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इंसान की जिंदगी में पांच सबसे बड़े दुख क्या हैं?

admin 25 December 2022
Rural Indian woman working hard in village
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ये बात तो सबको पता है कि मनुष्य के जीवन में सुख और दुख का आना-जाना एक आम बात होती है। कभी-कभी तो हमें इतनी अधिक खुशी मिलती है कि उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकते। जबकि, इसके ठीक उलट, कभी-कभी दुख भी हमारे जीवन में इतने अधिक आते हैं कि उस समय हम कुछ और सोचने या समझने के लायक नहीं रह पाते हैं। ऐसे में अक्सर यही होता है कि करीब-करीब हर एक प्रकार का बड़े से बड़ा दुख भी हमारी जिंदगी से अपने आप ही जैसे आता है वैसे ही निकल भी जाता जाता है।

लेकिन, क्या आप जानते हैं कि सुख और दुख को लेकर दुनिया के बड़े से बड़े मनोविज्ञानिकों का यही कहना है कि हर एक व्यक्ति के जीवन में सुख कम और दुख सबसे अधिक बार आते हैं और यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन में सुख से कहीं अधिक समय तक, दुख कायम रहता है। मनोविज्ञानिकों का कहना है कि कुछ दुख तो इस प्रकार के होते हैं कि वे जिंदगी भर पीछा नहीं छोड़ते।

अगर हम किसी से पूछें कि सबसे बड़ा दुख क्या है? तो सामने वाले का उत्तर वही होगा जो दुख उसने या तो अभी हाल ही के दिनों में झेला होता है या फिर वो जो उसने किसी अन्य के साथ घटित हुई किसी ऐसी घटना या दुर्घटना के बारे में सूना या देखा होता है जिसके कारण उसके पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

दरअसल, दुनिया में सबसे बड़ा दुख क्या है? इस प्रश्न को सुलझाने के लिए पूरी दुनिया के बड़े से बड़े मनोविज्ञानिक हमेशा से ही उलझन में रहे हैं। क्योंकि हर एक व्यक्ति का दुख उसकी अपनी नजर में, अपने अनुसार छोटा या बड़ा, कम या फिर ज्यादा होता है। और उसका वही दुख दुनिया में सबसे बड़ा दुख बन जाता है। इसलिए अधिकतर मनोविज्ञानी आज तक ये नहीं जान पाये हैं कि किस प्रकार के दुख को सबसे बड़ा दुख माना जाये और किसको नहीं।

जबकि, हैरानी तो इस बात पर होती है कि दुनियाभर के मनोविज्ञानियों और जानकारों में से अधिकतर इस बात पर एक मत दिखते हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा दुख अगर कोई है तो वो है स्वयं के द्वारा, स्वयं के लिए वर्तमान में या फिर अपने बीते समय में उत्पन्न की हुई कुछ ऐसी समस्यायें, जिनको की बाद में वही व्यक्ति विवश होकर झेलता है, और यही सबसे बड़ा दुख बन जाता है। हालांकि, कुछ दुख ऐसे भी होते हैं जो अनायास ही आते हैं, लेकिन, वे इतने अधिक नहीं होते हैं जो स्वयं के द्वारा, स्वयं के लिए उत्पन्न दुखों के समान भयंकर हों।

आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनियाभर के तमाम मनोविज्ञानियों और जानकारों ने ऐसी ही कुछ समस्याओं का जिक्र किया है उनमें से अधिकतर तो पहली नजर में बहुत ही साधारण या फिर आम बात लगती है। लेकिन, सच तो ये है कि कोई इस बात पर विश्वास ही नहीं करना चाहता कि आपका वर्तमान और भविष्य ऐसी समस्याओं में उलझ कर रहा जाता है।

जिन अलग-अलग समस्याओं का जिक्र करते हुए मनोविज्ञानियों ने उनकी सूची बनाई उनमें से कुछ समस्याएं तो इस इस प्रकार से हैं कि हम उनके बारे में कभी सोच भी नहीं पाते कि भविष्य में हमें उनको झेलना भी पड़ सकता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, नंबर एक पर जो समस्या है उसके अनुसार- वही इंसान सबसे अधिक दुखी वही होता है जिसको कभी भी भौतिक सुख-सुविधाओं से संतोष नहीं होता। क्योंकि ऐसा व्यक्ति लाख सुखों व विलाषिताओं से घिरा क्यों न हो उन्हें अधिक से अधिक पाने की लालसा में वह अपने को सुख और शांति से वंचित कर लेता है। और बाद में यही उसके सबसे दुख बन जाता है।

नंबर दो पर है कि- वही इंसान सबसे अधिक दुखी होता है जो खुद पर आत्मविश्वास नहीं रखता, और दूसरों के फैसलों का अधिक से अधिक समर्थन करता है।

नंबर तीन के अनुसार- एक ही बात पर ज्यादा और बार-बार सोचने वाला व्यक्ति बाद में सबसे अधिक दूखी पाया गया है।

नंबर चार कुछ इस प्रकार से है कि- दुनिया में सबसे ज्यादा दुखी वे लोग होते हैं जिनको कब्ज बना रहता है, और उनका पेट ठीक से साफ नहीं हो पाता।

नंबर पांच पर ऐसे लोग होते हैं जो कर्ज में डूबे रहते हैं। क्योंकि ऐसे लोग हमेशा जिंदगी से समझौते करते रहते हैं और दबावभरी जिंदगी गुजार देते हैं, और यही उनके लिए सबसे बड़ा दुख होता है।

इसीलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि अगर इंसान का शरीर स्वस्थ है, तो उसे सारी दुनिया आनंदमय लगती है। लेकिन अगर इंसान का शरीर स्वस्थ नहीं है, तो उसे धन-दौलत और यह पूरी दुनिया सब कुछ बेकार लगने लगती है। इसलिए दुनिया में सबसे बड़ा सुख हमारा अपना स्वस्थ शरीर ही होता है, और सबसे बड़ा दुख भी हमारे इसी बीमार शरीर के कारण ही झेलना होता है।

जिंदगी चाहे कितने भी बुरे दौर से क्यों न गुजर रही हो। हमें हर दिन सुबह ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि उसी के कारण हमारे जीवन में आने वाला हर दिन एक ऐसा समय लेकर आता है जिसे हम और आप फिर से आरंभ करते हैं और खुशी-खुशी गुजारते जाते हैं।

– अमृति देवी

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