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Sacrifice of Rajputs : राजपूत योद्धाओं का सबसे अनोखा बलिदान

admin 6 March 2022
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राजपूतों की विरता और उदारता के किस्सों और ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर आज भी हमारे समस्त राजपूत वंश और राजपूत समाज के लोगों के बीच कुछ पंक्तियां है जो अपने घरों, परिवारों और बच्चों के बीच बड़े ही जोश और उत्साह से सुनी और सुनाई जाती है।

आज भले ही हमारा इतिहास क्षत्रियों की विरता और उदारता के किस्सों और ऐतिहासिक घटनाओं को काल्पनिक और मनगढ़ंत मानता हो लेकिन, सच्चाई यह है कि ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिनसे क्षत्रियों का गौरवमई इतिहास भरा पड़ा है। यहां हम ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करने जा रहे हैं जो आज से लगभग 862 साल पहले सौराष्ट्र यानी, आज के गुजरात में घटीत हुई थी।

ऐतिहासिक घटनाओं के अनुसार उस समय जब सिंध के थरपारकर क्षेत्र में, यानी जो आज पाकिस्तान का क्षेत्र कहलाता है वहां लगातार कई सालों तक तक बारिश न होने की वजह से अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। उस प्राकृतिक आपदा के कारण वहां के परमार राजा रतनसिंह के बेटे लखधीरसिंह ने फैसला किया कि अपनी प्रजा और पशुधन को बचाने के लिए उसे यह स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर शरण लेनी होगी। जिसके बाद लखधीरसिंह और उसकी प्रजा उस पशुधन के साथ पानी की खोज में सौराष्ट्र की वढवान रियासत में मुली गांव के पास आकर रुके।

उस समय वढवान रियासत के कर्ताधर्ता राजवी विशणदेव वाघेला थे। पानी की खोज में थरपारकर से विस्थापित होकर आये लखधीरसिंह ने जब राजवी विशणदेव वाघेला से यहाँ पर रुकने के लिए और अपने पशुधन के लिए घास चराने की मांग की तो उन्होंने उन्हें उनके पशुधन को चराने के साथ-साथ वहां आस-पास की जमीन उनको रहेने के लिए भी दे दी।

समय के साथ-साथ लखधीर सिंह और उनके साथ सिंध क्षेत्र से आये अन्य सभी लोग भी शांति-खुशहाली से वहां रहने लगे। उन्होंने मुली नामक इस गांव में अपने एक बड़े गढ़ का निर्माण भी कर लिया था। लेकिन, विशणदेव वाघेला की दूसरी पत्नी जो कि सायला गांव से थी वह इन परमार राजपुतों की खुशहाली देखकर बहुत इष्र्या करने लगी थी और इन परमार राजपुतों को किसी भी तरीके से सबक सिखाने और यहां से भगाने की सोचने लगी।

कहते हैं कि एक बार जब सायला गांव से उस रानी का भाई वढवान में आया हुआ था तब उसने अपने भाई के सामने उन परमार राजपूतों के बारे में कई सारी खरी-खोटी बातें बताकर उसे उन परमार राजपुतों के खिलाफ उकसाकर उन्हें सबक सिखाने के लिए भड़का दिया। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लखधीरसिंहजी और विशलदेव वाघेला के बीच संबंध बहुत मधुर थे इसलिए ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते कि परमार राजपुतों और विशणदेव वाघेला के बीच कोई कभी कोई मनमुटाव की भी स्थिति बनी हो।

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संबंध बहुत अच्छे होने की वजह से रानी का भाई भी परमार राजपुतों पर सीधा हमला करने की सोच भी नहीं सकता था। ऐसे में रानी के भाई ने उन परमार राजपुतों के खिलाफ एक योजना बनाई। उस योजना के अनुसार वह अपने साथ अपने कुछ साथियों और विशलदेव वाघेला की सेना के लगभग 500 सिपाहियों को लेकर मुली गांव के पास शिकार खेलने के बहाने गया और वहां डेरा डाल दिया।

कहते हैं कि, जब उनको कोई बड़ा शिकार नहीं मिला तो उन्होंने तीतर जाति के एक पक्षी का शिकार करने के लिए उसे तीर मारा। वह तीतर घायल अवस्था में वहां से भाग कर मुली गांव के उन परमार राजपुतों के उसी क्षेत्र में पहुंच गया।

घायल तीतर को भागते देख सभी चभाड शिकारी भी घोड़े पर चढकर उसके पीछे जाने के बहाने उन परमार राजपुतों के उस मुली गांव में घुस गए। इस घटना को लेकर एक दौहा भी है जो परमार राजूतों में बेहद प्रसिद्ध है…

जंगल तेतर उडियो, आवयो राजदुवार। चभाड सहु घोड़े चड्या बांधी उभा बार।।

कहते हैं कि तड़पता हुआ वह घायल तीतर जब इन परमार राजपुतों की सीमा में आकर गिरा गया तो उसे देखने के लिए वहां उस समय वे सभी परमार राजपुत इकट्ठा हो गये। तड़पते हुए उस तीतर को देखर लखधीर सिंह की रानी जोमबाई ने उसे हाथ में उठा लिया और कहा “डरना मत। तुम हमारी शरण में आये हो, और शरणागत की रक्षा करना हम क्षत्रियों का धर्म है।”

परमार राजपूतों का हौसला देखकर उन चभाड शिकारियों ने कहा कि “यह हमारा शिकार है, इसे हमें देदो।” लेकिन, जोमबाई ने जवाब दिया कि यह पक्षी घायल है और अब यह हमारी शरण में है और राजपूतों की शरणागत में आने वालों की रक्षा करना हर क्षत्रिय का कर्तव्य होता है, इसलिए हम वही करेंगे जो हमारा धर्म और कर्तव्य कहता है।

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इतना सुनते ही चभाड शिकारी भी योजना के अनुसार अपनी जिद पर अड़ गये और कहने लगे कि यह हमारा शिकार इसलिए इसे हमें दे दो या लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाओ।

लेकिन जोमबाई भी एक क्षत्राणी थी, उसने जवाब दिया कि “इ खांडा न खेल अमने न सिखववाना होय।” यानी हम क्षत्रियों को कभी लड़ना सिखाया नहीं जाता, बल्कि वो तो मां के पेट से ही सिख कर आते हैं।

इतना सुनते ही उन चभाड शिकारियों ने अपनी सेना को उन परमार राजपूतों पर आक्रमण का आदेश दे दिया। लड़ाई की स्थिति को देखकर जोमबाई ने अपने बेटे “मुंजाजी” से कहा कि अब तुझे मेरे दूध का कर्ज चुकाना ही होगा।

मुंजाने माता कहे, सुण सोढाना साम। दल में बल रखो और करो भलेरा काम।।

मुंजा तेतर माहरो, मांगे दुजण सार। गर्व भर्या गुजरात धणी, आपे नहीं अणवार।।

यानी अगर हम सीधे-सीधे हिंदी में बात करें तो इसका अर्थ निकलता है कि उस वीर क्षत्राणी जोमबाई ने अपने बेटे जिसका नाम मुंजाजी था उसको आदेश दिया कि सुन सोढा वंशज, यह समय भलाई करने का है, क्योंकि यह तीतर मेरे पास शरणागत बन कर आया है। आज तुझे मेरे दूध का कर्ज चुकाना ही होगा और इस पक्षी की रक्षा करने के लिए और इन दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए तुझे आगे आना ही होगा।

इसके बाद माता जोमबाई की आज्ञा सुनकर उसके पुत्र मुंजाजी ने जो जवाब दिया वह आज भी क्षत्रिय समाज के लिए एक मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। पुत्र मुंजाजी ने कहा कि…

घुड़ चडे, मेरु डगे, गम मरडे गिरनार। मरडे कयम मुलिधणी पग पाछा परमार।।

यानी अब चाहे धु्रव तारा भी भले ही अपनी जगह से क्यों न हिल जाए, या फिर मेरु या गिरनार जैसे पर्वत भी क्यों न अपनी जगह से हिल जाए, मगर अब परमार वंश का यह वंशज और मुली गांव का क्षत्रिय यानी मुणी का धनि मुंजाजी बिल्कुल भी पीछे नहीं हटेगा और अपनी माता के वचनों का पालन करेगा।

इसके बाद तो दोनों पक्षों में घमासान मच गया। वीर परमार राजपुतों ने कई चभाड शिकारियों को मार डाला। जिससे उन चभाड शिकारियों में हडकंप मच गया।

अपनी हार होती देखकर रानी के भाई ने अपने साथ आये वाघेला के सैनिकों को आदेश दिया कि मुंजाजी को घेर लिया जाय। इसके बाद उन सैनिकों ने मुंजाली को घेर लिया और उन पर वार करने लगे, जिसके कारण मुंजाजी भी सहीद हो गए। अपने राजकुमार को शहीद होते देख कर वहां मौजूद उस मुली गांव के बाकी सभी परमार राजपुत योद्धाओं ने भी उन शिकारियों पर धावा बोल दिया और देखते ही देखते वहां पर 640 लोगों की लाशें बिछा गई।

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इन 640 लोगों की लाशों में से 140 वे वीर परमार राजपुत थे जिन्होंने उस शरणागत आये पक्षी को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। जबकि बाकी के 500 वे लोग थे जो उन शिकारियों के साथ आए वे सैनिक थे जो एक योजना के अनुसार उन परमार राजपुतों को नीचा दिखाना चाहते थे और उन्हें अपने राज्य से बाहर भगाना चाहते थे। लेकिन उन 500 हथियारबंद चभाड सैनिकों को यह नहीं मालुम था कि वे कौन सी बड़ी भूल करने जा रहे हैं।

पडया चभाडह पांचसे, सोढा विशु सात। एक तेतर ने कारणे अण राखी अखियात।

एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए भले ही सोढा के 140 परमार राजपूत भी शहीद हो गये थे लेकिन, उन्होंने 500 चभाड लोगों को मारकर यह साबित कर दिया कि शरणागत में आने वाला चाहे वह कोई व्यक्ति हो या फिर पशु या पक्षी, किसी की भी रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म होता है।

कहते हैं कि अपने बहादु पुत्र मुंजाजी की चिता को जलते देख माता जोमबाई से रहा नहीं गया और उन्होंने अपने बेटे की चिता के साथ ही सती होने की ठान ली। लोगों ने जोमबाई मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं मानी और अपने पुत्र की चिता में सती हो गई।

यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि इतिहास की वह सच्ची घटना है जिसके स्मारक आज भी खड़े हैं सौरास्ट्र के मुणी गाव में। ये स्मारक इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राजपुत वंश युगो-युगों से यूं ही योद्धा नहीं माना जाता। मुली गांव में आज भी उन सभी व्यक्तियों की याद में पत्थर के 640 स्मारक मूर्तियों के रूप में देखने को मिल जाते हैं जो इस युद्ध में मारे गए थे।

इतिहासकारों ने भी लिखा है कि एक पक्षी को बचाने के लिए सैंकड़ों सोढा-परमार राजपूतों और चभाड शिकारियों की सेना के बीच हुए इस भीषण युद्ध से पता चलता है कि राजपूतों की परंपरा, प्रेम और उनकी निष्ठा हमें उन सभी जीवित प्राणियों की रक्षा और सुरक्षा को लेकर एक जैसा व्यवहार करने और उनको सुरक्षा देने की मनुष्यता और परंपरा को सिखाता है। फिर चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो या पक्षी।

– गणपत सिंह खरगौन (मध्य प्रदेश)

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