावनाओं, अलंकरण की प्रवृति, भय के निवारण एवं जातिगत भावनाओं की रक्षा के विचार से हुई है लेकिन, फिर भी इसमें मानव सभ्‍यता का विकास होता गया जा रहा है और लोककलाएं भी विकसित होती जा रही हैं।

– गणपत सिंह, खरगौन (मध्य प्रदेश)

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