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मेवाड़ के वीर योद्धा: गोरा और बादल का बलिदान

admin 17 June 2024
Gora and Badal - Warriors of Mewad Rajasthan
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अजय सिंह चौहान  | चित्तौड़गढ़ किले के इतिहास से जुड़े तमाम ऐतिहासिक प्रमाण और किस्से भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में मशहूर हैं। उन्हीं में से एक वीर गाथा जुडी है गोरा और बादल नामक दो वीर योद्धाओं से, जो शौर्य की एक ऐसी अद्भुत और तथात्मक वास्तविक ऐतिहासिक दास्तान है जिन्होंने अपनी वीरता से विदेशी आक्रान्ता अलाउद्दीन खिलजी को उसकी असली ओकात दिखाई थी। गौरा और बादल नामक उन दोनों ही शूरवीरों ने भले ही केसरिया बाना धारण कर अपना बलिदान मेवाड़ की मिटटी में दिया था लेकिन सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके उस बलिदान को आज भी याद करता है। हालाँकि, आज की पीढ़ियों में से ऐसे बहुत से लोग हैं जो आज उस गौरवगाथा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते। लेकिन मेवाड़ की मिटटी से जुड़े हर एक व्यक्ति के लिए आज भी गोरा और बादल एक आदर्श हीरो हैं।

जीवन परिचय और इतिहास:
गौरा ओर बदल दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजे थे जो जालोर के चौहान वंश से सम्बन्ध रखते थे। इसीलिए तो मेवाड़ की माटी से जुड़े मूल निवासियों के रक्त में आज भी इनकी वीरता की लालिमा झलकती है। मुहणोत नैणसी के प्रसिद्ध काव्य ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में गौरा ओर बदल नामक इन दो वीरों के बारे तथ्यात्मक विस्तृत जानकारी मिलती है।

‘मुँहणोत नैणसी री ख्यात’ राजस्थान के इतिहास से जुड़ा यह सर्वाधिक विश्वसनीय स्त्रोत है जो जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह के देश दीवान नैणसी जी द्वारा 17वीं शताब्दी में मूल राजस्थानी गद्य के रूप में लिखा गया था। इस काव्य को आधार माने तो ये दोनों योद्धा रिश्ते में चाचा और भतीजा लगते थे। इसके अलावा इनका संबंध जालौर के चौहान वंश से भी था जो रानी पद्मिनी के विवाह के बाद चितौड़ के राजा रतन सिंह के राज्य का हिस्सा बन गए थे।

Chittorgarh Fort and Gora Badal‘मुँहणोत नैणसी री ख्यात’ के अनुसार गौरा ओर बदल दोनों इतने पराक्रमी थे कि शत्रु उनके नाम से कांपते थे। उनके बारे में स्थानीय किस्से और कहानियों में कहा जाता है कि एक तरफ जहां चाचा गोरा शत्रुओं के लिए काल के सामान थे, वहीं दूसरी तरफ उनका भतीजा बादल शत्रुओं के संहार के आगे स्वयं की मृत्यु तक को शून्य समझता था। यही कारण था कि राजा रतन सिंह ने अपनी सेना की बागडोर उन्हें दे रखी थी।

खिलजी की कैद से राणा रतनसिंह को छुड़ाना –
इतिहास का वह दौर जब खिलजी की बुरी नजर मेवाड़ राज्य पर पड़ चुकी थी, लेकिन वह ये भी जानता था कि युद्ध में राजपूतों को नहीं हरा सकता था, इसलिए उसने कुटनीतिक चाल चली, जिसमें उसने मित्रता का बहाना बनाकर राजा रतनसिंह को मिलने के लिए किले से बाहर बुलाया और वहाँ धोके से उनको बंदी बना लिया और वहीं से सन्देश भिजवाया कि रावल को तभी आजाद किया जायेगा जब रानी पद्मिनी को मेरे पास भेजोगे।

इस तरह के खतरनाक धोखे और कपट भरे सन्देश के बाद मेवाड़ के समस्त राजपूत क्रोधित हो उठे। लेकिन उधर रानी पद्मिनी ने संकट की इस घडी में भी धीरज और चतुराई से काम लेने का आग्रह किया। रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ अपने अन्य सभी योद्धाओं से सलाह ली और रावल रतन सिंह को बचाने की योजना बनाई गयी। रावल रतन सिंह को बचाने का जिम्मा गोरा और बादल को दिया गया।

गोरा और बादल ने अपनी एक रणनीति तैयार की जिसके, अनुसार अलाउद्दीन खिलजी को ठीक उसी तरह जबाब दिया जाएगा जैसा अलाउद्दीन ने किया था। उस रणनीति के तहत खिलजी को सन्देश भिजवाया गया कि रानी आने को तैयार है, पर उसकी दासियाँ भी साथ आयेंगीं और जब खिलजी से सामने रानी पद्मिनी को सौंपा जायेगा तब उन पालकियों में रानी की दासियाँ और सेवक भी साथ होगीं।

खिलजी यह सुनकर आनंदित हो गया और बिना सोचे-विचारे उसने इसकी अनुमति दे दी। इसके बाद रानी पद्मिनी की पालकियां आई, पर उनमें रानी की जगह वेश बदलकर गोरा बैठा था, और दासियों के स्थान पर उन पालकियों में बादल सहित अन्य चुने हुए वीर राजपूत योद्धा थे। साथ ही डोलियों को उठाने के लिए जिन कहारों की आवश्यकता थी उनके स्थान पर भी छांटे हुए वीर सैनिको को लगा दिया गया। खिलजी के पास सूचना भिजवाई गई कि रानी पहले रावल रत्नसिंह जी से मिलेंगी। खिलजी ने बेफिक्र होकर उसकी भी अनुमति दे दी। जिसके बाद रानी की पालकी जिसमें गोरा बैठा था, रावल रत्नसिंह के तम्बू में भेजी गई।

अलाउद्दीन खिलजी पर आक्रमण-
गोरा ने रत्नसिंह को किसी तरह वहाँ से निकाला और घोड़े पर बैठाकर तुरंत रवाना कर दिया। जब तक वे लोग कुछ समझ पाते उसके पहले ही राजपूत योद्धाओं ने राजा रतनसिंह को वहाँ से सुरक्षित निकाल कर अपने दुर्ग में पंहुचा दिया। उधर पालकियों में बैठे अन्य राजपूत योद्धा भी खिलजी के सैनिकों पर टूट पड़े। राजपूतों के द्वारा किये गए इस अचानक हमले से खिलजी की सेना हक्की-बक्की रह गई।

गोरा खिलजी के तम्बू तक पहुँचा और सुल्तान को मारने ही वाला था कि डरपोक खिलजी एक महिला के पीछे जाकर छिप गया। लेकिन, गोरा एक राजपूत योद्धा था, इसलिए उसने यह सोच कर खिलजी को छोड दिया कि कहीं खिलजी को मारने के दौरान उस मासूम महिला को हानि न पहुँच जाय।

इस घटना के बाद तो हर तरफ कोहराम मच चुका था। चाचा और भतीजा यानी गोरा और बादल दुश्मनों पर काल की तरह टूट पड़े थे। लेकिन क्योंकि वे उन हज़ारों शत्रुओं के बीच अकेले ही थे इसलिए अंत में दोनों वीरों की भांति लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुवे।

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