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जासूसी की प्राचीनता का महत्व और उद्देश्य

admin 19 August 2021
Detective in India
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सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही जब इस पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई और मानव जीवन अस्तित्व में आया तभी से विशेष इंद्रियों से सृष्टि ने मानव को सुशोभित किया, ताकि यह मानव सोचने, समझने, परखने और अभिव्यक्त करने में सक्षम हो सके। तभी तो प्राचीन काल से ही मानव में अपने प्रतिद्वंद्वियों और विरोधियों के बारे में विशिष्ट जानकारियां प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु प्रवृत्ति देखी जा रही है। इसी जिज्ञासा की प्रवृत्ति और लालसा के चलते आज जासूसी शब्द प्रचलन में आया है।

जासूसी या गुप्तचरी, की प्राचीनता और महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे वेदों में भी गोपनीय और गुप्तचरी जैसे शब्दों का न केवल उल्लेख मिलता है बल्कि उनका कई प्रकार से विवरण और व्याख्या भी पढ़ने को मिलती है। ऋग्वेद में तो वरुण देवता को गुप्तचरों के अधिष्ठाता के रूप में दर्शाया गया है। अर्थववेद में तो वरुण देवता को सहस्त्र नेत्र धारक कहा गया।

– किसी भी व्यक्ति से गुप्त जानकारी एकत्र करने का आसान और सीधा माध्यम था महिला आकर्षण, धन, बदला या शक्ति। इस प्रकार की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए अधिकतम गोपनीय जानकारियां साझा करने के लिए प्राचीन भारत के जासूस अन्य राज्यों के नागरिकों का खुब शोषण किया करते थे।
– आचार्य चाणक्य ने अपने गुप्त एजेंटों को विशेष लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने को प्रोत्साहित किया।
– जो अपने शासकों से असंतुष्ट होते थे या उन्हें अपमानित या निर्वासित किया जाता था चाणक्य उन्हीं की सहायता से गुप्तचरी करवाते थे।
– बलपूर्वक जिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की जाती थी या शोषण किया जाता था उन महिलाओं को गुप्तचर के रूप में इस्तमाल किया जाता था।
– जिनकी संपत्ति को जब्त कर लिया गया हो या फिर जिनको गलत या झूठे आरोपों में कैद किया जाता हो उन्हें भी गुप्तचरी के माध्यम बनाया जाता था।
– डबल-एजेंट आपरेशनः डबल एजेंट वह जासूस होते हैं जो विपक्ष के लिए भी काम करते हैं और सरकार के लिए भी। जबकि उनको नियुक्त करने वाले लोगों के प्रति निष्ठा का दिखावा करना होता है।

जासूसी का नजरिया उचित या अनुचित | espionage appropriate or inappropriate

– प्राचीन भारत में जासूसों को विशेष सम्मान, या कुछ अलग प्रकार के उपहार और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता होती थी।
– चाणक्य का मानना था कि गुप्तचरों के संदेशों में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि कई बार गुप्तचरों की सूचना उचित और विशिष्ट होने पर भी महत्वहीन हो जाती है। यदि उसके आधार पर तुरंत और सशक्त कार्रवाई न की जाये।
– गुप्तचरी की प्रसंशा में ‘‘शिशुपालवधम’’ नामक एक महाकाव्य में लिखा है जिसके अनुसार जिस प्रकार से व्याकरणविहीन भाषा प्राणहीन होती है, उसी प्रकार गुप्तचरों से रहित राजा या राजनीति निर्जीव होती है।

मौर्य काल में जासूसी तंत्र
– मौर्य साम्राज्य की एक बात, जो उसको और उस समय के साम्राज्यों से अलग बनाती है वो उसकी अभूतपूर्व गुप्तचरों का जाल जो उसके राज्य में होने वाले बाहरी आक्रमण या आंतरिक विद्रोहों के बारे में राज्य तक पूरी जानकारी पहुंचाता था। उस समय में शासन प्रणाली कैसी चल रही है, इसकी जानकारी शासक तक पहंुचाने का काम गुप्तचरों का होता था।
– सर्वप्रथम मौर्य वंश के शासन काल में ही राष्ट्रीय राजनीतिक एकता भारत में स्थापित हो पाया था। इस साम्राज्य में प्रशासन में सत्ता का मजबूत केंद्रीयकरण था। हालांकि, मौर्य काल में गणतंत्र का हरास हुआ और राजतंत्रात्मक व्यवस्था सुदृढ़ की गयी।

– अशोक सिंह, गाजियाबाद (उप्र)

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