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कन्या के नामकरण को लेकर मनुस्मृति क्या कहती है?

admin 9 May 2025
What does Manu Smriti say about the names of girls
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स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् । मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ।। 35 ।।

अर्थात – मनुस्मृति कहती है की कन्याओं का नामकरण इस प्रकार से करना चाहिए की यह नाम एकदम आसानी से और सुख-सुविधा से उच्चारण किया जा सके। और इसके लिए उसका स्वरूप और अर्थ मृदु-मधुर हो। कन्या का नाम चामुण्डा, काली, कपाली, खङ्गधारिणी तथा असुरनिकन्दिनी जैसा तो बिलकुल भी नहीं होना चाहिए। नहीं तो उसका स्वभाव भी उसी नाम का हो सकता है, लेकिन जो भी नाम रखा जाय उस नाम का अर्थ सुस्पष्ट हो, अर्थात् दूसरों को उसे समझने और उसका अर्थ निकालने में कठिनता नहीं होनी चाहिए जैसे कि सौदामिनी, प्रकामा तथा विरोचिनी आदि नाम भी सरल अर्थ वाले नाम नहीं हैं। इसलिए कन्या का नाम मनभावन और मंगल-सूचक हो, तथा उस नाम का अन्तिम स्वर दीर्घ होना चाहिए जैसे – सीता, रमा, मालती तथा वेणी आदि हों। इसके अलावा वह नाम आशीर्वादात्मक ध्वनि देने वाला जैसे कि – सुखदा, प्रकाशवती, लक्ष्मी तथा देवी आदि होना चाहिए। इसके उदाहरण के लिए हम दक्षिण भारत की सनातन परंपरा से जुड़े परिवारों में देख सकते हैं जहां के हिन्दू परिवार आज भी अपनी कन्याओं के नाम एकदम सरल और धर्म पर आधारित ही रखना पसंद करते हैं।

आजकल जो लोग या जो परिवार अपनी कन्याओं के नाम एकदम आधुनिक और शास्त्रों से उलट पश्चिनी नाम रखते हैं वे अनायास ही धर्म और आचरण को उन कन्याओं से दूर कर देते हैं। ऐसे में उन कन्याओं के स्वभाव और आचरण धीरे-धीरे स्वयं ही नकारात्मक और परिवार से या धर्म से विपरीत होते जाते हैं।

आज से करीब 30-40 वर्षों पूर्व तक भी भारत में अधिकतर हिन्दू कन्याओं के नाम शास्त्रों से जुड़े हुए और धर्म के आधार पर ही होते थे। लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे पश्चिमी सभ्यता से दूरी और अन्य कल्ट जैसे इस्कॉन, आर्य समाज, साईं बाबा, स्वामी नारायण (अक्षरधाम), आरएसएस और इनसे सम्बंधित मलेच्छ प्रवत्ती की विचारधाराओं को फैलाने वाले पश्चिमी मानसिकता के तथाकथित धर्मगुरु जो विदेशी एजेंडो पर चलते हैं और अपने अनुयाईयों को सनातन के मूल शास्त्रों से दूर कर अपनी एक नई परिभाषा को परोसकार उन्हें पश्चिमी ज्ञान परोसते हैं।

आश्चर्य और दुर्भाग्य है की इसमें आर्य समाजी और स्वामी विवेकानंद से जुड़े रामकृष्ण मिशन आदि भी बड़े स्तर पर धर्म विरोधी साबित होते जा रहे हैं। स्वामी विवेकानंद स्वयं एक फर्जी संत रहा है और गाय खाने की वकालत करता था। साथ ही वह यह भी कहता था की यदि अवसर मिलता तो मैं जिसस के चरणों को अपने रक्त से धोता। सोचिये की जब से ऐसे धर्म विरोधियों ने हमारे मूल सनातन धर्म में घुसपैठ शुरू की है तभी से नामों में भी यह कुरीति शुरू होती गई है, न की इससे पहले से यह चला आ रहा था।

– अजय चौहान

#AjayChauhan #dharmwani #liveknowledge

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