विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर विशेष लेख
– डॉ. स्वप्निल यादव । हमारी इस पृथ्वी की उम्र लगभग 4.54 अरब वर्ष आंकी गई है। इस पर जीवन लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व सूक्ष्मजीवों के रूप में आया और हम दो पैरों पर चलने वाले मनुष्य अर्थात होमो सेपियंस लगभग 20 से 40 लाख वर्ष पूर्व आए। हमने आग पर नियंत्रण पाया, पत्थर के हथियार बनाए, जानवर पाले, एक जगह ठहरकर खेती करना शुरू किया, धातु का प्रयोग दैनिक जीवन में प्रारंभ किया, भाषाएँ गढ़ीं, पहिया बनाया, नदी किनारे सभ्यताएं विकसित की और औद्योगिक क्रांति के साथ लगातार बढ़ते क्रम में डिजिटल क्रांति तक का सफर तय कर आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से अपने कार्यों को बहुत हद तक आसान बना लिया।
भविष्य में हम मानव संवेदनाओं को समझने और उनका नियंत्रण करने में भी सक्षम हो जाएंगे परंतु अपनी इन लाखों वर्षों के विकास यात्रा में हमने सबसे ज्यादा नुकसान अपने पर्यावरण को ही पहुंचाया है। मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पेयजल संकट, शहरीकरण के लिए वनों का कटान, प्लास्टिक और कचरे के बढ़ते पहाड़, जैव विविधता का तेजी से घटना और जहरीली हवा आदि चुनौतीपूर्ण मुद्दे हैं। लड़ाई अब केवल जमीन या रोटी की नहीं बची। हवा की भी है, बढ़ते तापमान की भी है। सड़क, शहर, रेलवे लाइन, औद्योगिक ईकाई लगाने में हमारी बाधा पेड़ और जंगल बने। सहचर होने की बजाये हमने उन्हें काटना शुरु कर दिया। जरूरत लालच में बदली। टॉफी से भरे कांच के जार में से भले ही हम एक बार में मुट्ठी डालकर सारी टॉफियां ना निकालें परंतु रोज एक टॉफी भी निकालें तो एक दिन यह स्थिति जरूर आएगी कि वह जार खाली हो जाएगा।
औद्योगिक परियोजनाओं की स्थापना, खनन एवं शहरीकरण के कारण आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है और उनकी सामाजिक एकता विघटित होती है। विश्व भर में पिछले 250 वर्षों में पौधों की 571 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और अब यह दर 500 गुना से भी अधिक तेज हो चुकी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अब तक जीवित रही सभी प्रजातियों में 99% तो विलुप्त हो चुकी हैं। भारत में भी मालाबार लिली, आबनूस और असम कैटकिन की प्रजातियां खतरे की निशान पर है। विश्व में वाक्विटा प्रजाति की व्हेल अब मात्र 10 के आसपास ही बची हैं। हमारे शहरों में ही नदियों के किनारों से रेत खनन होने से कछुए, घड़ियाल, मगरमच्छ, जलीय पक्षी, मछलियां गंभीर संकट में हैं।
विश्व भर में इस समय लगभग 2.4 अरब लोग पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। आपको मालूम है कि मिडिल ईस्ट, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया के देश शुद्ध पीने के पानी की समस्या से ग्रस्त हैं, इनमें से कई देशों ने समुद्र के जल को शुद्ध करने की तकनीक विकसित कर ली है। भारत में भी भीषण गर्मियों में कई क्षेत्र जल संकट की समस्या से जूझते हैं। इसके अलावा भारी हानिकारक धातुओं की वजह से भी कई क्षेत्रों का पानी पीने योग्य नहीं बचा है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक देश के 50% जिले पीने योग्य पानी की समस्या से जूझेंगे। भारत में सिंचाई में पानी की खपत सबसे बड़ी चुनौती है।
जल संरक्षण से ज्यादा उसकी शुद्धता चुनौतीपूर्ण
भारत में अभी भी 76% भारतीयों के पास पानी की उपलब्धता के साधन उपलब्ध नहीं है। जिस तरह से प्लास्टिक ने हमारे जीवन को आसान बनाया अब वह उतनी ही खतरनाक हो चुकी है। नष्ट न होने के कारण यह कचरे के ढेर के रूप में इकठ्ठा हो चुकी है, जमीन में भी इसकी परतें बन चुकी हैं। अब तो महासागरों में भी प्लास्टिक जल जीवन के लिए खतरा बन चुकी है। प्लास्टिक का सबसे विकराल रूप माइक्रोप्लास्टिक है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। महासागरों से 90% मछलियां विलुप्त हो चुकी हैं, 33% कोरल रीफ और स्तनधारी जलीय जीव खतरे में हैं। माइक्रोप्लास्टिक हमारे फेफड़ों, खून, लिवर, किडनी और दिमाग में भी जम जाता है। यह हमारे हार्मोन और प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं।
वैश्विक एयर रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशियाई देशों की वायु सांस लेने योग्य नहीं रह गई है। एक्यूआई गुणवत्ता बहुत खराब आंकी गई है। हाल ही में दिल्ली एनसीआर का हाल हम सबने देख ही लिया। नौकरी के अलावा और कोई वजह नहीं है, जिस वजह से आप दिल्ली एनसीआर में रहें और अपने फेफड़ों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाएं। भारत में दिल्ली, कोलकाता और मुंबई अब रहने लायक नहीं रह गए हैं। वायु प्रदूषण के कारण फसलों की पैदावार में 16% तक गिरावट आती है और हर साल 6 लाख करोड डॉलर का जीडीपी का नुकसान होता है। साथ ही व्यक्तियों की कार्यक्षमता में भी कमी आती है। अपने पर्यावरण को बचाने के लिए हम संसाधनों का कम से कम उपयोग करें, दोबारा प्रयोग करना सीखें और कागज, कांच और प्लास्टिक को ज्यादा से ज्यादा रीसाइकिल करें और दैनिक आदतों में सुधार अवश्य करें। वैश्विक स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण, ग्रीन एनर्जी, वनीकरण, वन्य जीव संरक्षण पर प्रयास ही पर्यावरण को बचा पाएंगे।
– डॉ. स्वप्निल यादव (असिस्टेंट प्रोफेसर, जे एच शासकीय महाविद्यालय, बैतूल, मध्य प्रदेश)
