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उत्तराखंड की युवा पीढ़ी का सपना और मुस्लिम आबादी का अपना

admin 14 September 2021
Uttarakhand Barkot
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उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और असम जैसे तमाम राज्यों की तर्ज पर अब उत्तराखंड में भी अनियंत्रित मुस्लिम आबादी और उससे जुड़े धार्मिक स्थलों का अवैध रूप से कब्जा शुरू हो चुका है। स्थानीय समाजसेवियों और सैकड़ों-हजारों वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी रह रहे मूल निवासियों के अनुसार उनके प्रदेश में भी मुस्लिम आबादी का एकाएक उदय हो जाना और फिर उनके धार्मिक स्थलों का अवैध रूप से उग आना, आसपास के क्षेत्रों में अपराधिक गतिविधियों का एकाएक बढ़ जाना, स्थानीय लोगों और वहां की परंपरागत संस्कृति और जीवनशैली के लिए न सिर्फ समस्या बल्कि भविष्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।

दरअसल, उत्तराखंड की इस दर्दभरी आवाज को उठाने का प्रयास तो किया जा रहा है आरएसएस से संबंधित संगठनों के नाम पर, लेकिन, इसके पीछे का सच तो यह है कि स्थानीय स्तर पर समस्त उत्तराखण्डवासियों को अब लगने लगा है कि प्रदेश के जिन लोगों ने अपने धार्मिक और सांस्कृतिक होने का दिखावा करते हुए अतीत में भाईचारे का फर्ज निभाया था आज यह स्थिति उन्हीं लोगों के कारण उत्पन्न हो रही है।

जिस प्रकार से प्रदेश की पिछली कांग्रेस सरकार ने यहां की मुस्लिम आबादी को संरक्षण देकर फलने-फुलने का अवसर देकर अपने वोटबैंक को मजबूत किया था उसके बाद से तो यहां न सिर्फ प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में बल्कि अब तो दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों में भी मुस्लिम आबादी ने अपने पांव जमाने प्रारंभ कर दिये हैं और न सिर्फ पांव जमाने बल्कि अवैध मजारों का भी निर्माण होने लगा है।

भले ही आज यहां भाजपा की सरकार है लेकिन, बावजूद इसके यहां जिहादियों को शरण देने वालों की कोई कमी नहीं है। चाहे फिर वह सत्तारूढ़ सरकार हो या फिर पिछली सरकार के सैक्युलरवादी गैंग के नेता। सच है कि पिछले कुछ सालों में यहां किसी न किसी प्रकार से इसी मुस्लिम आबादी को मानवता और भाईचारे के दिखावे के तौर पर कंधे से कंधा मिलाते हुए भी देखा जा रहा था।

अब जब एक बार फिर से उत्तराखंड राज्य में विधानसभा चुनावों का समय आता जा रहा है तो विपक्षी पार्टियां अपने उसी वोटबैंक को लुभाने के वायदे करती दिख रही है। सैक्युलरवादी गैंग की तरफ से एक बार फिर प्रदेश की मुस्लिम आबादी को संरक्षण और फलने-फुलने का अवसर देकर अपने वोटबैंक को मजबूत करने के तमाम वायदे करने की राह पर चल पड़े हैं।

आरएसएस से संबंधित तमाम संगठनों और समाजसेवियों ने उत्तराखण्ड के सत्तारूढ़ बीजेपी पदाधिकारियों और सरकार में शामिल माननियों के सामने तमाम उदाहण और आंकड़े रखते हुए भविष्य की ओर इशारा करते हुए दावा किया कि हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे कई जिलों में पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी है, और जैसे-जैसे इन क्षेत्रों में इनकी आबादी बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे इन इलाकों में इनसे जुड़े धार्मिक स्थलों का अवैध रूप से उगना भी प्रारंभ हो चुका है। सत्तारूढ़ सरकार को चाहिए कि जितना जल्द हो सके इन धार्मिक स्थलों की पहचान की जानी चाहिए और ऐक्शन भी लिया जाना चाहिए।

दरअसल, खबरें आ रही हैं कि आसएसएस की विचारधारा से जुड़े तमाम संगठनों और लोगों ने आवाज उठानी शुरू कर दी है कि एक संप्रदाय विशेष हमारे प्रदेश के भौगोलिक स्तर पर संतुलन को न सिर्फ बिगाड़ रहा है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से भी कमजोर करने में लगा हुआ है। प्रदेश के अधिकतर युवा मानते हैं कि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार खुद भी इन्हें विशेष संरक्षण और लाभ देकर उन्हें प्रोत्साहित करती जा रही है जिसके कारण सरकार के प्रति अब खासतौर पर युवाओं का आक्रोश न सिर्फ इस समुदाय के प्रति बल्कि सत्तारूढ़ सरकार के प्रति भी देखा जा सकता है।

भले ही तमाम संगठनों और समाजसेवी लोगों ने इस विषय पर सत्तारूढ़ बीजेपी पदाधिकारियों और सरकार में शामिल माननियों को अपने आक्रोश और चिंता से अवगत करा दिया है लेकिन, बावजूद इसके, फिलहाल इन संगठनों को ऐसा कोई ठोस उत्तर या संकेत सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार की तरफ से अभी तक नहीं मिला है जिससे कि यह माना जा सके कि यहां के परंपरागत निवासियों के रोजगार और उनकी संस्कृति को बचाने लिए भी सत्तारूढ़ सरकार कुछ विशेष करने वाली है।

उत्तराखण्ड के हर चैराहे और हर घर में अब यही बहस छिड़ गई है कि काश हमारे प्रदेश को भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जैसा कोई मुख्यमंत्री मिल जाये जो न सिर्फ यहां अराजकता वाली विशेष राजनीति को समाप्त कर दे बल्कि हमारे तमाम मंदिर स्थलों को भी सरकार के शिकंजे से मुक्त कर एक नई व्यवस्था को जन्म दे सके और जनसंख्या नियंत्रण नीति लेकर भी आ सके ताकि इन अराजक त्तवों पर अंकुश लागाया जा सके।

प्रदेश से आ रही तमाम खबरों के अनुसार सत्तारूढ़ बीजेपी पदाधिकारियों के सामने आंकड़े पेश करते हुए समाजसेवियों ने उदाहरण भी दिये कि नारायण कोटी, गुप्तकाशी, ह्यून, देव शाल जैसे कई गांव के लोगों ने अब धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय का पूरी तरह से बहिष्कार करना शुरू कर दिया है।

राज्य के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश उनियाल ने तो यहां तक कह दिया है कि उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी का बेतहाशा बढ़ना हिंदुत्व के लिए उसी प्रकार से खतरा बन चुका है जैसे आज हम कश्मीर में देख रहे हैं। आज कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्यक हो चुके हैं और अपनी हर बात को मनवाते हैं, फिर चाहे वहां किसी भी पार्टी की सरकार हो।

दिनेश उनियाल जी ने कहा है कि कश्मीर और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से सबक सिखते हुए हम सब केदारघाटी में स्थानीय स्तर पर पूर्णरूप से इन लोगों का बहिष्कार करेंगे और यहां के गांवों में अब ऐसे लोगों को भूमि बेचना या मकान बेचना एक प्रकार से पाप की श्रेणी में माना जाएगा। वक्त की नजाकत और उस समुदाय की गतिविधियों को देखते हुए स्थानीय लोग भी अब हमारी बात को शत-प्रतिशत मान रहे हैं और न सिर्फ अमल कर रहे हैं बल्कि अन्य लोगों को भी इसके लिए जागरूक कर रहे हैं।

एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता जीतेन्द्र सिंह के अनुसार ये लोग अपने षड्यंत्र के अनुसार यहां आकर फेरी, फल-सब्जी, कबाड़ी, नाई, बढ़ई, मकान-मजदूरी जैसे कई प्रकार के धंधे करते हैं और पहाड़ों पर रहने वाले दूर-दराज के क्षेत्रों के सीधे-सरल और गरीब हिंदुओं का विश्वास जीतते जा रहे हैं, उनके साथ घूल-मिल कर रहने का नाटक कर रहे हैं और उन्हीं के घरों में घूसकर उनकी बहन-बेटियों के साथ ‘लव जिहाद’ जैसी वारदातों को अंजाम देकर सनातन धर्म के खिलाफ बहुत बड़ा षड्यंत्र रच रहे हैं।

प्रदेश के वर्तमान हालातों को देखते हुए अगर प्रशासन ने जल्द ही कोई निर्णय नहीं लिया तो उत्तरखण्ड को भी कश्मीर बनने में अधिक समय नहीं लगेगा, क्योंकि यहां भी पिछले कुछ वर्षों से मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ती जा रही है। हालांकि, राज्य के कुछ गांवों में सामाजिक संगठन और स्थानीय निवासी अपने स्तर पर इस कोशिश में लगे हैं कि पहाड़ों से हो रहे युवा पीढ़ी के पलायन को रोका जा सके और उन्हें दैनिक मजदूरी के परंपरागत कामों के लिए प्रक्षिशित किया जाए ताकि, वे यहां अपनी मिट्टी और जड़ों से जुड़े रह कर न सिर्फ अपने परिवार को बल्कि अपने समाज और अपनी संस्कृति को भी बचा सके।

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इन संगठनों ने यह सुझाव सत्तारूढ़ बीजेपी पदाधिकारियों के साथ हालिया बैठक में दिया और कहा कि प्रदेश सरकार असम, यूपी और मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी जनसंख्या नियंत्रण नीति लेकर आए, ताकि “भौगोलिक स्तर पर न सिर्फ संतुलन” बना रहे बल्कि हम खुद भी सुरक्षित रह सके। संगठनों ने यह भी दावा किया कि देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल में पिछले कुछ सालों में न सिर्फ मुस्लिम आबादी बहुत अधिक संख्या में बढ़ चुकी है बल्कि इन इलाकों में इनसे जुड़े धार्मिक स्थलों का अवैध रूप से विकास भी हुआ है। जबकि इनकी पहचान कर जरूरी ऐक्शन लिया जाना चाहिए लेकिन, सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार खुद ही इसमें आनाकानी करती दिख रही है।

खबरों के अनुसार उत्तराखंड के चार मैदानी जिले ऐसे हैं जिनमें मुस्लिम आबादी का प्रतिशत पिछले 20 वर्षों में 15 से बढ़ कर 35 हो चुका है। जबकि चैंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि अब तो कई पहाड़ी जिलों में भी न सिर्फ मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही है बल्कि कई प्रकार के अपराध, हत्या, बलात्कार और लव जिलाद जैसे आंकड़ों में भी वृद्धी होती जा रही है।

जहां एक ओर उत्तराखंड के कई युवा मानते हैं कि भाजपा भी अब धीरे-धीरे सैक्युलरवाद की औढ़नी में अपना मुंह छूपा कर बैठती जा रही है वहीं प्रदेश के बाहर जाकर अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे उत्तराखंड के युवा भी अब सोशल मीडिया के माध्यम से अपना गुस्सा प्रकट करते हुए सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार को इस बात के लिए कोस रहे हैं कि वोट बटोरने के नाम पर वर्तमान सरकार ने उन्हें बेवकूफ बनाया है।

आज भले ही रोजी-रोटी के लिए उत्तराखंड की युवा पीढ़ी देश और दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रही है लेकिन, सोशल मीडिया के माध्यम से आज भी वह अपनी मिट्टी और जड़ों से जुड़ कर सनातन संस्कृति को ही सब कुछ मानती है। इसी प्रकार देश और प्रदेश के तमाम राज्यों की सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार के प्रति जो रोश तमाम युवाओं में देखा जा सकता है वह सिर्फ और सिर्फ बीजेपी के सैक्युलरवाद के विरूद्ध ही नजर आता है।

जहां एक ओर तमाम सनातनी युवा मानते हैं कि, क्योंकि वर्तमान राजनीति में भाजपा ही उनके लिए एकमात्र विकल्प बचा हुआ है इसलिए भी भाजपा हमें खूंटे से बंधा हुआ वोटर समझ कर हमें आंखें दिखा रही है। जबकि हमने तो यही मान कर भाजपा को वोट दिया था कि यदि प्रदेश में ही नहीं बल्कि केन्द्र में भी हमारे विचारों और आवाज को सुनने और समझने वाली भाजपा सरकार आ जायेगी तो हम अपने देश, प्रदेश और धर्म और संस्कृति सहीत अपनी आस्था और धर्मस्थलों को भविष्य के लिए सुरक्षित देख सकेंगे, लेकिन, अब वो भी एक सपना ही लग रहा है।

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