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बीमारियों से बचना है तो मोटा खाने और मोटा पहनने वाली जीवनशैली अपनानी ही पड़ेगी…

admin 13 June 2021
Bajra Grain
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वैश्विक महामारी कोरोना से पूरी दुनिया इस कदर परेशान है कि उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि इससे कैसे निपटे? कोरोना महामारी के इलाज, उत्पत्ति एवं अन्य तमाम मामलों में वैज्ञानिकों ने अभी तक जितनी भी घोषणाएं की हैं, अधिकांश फेल ही हुई हैं। कोरोना के इलाज में अभी तक जितने भी प्रोटोकाल आये हैं वे लगातार बदल रहे हैं। कभी कहा गया कि यह प्राकृतिक है तो कभी इसके बारे में आशंका व्यक्त की जाती है कि यह मानव निर्मित है।

पूरी दुनिया इसकी उत्पत्ति के कारणों से वाकिफ होना चाहती है क्योंकि कभी यह भी कह दिया जाता है कि हवा से फैलता है तो कभी यह भी कह दिया जाता है कि इसके वाइरस पानी में भी हैं किन्तु एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि कोरोना वाइरस हवा एवं पानी से फैलने लगे तो शायद ही कोई जीव-जन्तु बचे, जो इससे प्रभावित न हो। कोरोना के इलाज एवं बचाव की बात की जाये तो व्यापक स्तर पर आज भी सनातन जीवनशैली कारगर साबित हो रही है यानी हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों, गुरुओं ने एक लंबे अनुभव के बाद जो जीवनशैली विकसित की है, आपदाकाल में वही सहारा बन रही है।

आज संपूर्ण विश्व पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति एवं जीवनशैली की तरफ बहुत तेजी से आकर्षित हो रहा है किन्तु लोगों को यह समझने की आवश्यकता है कि जिस जीवनशैली की भारत सहित पूरी दुनिया दीवानी हो रही है, वह पाश्चात्य जगत बहुत तेजी से भारतीय सनातन जीवनशैली की तरफ अग्रसर हो रहा है।

कोरोना से बचाव के लिए मास्क, साफ-सफाई, शारीरिक दूरी, हाथ मिलाने की बजाय अब नमस्कार एवं अन्य जो भी उपाय पूरी दुनिया में किये जा रहे हैं वह सब हमारी सनातन जीवनशैली में अनादिकाल से ही विद्यमान हैं। इसकी विधिवत व्याख्या हमारे वेदों एवं पुराणों में है। वैश्विक महामारी कोरोना की बात यदि छोड़ भी दी जाये तो पूरे विश्व में आये दिन नई-नई बीमारियां आ रही हैं और मानव जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही हैं जिन्हें दवाइयों की बदौलत नियंत्रण में तो रखा जा सकता है किन्तु जड़ से मिटाया नहीं जा सकता। यदि इन्हें जड़ से मिटाना है तो सनातन जीवनशैली को प्राथमिकता देनी ही होगी।

अभी तक तो लोग नियमित रूप से घर पर या डाॅक्टर के पास जाकर बी.पी. एवं शुगर चेक करते एवं करवाते ही थे, अब भविष्य में बी.पी. एवं शुगर की तरह आक्सीजन लेबल भी नापते रहना होगा। अब यह सब हम सभी के जीवन का हिस्सा बन चुका है। यह भी अपने आप में सत्य है कि पीठ पर आक्सीजन का सिलेंडर बांधकर एवं वैक्सीन की डोज लेकर अल्पकाल के लिए राहत तो पाई जा सकती है किन्तु लंबे समय यानी आजीवन स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न रहने के लिए सनातन जीवनशैली को अपनाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।

आज अमेरिका जैसे विकसित देश में बहुत ही व्यापक स्तर पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि यदि बीमारियों से बचना है तो मोटा अनाज खाना होगा, सेंधा नमक का प्रयोग करना होगा, चीनी के बजाय शक्कर को लेना होगा, गाय का दूध लेना होगा, रिफाइंड तेलों को छोड़ना होगा। यदि इन चीजों को अमल में न लाया गया तो बीमारियों से बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा। इन बातों की चर्चा वहां हो रही है जहां की मेडिकल व्यवस्था बहुत विकसित मानी जा रही है।

पुस्तक के लेखक डाॅ. डेविस का कहना है कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया को यदि मोटापे, डायबिटीज और हृदय रोगों से मुक्ति चाहिए तो उन्हें पुराने भारतीयों की तरह मक्का, बाजरा, जौ, चना, ज्वार, कोदरा, रागी, सावां और कांगनी ही खाना चाहिए यानी गेहूं से परहेज करना चाहिए। इस संबंध में यदि भारत की बात की जाये तो यहां का हाल यह है कि 1980 के बाद से लगातार सुबह-शाम लोग गेहूं खाकर मात्र 40 वर्षों में ही मोटापे और डायबिटीज के मामले में दुनिया में सबसे आगे निकल चुके हैं। सिर्फ आगे ही नहीं निकल चुके हैं बल्कि भारत आज मोटापे और डायबिटीज के मामले में पूरे विश्व की राजधानी बन चुका है।

गेहूं की यदि बात की जाये तो वैसे भी यह भारत की मूल फसल नहीं है। मूलतः यह मध्य एशिया और अमेरिकी फसल मानी जाती है। भारत में गेहूं आने से पहले जौ की रोटी बहुत लोकप्रिय थी और मौसम के मुताबिक मक्का, बाजरा, ज्वार आदि का प्रयोग किया जाता था। भारतीयों के मांगलिक कार्यों में भी यज्ञवेदी या मंदिरों में जौ अथवा चावल (अक्षत) ही चढ़ाये जाते रहे हैं। प्राचीन गं्थों में भी अधिकांश जगहों पर इन्हीं अनाजों का उल्लेख है। ब्रह्मपुरी (जयपुर) निवासी प्रशासनिक अधिकारी नृसिंह जी की बहन विजयकांता भट्ट जी का कहना है कि 1975-80 तक आम भारतीय घरों में बेजड़ यानी मिक्स अनाज की या जौ की रोटी का प्रचलन था जो धीरे-धीरे समाप्त हो गया। 1980 के पहले आमतौर पर घरों में गेहूं की रोटी तभी बनती थी जब कोई रिश्तेदार आता था अन्यथा रोटी के लिए मुख्य अनाज जौ ही चलन में था।

भारतीय समाज में पुराने समय में यदि कोई मोटा हो जाता था तो लोगों के लिए बहुत ही आश्चर्य की बात हुआ करती थी किन्तु आज भारत में एक आंकड़े के मुताबिक 77 प्रतिशत से अधिक लोग ओवरवेट यानी मोटे हैं। हमारे बुजुर्ग आज भी हमें बताते हैं कि वे कितनी मेहनत करते थे, कितना पैदल चलते थे और बीमारी तो उनके पास आने का नाम ही नहीं लेती थी।

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जाहिर-सी बात है कि उसका यही कारण था कि मोटा खाने, मोटा पहनने एवं मोटे तौर-तरीकों वाली जीवनशैली को अपनाना। आज के आधुनिक युग में सभी सुख-सुविधाओं से संपन्न लोग कुपोषित नजर आते हैं और तीस वर्ष से अधिक उम्र का प्रत्येक दूसरा भारतीय अपनी तोंद घटाने के लिए प्रयासरत है।

दरअसल, मोटे अनाज को बनाने या पकाने में थोड़ा वक्त लगता है किन्तु अब गेहूं के आटे की बात की जाये तो उसकी रोटी आसानी से बन एवं पक भले ही जाती है किन्तु उतनी आसानी से पचती नहीं है परंतु वह समय आ गया है कि हमें अपने भोजन में 80-90 प्रतिशत मोटे अनाज को शामिल करना ही होगा। गेहूं का प्रयोग यदि 10-20 प्रतिशत भी कर लिया जाये तो पर्याप्त है। वैसे भी देखा जाये तो कोरोनाकाल की दोनों लहरों में अधिकांश ऐसे लोगों को ही जान गंवानी पड़ी है जो बी.पी., शुगर, हृदय या अन्य किसी गंभीर बीमारी से पहले से ग्रस्त थे। भारत में गेहूं आने के बाद मात्र 40 वर्षों में यदि यह हाल हो गया है तो भविष्य में क्या होगा? इस बात पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, अन्यथा भविष्य का भारत कैसा होगा, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है?

कुल मिलाकर मेरे कहने का आशय यही है कि जिन चीजों का उपयोग करके पहले लोग स्वस्थ रहते थे, उन चीजों का ही प्रयोग करना होगा।

अब तो एलोपैथ के डाॅक्टर भी यह कहने लगे हैं कि सफेद नमक की जगह सेंधा नमक, चीनी की जगह शक्कर का प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। सिर्फ मोटा खाना, मोटा पहनना ही नहीं बल्कि हमारी जीवनशैली में पीतल, तांबे एवं फूल यानी कांसे के मोटे बर्तन भी प्रचलन में थे। इन मोटे बर्तनों के स्वास्थ्य के लिए क्या लाभ हैं, इसकी विस्तृत रूप से व्याख्या हो सकती है किन्तु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वजों ने इन मोटे बर्तनों का इस्तेमाल यूं ही नहीं किया होगा।

पुराने खयालात वाले लोग आज भी मोटे बर्तनों का ही प्रयोग करना पसंद करते हैं तभी तो शादी-ब्याह में उपहार के तौर पर इन्हीं मोटे बर्तनों को देने की परंपरा प्रचलन में रही है। मिट्टी की मोटी दीवारों वाले खपड़ैल एवं लकड़ी से बने मकानों एवं छप्परों में जो शुकून लोगों को बिना ऐसी, कूलर एवं पंखों के मिलता था, क्या वह लोगों को अब नसीब हो रहा है? यदि इन सभी बातों को छोड़ दिया तो भी मोटी जीवनशैली को अपनाने के लिए मिट्टी का घड़ा ही प्रेरित करने के लिए पर्याप्त है क्योंकि घड़े का पानी भीषण गर्मी में भी यदि ठंडा रहता है तो क्या वह बिजली एवं अन्य किसी आधुनिक संसाधन की बदौलत है?

मिट्टी में लोटकर, नंगे पैर जमीन एवं घास पर चलकर, तालाबों में तैरकर, कुओं, तालाबों एवं झरनों का पानी पीकर, गाय-भैंस का कच्चा दूध पीकर, धूप-गर्मी एवं बरसात में घूमकर बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता जितनी अधिक मजबूत हो जाती थी, क्या आज मेडिकल साइंस बिना किसी खर्च के वहां तक पहुंच सकता है?

आज हम अपने घरों में बैक्टीरिया को मारने के लिए तमाम तरह की दवाओं का उपयोग करते हैं। क्या आज की प्रतिरोधी दवाएं पुराने समय में घरों की गोबर से लिपाई एवं दीवारों की मिट्टी से पुताई से ज्यादा प्रतिरोधक हैं? इसी प्रकार हवन, आरती, दीप जलाना एवं अन्य बातें बैक्टीरिया को समाप्त करने एवं शुद्धीकरण के लिए ही हैं। ये बातें हमारे वेदों एवं पुराणों में निहित हैं।

यदि इन बातों का विश्लेषण किया जाये तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वर्तमान दौर ज्ञान एवं विज्ञान में चाहे जितना भी आगे निकल गया हो किन्तु पुराने समय में मोटे तौर-तरीकों पर आधारित जिया जाने वाला जीवन ज्यादा समृद्ध एवं वैभवशाली था, क्योंकि उसमें खर्च नहीं के बराबर था किन्तु आज जिनके पास सुख-सुविधाओं के सभी संसाधन उपलब्ध हैं वे भी अपने को स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न बताने की स्थिति में नहीं हैं।

बच्चों के लिए मां का दूध, गाय एवं भैंस का दूध, देसी घी, गुड़-शक्कर, गन्ने का रस, मौसमी फलों एवं सब्जियों का क्या कोई विकल्प हो सकता है? यह सब लिखने के पीछे मेरा आशय मात्र इतना ही है कि यदि हमें तमाम बीमारियों से बचना है तो मोटा खाने, मोटा पहनने से लेकर मोटे तौर-तरीकों को अपने जीवन में अपनाना ही पड़ेगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं है। हालांकि, जो भी लोग उत्तम स्वास्थ्य के रहस्य को जान एवं समझ गये हैं वे उस तरफ लौटने की कोशिश तो कर रहे हैं किन्तु भौतिकवादी दौर में व्यावसायिक मानसिकता वैश्विक स्तर पर इस कदर हावी हो चुकी है कि ‘येन-केन-प्रकारेण’ सभी सामानों की बिक्री करने में लगी है। इस कार्य के लिए उसे भले ही मिलावट करना पड़े किन्तु अपने समाज में एक बहुत ही प्राचीन कहावत प्रचलित है कि ‘बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी’? इस बात का आशय यह है कि व्यावसायिक मानसिकता को वास्तविकता के आगे कभी न कभी तो झुकना ही पड़ेगा और यहीं से लोगों में अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने की शुरुआत होगी और परीक्षा भी।

– अरूण कुमार जैन (इंजीनियर) – (राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य- भाजपा, पूर्व ट्रस्टी श्रीराम-जन्मभूमि न्यास एवं पूर्व केन्द्रीय कार्यालय सचिव भा.ज.पा.)

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