Saturday, May 16, 2026
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देश बड़ा या धर्म?

अजय सिंह चौहान || सवाल-जवाब की एक बहस चल रही थी। उसी में किसी ने एक सवाल पूछ डाला कि – “देश बड़ा है या धर्म?” इस सवाल को लेकर बहुत लोग उलझन में पड़ गए। किसी ने देश कहा और किसी ने धर्म। किसी ने दोनों को जरुरी बताया।

एक ने कहा कि अगर आज से 7 या 8 वर्ष पहले मुझसे यह सवाल पूछा गया होता तो मैं देश बोलने में एक एक पल भी नहीं सोचता। लेकिन आज मैं ‘धर्म’ को देश से बड़ा बताने और बोलने में देर नहीं करूँगा, क्योंकि यही समय की मांग है। बहस को जारी रखते हुए उस व्यक्ति ने कहा कि, “क्योंकि जब तक आप इस देश में है, तब तक आप सुरक्षित हैं, सिर्फ तभी तक तो है ये आपका देश और आप की भूमि।”

उस व्यक्ति ने आगे कहा कि- “लेकिन, सच तो ये है कि ये देश तो तब भी रहेगा या कहलायेगा जब कोई दूसरा इस देश और इसकी भूमि पर कब्ज़ा कर लेगा और आपको यहाँ से भगा देगा। क्योंकि तब इस देश और इसकी इस भूमि पर उन आक्रमणकारियों का अधिकार हो जाएगा और हम-आप पराये हो जाएंगे। उदाहरणों में हम अखंड भारत की उस भूमि और आज के उन देशों के बात भी कर सकते हैं।”

इसका मतलब एकदम साफ है कि जब तक देश में आपका राज है, तभी तक देश आपका है। दूसरी भाषा में कहें तो जिसकी लाठी उसकी भैंस। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान, ईराक और बांग्लादेश सहित आज के करीब उन 20 देशों से जब हिन्दुओं का और हिन्दू धर्म का अंत हो गया तो वहां भूमि तो वही रही लेकिन वहाँ रहने वाले उन मूल हिन्दू निवासियों का वहां से एकदम नाश हो गया।

अर्थात देश और उसकी भूमि या फिर आप खुद को तभी बचा सकते हैं जब तक की आपके पास धर्म की शक्ति है। आपकी शक्ति आपके बदन में नहीं बल्कि आप के धर्म में, रहन-सहन में, रीती-रिवाज़ों में, दिनचर्या में, परम्पराओं में होती है। और रहन-सहन में, रीती-रिवाज़ों में, दिनचर्या में और परम्पराओं वाली यह जो शक्ति आती है वो सिर्फ और सिर्फ आप के धर्म से ही आती है।

कोई भी व्यक्ति अपने धर्म की शक्ति को किसी की भी भूमि पर प्रदर्शित कर सकते हैं। इतिहास गवाह है के वे लोग जहाँ अपने उस धर्म का शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं वह हमारी ही भूमि पर करते आ रहे हैं।

यहाँ हैरानी वाली नहीं बल्कि सोचने वाली बात है कि जिस मजहब के लोगों के पास एक भी देश नहीं था उन लोगों ने सिर्फ और सिर्फ अपने उसने उस धर्म पर अडिग रहकर ही आज 57 देश बना लिए हैं। यहाँ सवाल ये नहीं है कि उनका मजहब ख़राब है या अच्छा। लेकिन, आज हमें भी उनके उस मजहब की कट्टरता से सिखने की आवश्यकता है।

हमारे सामने सैकड़ों उदहारण हैं कि, जिसने भी अपने धर्म से ज्यादा राष्ट्रीयता को अधिक महत्त्व दिया है, उसी के हाथों से उसका वह देश और वह भूमि निकलती चली गई। न तो आज के ये सभी 57 देश उनके अपने मूल निवासियों और मूल धर्म के लोगों के पास है और न ही उनका मूल धर्म अब वहां शेष बचा है।

सनातन को बचाना है तो खुद को भी बदलना होगा

ठीक इसी तरह एक समय था कि हमारे हाथों से और हमारे ही देश से पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के रूप में देश का बड़ा भाग निकल कर अलग हो चुका है। और ये तो मात्र पिछले 75 वर्षों का ही इतिहास है, ज़्यादा पुराना भी नहीं है।

अब सवाल आता है कि आखिर ऐसा कैसे होता है या फिर ऐसा क्यों हुआ कि हमारे देश के इतने टुकड़े हुए और हम देखते ही रह गए। इसका मतलब तो ये हुआ कि अभी आने वाले समय में हमारे देश के और भी टुकड़े हो सकते हैं!

तो यहाँ जो लोग इस बात को नहीं जान पा रहे हों या फिर जानकर भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं उनके लिए बस यही कहा जा सकता है कि जो लोग सेक्युलर बन जाते हैं या सेक्युलर होने का नाटक करते हैं सबसे पहले वे ही उस भूमि पर कटते हैं और वे ही उनके शिकार सबसे अधिक होते हैं। उदाहरण हमारे सामने सैकड़ों हैं। क्योंकि हम धार्मिक कम और सेक्युलर ज्यादा होते जा रहे हैं।

क्या होता कि अगर उन लोगों को पकिस्तान और बांग्लादेश की वह भूमि देने से इंकार ही कर देते? अगर उस समय के हमारे तथाकथित “महात्मा” कहलाने वाले और कुछ महान नेता लोग अड़ जाते और अपने धर्म की भी कट्टरता दिखा देते? वर्ष 1947 के उस बंटवारे में करीब दस लाख हिन्दू सिर्फ पंद्रह दिनों में ही मार दिए गए। फिर भी आज की सरकारें उस दर्द को याद करने की बजाय अमृत महोत्सव मनाने में व्यस्त हैं।

आज का दौर भी बिलकुल नहीं बदला है। तब पाकिस्तान और बांग्लादेश को बनने दिया और अब आने वाले समय में भी हमारे कुछ राजनेता उन्हीं विचारधार के लोगों और उनके धर्म को बढ़ावा देकर देश के अंदर एकबार फिर से कैराना, कांधला, अलीगढ, मेवात, जैसे छोटे-छोटे स्थानों पर ही नहीं बल्कि कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और न जाने कितने ही टुकड़े करने के लिए उनकी सहायता कर रहे हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि हिंदुओं को आज भी अपने धर्म का ज्ञान ठीक से नहीं हो पाया है। धर्म का ज्ञान न हो पाने के कारण हिन्दुओं ने सेकुलरता को अपनाने का दुष्कर्म करना प्रारम्भ कर दिया और तभी से वे न सिर्फ कटे जा रहे हैं बल्कि, अपने देश की भूमि को भी खोते जा रहे हैं। उन लोगों के लिए तो उनका धर्म ही पहले है। जबकि हिन्दुओं के लिए धर्म नहीं बल्कि देश पहले आता है।

आज की ताज़ा स्थिति तो ये है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस समय पश्चिम बंगाल से भाग कर करीब 90 हज़ार हिन्दुओं ने आसाम में शरण ले रखी है। इसका मतलब तो ये है कि एक बार फिर से जल्द ही हम भारत देश का बँटवारा देखने वाले हैं। जहां-जहां भी हिन्दुओं ने अपनी सेकुलरता को प्रदर्शित किया है वहाँ से वह साफ़ होता गया। पश्चिम बंगाल का भी कुछ यही हाल है।

हम बहुत ही आसानी से सेक्युलरवाद का ठिकरा गांधी और नेहरू के सिर पर फोड़ देते हैं। लेकिन आज की हमारी सरकारें भी वही कार्य कर रही हैं। फिर चाहे उसे केंद्र की मोदी सरकार हो या फिर राज्यों की कोई भी दूसरी पार्टियों की सरकार हों। सभी ने सेक्युलरवाद की चादर ओढ़ ली है और भारत के बंटवारे के लिए कमर कस ली है।

एक आम हिन्दू की समस्या तो ये है कि उसे चलने वाले कालनेमियों की संख्या कोई सौ या दो सौ में नहीं, बल्कि हज़ारों में है। किस पर भरोसा किया जाय और किस पर नहीं। वर्ष 2012-13 के आंदोलन के बाद जो नाम, जो नेता, और जो पार्टी सामने आई वह आम आदमी की भले ही बनी हो लेकिन, उसमें आम जैसा कुछ भी नहीं हुआ और सबकुछ ख़ास होता रहा।

वर्ष 2019 के बाद से केंद्र में बीजेपी की मोदी सरकार के आने के बाद सोचा था की कुछ अच्छा होने वाला है लेकिन हिन्दुओं के गले कटवाने में यह सरकार सब आगे निकल गई, हैरानी की बात तो ये है कि बीजेपी को वोट देने सिर्फ हिन्दू ही हैं। इसी प्रकार से कई क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपना रंग दिखया और हिन्दुओं को सिर्फ वोट देने के लिए ही इस्तमाल किया। जबकि आर्थिक लाभ और सुरक्षा के स्टर पर हर तरफ सिर्फ उन्हीं लोगों को फायदे दिए गए जो भारत के मूल निवासी नहीं हैं।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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