अजय चौहान | प्राचीन युग में कुछ क्रूर या दुष्ट लोगों द्वारा दूसरों का विनाश करने के लिए तपस्या के प्रभाव से “कृत्या-पुरुष” अथवा “कृत्या-स्त्री” को तत्काल कुछ मंत्रों द्वारा उत्पन्न कर लिया जाता था। तत्काल उत्पन्न किये गये वे राक्षस पुरुष अथवा स्त्रियाँ निर्देश के अनुसार उन पुरुष के प्राणों का हरण कर लेते थे अथवा डरा देते थे जो उनके शत्रु होते थे। या फिर इसको यूँ भी कहा जा सकता है कि प्राचीन काल में ‘कृत्या’ का उपयोग मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) और आध्यात्मिक संहार के लिए एक अस्त्र की तरह होता था। यह ऊर्जा के उस विज्ञान को दर्शाता है जहाँ ध्वनि अर्थात मंत्र और संकल्प को भौतिक रूप में बदला जा सकता था। इसके अन्य उदाहरण में ज्ञात होता है कि श्रीराम को डराने के लिए मेघनाथ ने भी ठीक इसी प्रकार से मायारूपी सीता की रचना कर उसकी हत्या की थी। किन्तु ये भी कहा जाता है कि कुछ अतिसिद्ध, धर्मालु और संत प्रवृत्तियों पर ऐसी विद्या निष्फल ही रहती थी। इसी प्रकार से इस विद्या के द्वारा शत्रु का गुप्त धन भी चुराया अथवा पता लगाया जा सकता था। शास्त्रों में ऐसे ही अन्य कई प्रमाण भरे पड़े हैं।
“इंद्रविजय” नामक पुस्तक पढ़ने पर ज्ञात हुआ की “उपश्रुतिविद्या” या “रात्रि” नाम की कोई ऐसी प्राचीन विद्या है, जिसके द्वारा गुप्त, विलीन, छिपाया हुआ, किसी भी अज्ञात स्थान या प्रदेश में रखा हुआ धन अथवा किसी अपहृत अथवा किसी अन्य मनुष्य को भी बिना प्रयत्न के ही ढूंढा या प्राप्त किया जा सकता है। इसमें आकाशवाणी से, किसी शिशु की बोली से अथवा अन्य किसी कार्य में संलग्न अज्ञात मनुष्य की वाणी से या फिर अन्य किसी प्रकार से जहाँ यह खोजने योग्य धन रखा हो, उस स्थान की जानकारी प्राप्त हो जाती है। उदाहरण के तौर पर देखें तो प्राचीन ग्रंथों से हमें ज्ञात होता है की, देवराज इन्द्र ब्रह्महत्या के दोष से किसी गुप्त स्थान पर जाकर छिप गये और राजा नहुष ने इन्द्र का पद धारण कर लिया। तब इंद्रा की पत्नी शची ने इसी “उपश्रुतिविद्या” से देवराज इन्द्र को किसी तालाब में छिपा हुआ देखा अथवा उसकी जानकारी ले ली थी।
सुना तो ये भी है कि आज भी ये विद्या जीवित है, और यदि जीवित है तो इसका मतलब है की इसका प्रयोग भी हो ही रहा होगा। वैसे यहां ये भी बता दूं कि काला जादू भी कुछ-कुछ इसी श्रेणी में माना जा सकता है जिसे आजकल कई हिंदू परिवारों और खासकर हिंदू महिलाओं और बालिकाओं पर सबसे अधिक या खूब किया जा रहा है और मेरठ के एक चर्चित “नीला ड्रम हत्याकांड” को भी इसी श्रेणी में देखा जा सकता है। लेकिन इस प्रकार के जादू या कुछ टोटके थोड़े अधिक परिश्रम और समय मांगते हैं जबकि “कृत्या-पुरुष” अथवा “कृत्या-स्त्री” वाले फार्मूले या मंत्र तुरंत असरकारक होते हैं। लेकिन वे मंत्र इतने आसानी से भी सिद्ध नहीं किए जा सकते, वे मंत्र बलि और तपस्या दोनों ही मंगाते हैं। माना जाता है कि पश्चिमी सभ्यता में आज भी कुछ लोग इसकी गुप्त साधना करते हैं और शैतानी आत्माओं को प्रसन्य करने का प्रयास करते हैं।
जैसे कि आजकल आए दिन समाचार मिलते ही रहते हैं कि खासकर हिंदू परिवारों की बहु-बेटियां स्वयं ही अपवित्र होने के लिए विधर्मियों के पास चली जा रहीं हैं। कुछ महिलाएं तो अपने ही धर्मियों के साथ और कुछ तो अपने भाई, पति, पिता या अन्य आगे-संबंधियों के साथ भी प्यार और धोखा जैसे गुप्त रिश्ते बनकर उनसे दुर्व्यवहार और ब्लैकमेल का खेल कर रहीं हैं। कुछ ऐसी भी खबरें आ रहीं हैं जिनपर ज्यादा बात करने पर भी शर्म आती है। यहां तक कि अब तो ये भी हो रहा है कि कुछ भी गलत न होते हुए भी कुछ महिलाएं तलाक लेने लगीं हैं। कुछ अपने परिवारों को उत्पीड़न के नाम पर ब्लैकमेल कर रहीं हैं तो कुछ धन और शोहरत के लालच में स्वयं ही मरने-कटने को तैयार हैं। हो सकता है की इन घटनाएं में “कृत्या” मन्त्रों का प्रयोग किया जाता हो। लेकिन ये भी निश्चित है की उन मन्त्रों की ठीक से जानकारी का न होना और उनका सही उच्चारण और सही प्रयोग न हो पाने के कारण वे प्रयोग करने वाले को विपरीत फल भी देने लगते हैं। ऐसे कई उदाहरणों में हमको आये दिन कुछ तांत्रिकों की विफलता के समाचार मिलते रहते हैं जिनमें केवल हिन्दू ही नहीं अन्य धर्मी भी होते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि अन्य धर्मियों या अन्य समाज के परिवारों की महिलाएं या पुरुष ऐसा नहीं कर रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाले आंकड़े या समाचार इन दिनों सबसे अधिक हमें हिंदू समाज से ही देखने को मिल रहे हैं। वैसे तो इसको हम सब यह कह कर टाल देते हैं कि – “हे भगवान क्या जमाना आ गया है।” हालांकि यह दावा तो नहीं किया जा सकता है कि यही सत्य है या फिर ये भी नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा कौन और क्यों कर रहा है। लेकिन बहुत से लोग होंगे जो इसकी हकीकत को अच्छे से समझ पा रहे होंगे, जिसमें हो सकता है कि वही “कृत्या स्त्री” और “कृत्या पुरुष” जैसी कोई सिद्धि आती हो फिर कुछ अलग प्रकार से जैसे काला जादू या कुछ टोने-टोटके आदि के द्वारा एक विशेष समाज की महिलाओं और समाज को षडयंत्र के तहत तोड़ा जा रहा हो।
इस विषय में एक तो सबसे बड़ी समस्या ये आ रही है की आज का हिंदू समाज बहुत अधिक सेक्युलर हो चुका है जिसके कारण वह वर्तमान वास्तविकता से बहुत दूर होता जा रहा है। उसके आसपास बुरी आत्माओं और कुकृत्यों का क्या कुछ खेल चल रहा है उसको न जानकर इन सबको दकियानूसी बताकर और भी अधिक मॉडर्न बनने का नाटक करता हुआ उसको नीचा दिखाना पसंद करता है जो उसका हितैषी होता है। जबकि इसके उलट सबसे अधिक धार्मिक और इन सभी प्राचीन विद्याओं को मानने वाला, टोन-टोटके आदि के के बिना कोई निर्णय न लेने वाला आज भी यदि कोई है तो वह है हमारा विरोधी धर्म का समाज।
इन सब को यदि हम इसी प्राचीन विद्या और आधुनिक परिवेश में आंकलन करें तो पता चलता है कि अधिकतर हिंदू तो अपना मूल धर्म ही छोड़ चुके हैं और अब केवल नाम के रह गए हैं। जबकि बहुत से ऐसे हिंदू परिवार भी हैं जो सीधे इन विधर्मियों से संपर्क में रहते हैं जो स्वयं के परिवार को तो पर्दे में रखते हैं लेकिन हिंदू परिवार की स्त्रीशक्ति को स्वच्छंद जीवन का ज्ञान देते हैं। बस समस्या की जड़ यहीं से शुरू होती है। इसके अलावा दूसरा मुख्य कारण है अनियमित दिनचर्या जिसमें सबसे अधिक हिंदू परिवार ही पिसते जा रहे हैं। स्कूल, कॉलेज और कार्यालयों में काला जादू, टोटके और शहरों में बिकने वाले खान-पान में कुछ विशेष मिलावट के जरिये भी हो सकता है की वे लोग इसको एक माध्यम बना रहे हों और इसका भरपूर लाभ ले रहे हों।