अजय सिंह चौहान | मानव सभ्यता की शुरुआत गाँवों और कृषि से हुई थी। हजारों वर्षों तक अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में ही रहते थे और पिछले करीब तीन सौ वर्षों तक भी सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन आधुनिक औद्योगिक क्रांति, आधुनिक अर्थव्यवस्था और रोजगार के केंद्रीकरण ने पिछले 200 वर्षों में दुनिया की जनसंख्या का स्वरूप काफी कुछ बदल चुका है। आज दुनिया तेजी से शहरी आबादी में तब्दील होती जा रही है। यह परिवर्तन आर्थिक अवसर तो लाता है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा, जल संकट, जैव विविधता और सामाजिक असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं।
दुनिया की कितनी आबादी शहरों और गाँवों में रहती है? –
संयुक्त राष्ट्र के 2025 के आंकड़ों के अनुसार शहरों में लगभग 45 प्रतिशत यानी कुछ आबादी में से लगभग 3.7 अरब लोग शहरों में रहते हैं। इसी तरह कस्बों में लगभग 36 प्रतिशत यानि जनसंख्या में से लगभग 3.0 अरब लोग ही अब ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे हैं जबकि लगभग 19 प्रतिशत यानी कुल आबादी में से मात्र 1.6 अरब लोग ही अब गांवों में रह रहे हैं। यदि इसे केवल हम देशों के आधार पर देखें तो लगभग 58 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों और 42 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। दरअसल, विभिन्न देशों में ‘शहरी’ की परिभाषा अलग-अलग होने के कारण हमें यह अंतर दिखाई देता है। वर्ष 1950 में जहां यह आबादी का लगभग 30 प्रतिशत हुआ करता था वहीं वर्ष 1980 में लगभग 39 प्रतिशत तक हो गया था। इसी तरह वर्ष 2000 ये आंकड़े बढ़कर लगभग 47 प्रतिशत होते हुए वर्ष 2025 तक लगभग 58 प्रतिशत तक होने का अनुमान है।
भारत की स्थिति –
इन आंकड़ों में यदि हम भारत की ग्रामीण और शहरी आबादी के आंकड़ों की स्थिति को देखें तो हालाँकि अभी भी भारत दुनिया के बड़े ग्रामीण देशों में से एक है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से शहरीकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। भारत से जुड़े वर्ष 2025 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण आंकड़े अब भी लगभग 62-63 प्रतिशत हैं जबकि शहरी आबादी का लगभग 37-38 प्रतिशत देखने को मिल रहा है। भारत से जुड़े ये आंकड़े इसकी लगभग 1.46 अरब आबादी के आधार पर बताये जा रहे हैं जिनमें ग्रामीण आबादी लगभग 91 करोड़ और शहरी आबादी लगभग 54 करोड़ है।
हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि भारत की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा प्रतिशत यानी लाखों लोगों को गाँव से शहरों की ओर पलायन होते देखा जा रहा है। इस हिसाब से देखा जाय तो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भी वर्ष 2050 तक भारत विश्व में शहरी आबादी की वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में रहेगा।
शहरों की ओर क्यों हो रहा है पलायन –
ग्रामीण संख्या के एक बड़े भाग को यदि शहरों की और पलायन होने के कारणों पर नजर डाली जाय तो इसमें कुछ प्रमुख कारणों में रोजगार, उद्योग, बेहतर शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, परिवहन, इंटरनेट और डिजिटल अर्थव्यवस्था, अधिक आय की संभावना आदि हैं लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह कहा जा सकता है कि गाँव खाली हो रहे हैं। पलायन के कारण खेती करने वाले लोगों की संख्या घट रही है जिसके कारण उनकी कृषि भूमि पर आवास, उद्योग और राजमार्ग यानी सड़कें आदि बन रहे हैं।
पलायन का प्रभाव पर्यावरण पर –
कृषि सहित गोचर भूमि और वनों का कम होना देश ही नहीं दुनिया के लिए भी खतरनाक साबित होता जा रहा है। भारत में हर वर्ष हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि पर हाईवे, काॅलोनियाँ, औद्योगिक क्षेत्र, माॅल, लाॅजिस्टिक पार्क का निर्माण होना इस बात का सबूत है कि भविष्य में हम अधिक समय तक स्वस्थ नहीं रह पाएंगे और अधिक लंबी आयु तक नहीं जी भी पाएंगे क्योंकि हम भविष्य तो क्या आज भी देख ही रहे हैं कि खाद्यान्न उत्पादन पर बढ़ते दबाव के कारण कृषि लागत के बढ़ने और किसानों की संख्या के घटने का ही परिणाम क्या हो रहा है।
भारत के सन्दर्भ में समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हमारे देश में पलायन ज़्यादातर ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों की ओर होता जा रहा है, इसलिए भविष्य में शहरी हिस्सों के विस्तार को हम कैसे संभाल पाएंगे? क्योंकि भारत में कोई भी सरकार या स्वयंसेवी संस्था आदि ऐसी नहीं है जो इस समस्या को समझ पा रही है। दरअसल इसके पीछे का कारण बड़े और गंभीर स्तर का भ्रष्टाचार और अनियमित नियम-कानून आदि हैं। जबकि अन्य देशों में नियम कानून बनाकर वहाँ की सरकारें अपने-अपने देशों को संभाल सकतीं हैं जबकि भारत में इस ओर कोई भी सुनने वाला या देखने वाला नहीं है।
शहरों लिए जंगलों का विनाश –
शहरों के विस्तार के लिए अधिक से अधिक सड़कें चाहिए मकान, उद्योग, बिजली और खनन भी अधिक से अधिक तथा अंधाधुंध चाहिए होता है और इसके लिए न केवल जंगल कटते हैं, बल्कि उन जंगलों में रहने वाले पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदियां-झरने और अन्य अनेक प्रकार की कीमती प्रकृति वनस्पतियों का भी विनाश होता है। यानी इसके दुष्परिणामों के तौर पर भयंकर तरीके से जैव विविधता का नुकसान होता है और वन्य जीवों का संकट होने से वर्षा चक्र में बदलाव होने से पर्यावरण गड़बड़ा जाता है।
आज सभी लोग जान चुके हैं कि ग्रामीण आबादी के तेजी से शहरी आबादी में तब्दील होने के कारण पर्यावरण असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं लेकिन इसका उपाय कोई भी जानना नहीं चाहता। कई राज्यों में गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं और कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां कि आबादी में केवल महिलाएं, बच्चे और बुर्जुग ही शेष रह गये हैं। यही कारण है कि आज भारत सहित दुनिया के अधिकतर हिस्सों में जल संकट देखा जा रहा है।
इस पलायन का सबसे प्रमुख कारण है कि गाँव के मुकाबले शहर में पानी का अत्यधिक उपभोग होता है जिसके कारण खेती में प्रयोग होने वाला अधिकतर पानी शहरों के लिए सुरक्षित रख कर गांवों और कृषि योग्य भूमि को सूखा रखा जा रहा है। केवल नहाने में ही एक बड़ा महानगर प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी खर्च कर देता है। यही कारण है कि अधिकतर शहरों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। नदियों पर उस जल आपूर्ति का दबाव अधिक होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में जल की कमी देखने को मिल रही है।
दूसरी तरफ देखें तो शहरों में बढ़ता प्रदूषण का स्तर पर्यावरण में असंतुलन पैदा कर रहा है और स्वस्थ को भी बिगाड़ रहा है। शहरीकरण के बढ़ने के साथ ही वहाँ वाहन, उद्योग, निर्माण कार्य, कंक्रीट आदि के कारण अन्य प्रकार के प्रदूषण जैसे – वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, जल प्रदूषण आदि को भी लगातार बढ़ावा दे रहे हैं।
जरा सोच कर देखिये कि यदि खेती करने वाले लोग लगातार कम होते गए तो खाद्यान्न उत्पादन कितना घट सकता है और उसका दुष्परिणाम क्या होने वाला है यानी इससे अनाजों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है, खाद्यान्न महँगा हो सकता है। हालाँकि, आधुनिक कृषि तकनीक, सिंचाई, उच्च उत्पादकता वाली फसलें और यंत्रीकरण उत्पादन बढ़ सकते हैं, इसलिए केवल ग्रामीण आबादी में कमी का अर्थ स्वतः प्रतिशत खाद्यान्न संकट नहीं माना जा रहा है लेकिन ये भी सच है कि वास्तविक स्थिति तो कृषि नीतियों, तकनीक और भूमि संरक्षण पर ही निर्भर करेगी।
आज सभी लोग जान चुके हैं कि ग्रामीण आबादी के तेजी से शहरी आबादी में तब्दील होने के कारण पर्यावरण असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं लेकिन इसका उपाय कोई भी जानना नहीं चाहता। यही कारण है कि आज भारत सहित दुनिया के अधिकतर हिस्सों में जल संकट देखा जा रहा है। इसका कारण है कि गाँव के मुकाबले शहर में पानी का अत्यधिक उपभोग होता है। केवल नहाने में ही एक बड़ा महानगर प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी खर्च कर देता है। यही कारण है कि अधिकतर शहरों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। नदियों पर उस जल आपूर्ति का दबाव अधिक होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में जल की कमी देखने को मिल रही है।
दूसरी तरफ देखें तो शहरों में बढ़ता प्रदूषण का स्तर पर्यावरण में असंतुलन पैदा कर रहा है और स्वास्थ्य को भी बिगाड़ रहा है। शहरीकरण के बढ़ने के साथ ही वहाँ वाहन, उद्योग, निर्माण कार्य, कंक्रीट आदि के कारण अन्य प्रकार के प्रदूषण जैसे – वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, जल प्रदूषण आदि को भी लगातार बढ़ावा दे रहे हैं।
जरा सोच कर देखिये कि यदि खेती करने वाले लोग लगातार कम होते गए तो खाद्यान्न उत्पादन कितना घट सकता है और उसका दुष्परिणाम क्या होने वाला है यानी इससे अनाजों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है, खाद्यान्न महँगा हो सकता है। हालाँकि, आधुनिक कृषि तकनीक, सिंचाई, उच्च उत्पादकता वाली फसलें और यंत्रीकरण उत्पादन बढ़ा सकते हैं, इसलिए केवल ग्रामीण आबादी में कमी का अर्थ स्वतः खाद्यान्न संकट नहीं माना जा रहा है लेकिन ये भी सच है कि वास्तविक स्थिति तो कृषि नीतियों, तकनीक और भूमि संरक्षण पर ही निर्भर करेगी।
चाहे मैदानी क्षेत्रों के गांव हों या पहाड़ी क्षेत्रों के। हर तरफ से ग्रामीण आबादी के शहरों की तरफ पलायन के कारण जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव पड़ने की संभावनाओं में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में कार्बन उत्सर्जन, ऊर्जा खपत, सीमेंट उपयोग, स्टील उपयोग के कारण वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी की संभावनाएं बढ़ती जा रहीं हैं। वर्तमान में भारत सहित यूरोप और सम्पूर्ण दुनिया में देखी और महसूस की जा रही है। हीट वेव, बाढ़, सूखा, समुद्र स्तर वृद्धि जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं।
शहरों की तरफ बढ़ते पलायन और अत्यधिक शहरीकरण के कारण एक अन्य और सबसे खास मानसिक और सामाजिक असंतुलन भी दिखने लगा है जिसमें शहरों में झुग्गिओं की बढ़ती संख्या, महंगे होते मकान, बढ़ती बेरोजगारी, मानसिक तनाव और अपराध में बेतहाशा बृद्धि भी प्रमुख है। यही कारन है कि आज सामाजिक असमानता की खाई गहरी होती जा रही है।
भविष्य में क्या होने वाला है –
भविष्य में यदि हम अगले मात्र वर्ष 2050 तक भी देखें तो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वर्ष 2050 तक लगभग दो-तिहाई वैश्विक आबादी शहरों और शहरी क्षेत्रों में पहुँच जायेगी जो कि बेहद चिंताजनक स्थिति हो सकती है। चिंता तो इस बात की भी है कि आबादी का यह प्रतिशत एशिया और अफ्रीका में सबसे तेज शहरी वृद्धि से हो रहा है। हालाँकि, इसका दुष्परिणाम तो अभी से दिखने भी लगा है लेकिन भविष्य में यह और भी भयानक होने वाला है क्योंकि कृषि भूमि लगातार घट रही है। भोजन महँगा होता जा रहा है। पानी के लिए संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। ऊर्जा और ईधन की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। प्रदूषण और जलवायु संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है। शहरों में भीड़ और आवास संकट अभी से देखा जाने लगा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती जा रही है। खेतों में काम करने वाली पीढ़ी नशे की आदी होने लगी है और खेतों से मुँह मोड़ रही है।
अब तक तो हमने कई सारी समस्यों की गिनती कर के दिखा दी लेकिन अब हर एक समस्या के समाधान भी मांग रही है और वो समाधान केवल सरकारें ही कर सकती हैं क्योंकि सबसे अधिक ताकत और विस्तार सरकारों का ही होता है। कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर मात्र एक, दो या एक से दो हजार पेड़ ही ऊगा सकता है जबकि सरकार चाहे तो वो पूरे देश में युद्ध स्तर पर वृक्षारोपण कर समस्य का समाधान कर सकती है। इसी तरह सरकार चाहे तो ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि सम्बन्धी रोजगार को बढ़ावा दे सकती है। आधुनिक और उन्नत कृषि को बढ़ावा देकर भूमि का संरक्षण कर सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन कर हरित क्रांति ला सकती है और ग्रामीण जीवन शैली को उन्नत बना सकती है। गाँव में भी सार्वजनिक परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा और शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार कर पलायन को रोक सकती है।
यहां यह कहा जा सकता है कि यदि बिना योजना और बिना पर्यावरणीय संतुलन के विकास का पहिया आगे बढ़ता है, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। भारत जैसे देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक विकास और शहरीकरण को बढ़ावा देते हुए कृषि, जल, जंगल और ग्रामीण समाज की स्थिरता भी बनाए रखे।
इसलिए कहा जा सकता है कि आने वाले दशकों में सफलता केवल अधिक शहर बनाने में नहीं, बल्कि संतुलित, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकास सुनिश्चित करने में ही प्राप्त हो सकती है और यही भविष्य की खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला भी होगी।
