अजय सिंह चौहान | पुराणों को पढ़ने से बहुत से ऐसे स्पष्ट संकेत मिलते हैं जो हैरान करने वाले होते हैं। क्योंकि पुराण वो हैं जो इतिहास हो चुका है, पुराण यानी जो पुराना है। यानी जो घट चुका है। पश्चिम इसी को “History” कहता है। यानी History शब्द भी उनका अपना शब्द नहीं है ये भी संस्कृत का ही शब्द है। उसी तरह हमारा भविष्य पुराण भी सत्य है क्योंकि पिछले चतुर्युग काल में यही सबकुछ ऐसा घट चुका है। आज भले ही हम उनको संकेत मानते हैं या मजाक समझते हैं लेकिन जो हो चुका है वही बताया जा रहा है और उन्हीं का संकेत भी दिया जा रहा है।
पश्चिम के पास पुराण नहीं हैं। केवल पाषाण है। इसीलिए वे उन पाषाणों की खुदाई करते हैं और उसको ही इतिहास मानते हैं और उन्हीं के आधार पर वे पाषाण युग, कांस्य युग और फिर लौह युगों की बात करते हैं। हमारे यहां पुराण हैं इसलिए हम राम और कृष्ण को ही नहीं आने वाले उस कल्कि को भी मानते हैं जो आज से करोड़ों वर्ष पूर्व यानी पहले भी वो आ चुके थे और फिर से चार लाख वर्षों बाद आयेंगे।
पुराणों को पढ़ने से पता चला की पुराण हमें संकेत देते हैं, चेतावनी भी देते हैं और जागरूक भी करते हैं। उन्हीं में से एक संकेत ये भी है की विष्णु जी के अब तक जीतने भी अवतार या जन्म हुए हैं वे सभी गंगा और यमुना के मध्य भाग में ही हुए हैं। जैसे कि श्रीराम और श्रीकृष्ण का जन्म। कल्कि भगवान भी इसी जघन भाग के सम्भल में आयेंगे। पुराणों में इस भाग को “जघन प्रदेश” कहा गया है। जघन शब्द का अर्थ जननांग या जाँघ से है। जबकि अन्य स्थानों पर वे जन्में नहीं बल्कि आवश्यकता के अनुसार एकाएक प्रकट हुए हैं। कल्कि का अवतार भी इसी जघन प्रदेश में और कलियुग के लगभग चार लाख वर्षों के बाद ही होगा, शेष बत्तीस हजार वर्षों तक वे सत्ता को भोगकर, म्लेच्छों को समाप्त कर देंगे और फिर सतयुग की स्थापना करेंगे और अपने बैकुंठ धाम को जायेंगे। ऐसा पुराणों में लिखा हुआ है।
जैसा कलियुगी समय और विभत्स घटनाएं आज हम देख रहे हैं ये तो अगले चार हजार वर्षों तक आम बात रहेगी। इन्हीं स्थितियों में ब्राह्मण भी किसी तरह सुरक्षित रहेगा। क्योंकि कल्कि को ब्राह्मण के घर ही तो जन्म लेना है। कलियुग का पिछला तिहास देखने से भी पक्का हो जाता है। जिसमें विक्रमादित्य का उल्लेख है। हमारे बौद्ध इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के इतिहास और उपस्थिति को इसीलिए नकारा है। लेकिन वे न केवल थे बल्कि उनका डर आज भी बना है।
कलियुग शुरू होने के बाद से लगभग दो हजार वर्षों के बाद तक जितनी भी छोटी-बड़ी विभत्स घटनाएं हुईं थीं उनका बदला लेकर और कलियुग में फिर से बदलाव करके शिवजी के अंश अवतारी सम्राट विक्रमादित्य ने जिस काल में फिर से सनातन को स्थापित करवाया था। उसी तरह से हर दो से तीन हजार वर्षों बाद छोटे-छोटे बदलाव होते रहेंगे और वैसे ही हर बार संतुलन बनते रहेंगे।
आज फिर वही समय आ गया है और फिर से किसी अंश अवतार की प्रतीक्षा का अंत होने वाला है। क्योंकि फिर से वही दो हजार वर्षों का समय बीत चुका है। यानी ये विज्ञान, बिजली और मोबाइल फिर से इतिहास बन जाएगा और हम घने जंगल और गाय को सुरक्षित देख पाएंगे। लेकिन उसके लिए अभी करीब एक सौ पचास वर्ष और इंतजार कीजिए। लेकिन इस बार कोई विक्रमादित्य नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा निर्दयी हिंदू राजा होगा जो पुष्यमित्र शुंग के ही नाम और काम वाला होगा।
हर पांच से छह हजार वर्षों के बाद यही काल की प्रक्रिया और बदलाव चलते रहेंगे। तभी तो चार लाख वर्षों तक मनुष्य और प्रकृति में इसी तरह से संतुलन बना रहे और ब्राह्मण भी किसी तरह चार लाख वर्षों तक सुरक्षित रह कर अपने ब्राह्मणत्व को बचा सकें। क्योंकि श्रीहरि विष्णु ने कल्कि के रूप में ब्राह्मण के घर ही तो जन्म लेकर आना है।
ये भी याद रखने वाली बात है की भारत भूमि और जम्बूद्वीप से बाहर यानी समुद्र लांघकर जाने पर जो भूमि आती है वहां के किसी भी भाग पर सनातन धर्म का कोई अंश कभी नहीं रहा और न ही आगे भी रहेगा। यही कारण है की हमारे चारों शंकराचार्य कभी समुद्र को नहीं लांघते। समुद्र लांघते ही वहां जाने पर मन, वाणी, विचार, भिलोजन, पानी और आत्मा सभी म्लेच्छों के अधीन और धर्मद्रोही हो जाते हैं।
हमारे जितने भी कथावाचक, साधु-संत, धार्मिक संस्थाओं के जन्मदाता लोग, या जिन्होंने भी अपने अलग-अलग मत, पंथ आदि बनाए और उनको धंधे के रूप में चलाए हुए हैं वे उनकी आड़ में क्या कहते हैं और क्या करते हैं सब सामने हैं। जितने भी नेता, अभिनेता और आम लोग भी जो विदेश जाते हैं उनका हाल और चाल भी साक्षात प्रमाण है ही। शंकराचार्य परंपरा इसीलिए सबसे कठिन है और इसको तोड़ने में दुनियाभर के म्लेच्छों को दो हजार साल लग चुके हैं फिर भी नहीं टूटी, क्योंकि वे म्लेच्छों की भूमि से दूर रहे हैं। RSS ने जिस एक व्यक्ति को अपना स्वघोषित शंकराचार्य बना रखा है वह भी एक बार विदेश जा चुका है। इसीलिए सनातनी हिंदुओं की नजर में वह एक साधारण संत बनने लाया तक नहीं है तो भला उसको शंकराचार्य कैसे मान लिया जाय।
बाकी “भविष्य मालिका” अलग है और पुराण अलग हैं। भविष्य मालिका में भविष्यवाणियां हैं। भविष्यवाणियां कुछ सटीक तो कुछ नहीं भी हो सकतीं हैं, लेकिन प्रमाण कभी झूठ नहीं होते।
#dharmwani #kalkiavtar #Bhawishymalika