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श्रीकृष्ण ने लड़े थे सबसे भयंकर तीन युद्ध

admin 14 December 2021
Sri Krishna Bhagwan
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जिस प्रकार से हमारे विभिन्न वैदिक और साहित्य धर्म ग्रंथों में श्रीकृष्ण से संबंधित बहुत-सी रोचक और तथ्यात्मक जानकारियां उनके अस्तित्व और प्रमाण के साथ मिलती हैं, उसी प्रकार से अन्य धर्म ग्रन्थ भी उनके धरती पर जन्म लेने के तथ्य की पुष्ट करते हैं। संसार को श्रीमद्भागवत गीता जैसा ग्रन्थ देने वाले कर्मयोगी श्रीकृष्ण केवल हिन्दुओं के ही आस्था के केंद्र नहीं है, बल्कि दुनिया के कोने-कोने में उनमें परम विश्वास रखने वाले लोग रहते हैं।

दुनिया के कई हिस्सों से लोग भारत की धरती पर श्रीकृष्ण की कर्मभूमि को देखने और उनके लीलास्थलों को महसूस करने और उनसे संबंधित विन्नि प्रकार के संदेशों और रोचक तथ्यों को साक्षात जानने के लिए आते हैं। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में जो कुछ भी कहा, उनका हर शब्द आज लगभग पांच हजार सालों के बाद भी अक्षरशः चरितार्थ होता है।

देवों में सबसे सुंदरतम देव श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी कई बातें आज भी एक आम इंसान के लिए अनजानी और रहस्यमयी है।

आईए आज हम भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े ऐसे ही कुछ रोचक ऐसे तथ्यों के बारे में जानें जो एक आम व्यक्ति की सोच से परे हैं।

–  भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की ऐसी वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बड़ा संदेश थी, आज भी है और हमेशा रहेगी।
–  भगवान् श्रीकृष्ण अपने जीवन के अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक समय तक नहीं रहे थे।
–  परमधाम को गमन करने के समय तक भी भगवान् श्रीकृष्ण के ना तो एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्रियां थीं।
–  कृष्ण के जन्म के निश्चित समय और उनकी आयु के विषय में पुराणों व आधुनिक मिथक विज्ञानियों में मतभेद हैं ! कुछ लोग उनकी आयु 125 और कुछ लोग 110 वर्ष बताते हैं।
–  सभी जानते हैं कि कृष्ण की मृत्यु पैर के तलवे में तीर लगने के कारण हुई थी। और ऐसा भी कहा जाता है कि जब यह खबर वृन्दावन पहुंची तो उनके पिता वासुदेव को सदमा लगा और उनकी भी मृत्यु हो गयी।
–  श्रीकृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा मात्र कुछ ही महीनों में पूरी कर ली थी! जिसमें कहा जाता है कि उन्होंने 64 दिनों में ही 64 विद्याओं को सिख लिया था!
–  भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय कारागार में उनके पिता के द्वारा बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था और वह यशोदापुत्री एकानंशा आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।
–  भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा का वर्णन हिंदू धर्म के महान ग्रंथों जैसे विष्णुपुराण, भागवतपुराण, महाभारत और हरिवंशपुराण में कहीं नहीं है। जबकि राधा का उल्लेख गीत गोविंद, ब्रह्मवैवर्त पुराण और अन्य प्रचलित जनश्रुतियों में ही मिलता है।
–  श्रीकृष्ण ने अपनी शिक्षा उज्जैयनी या आज जिसे उज्जैन के नाम से जाना जाता है वहां स्थित संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ दिनों में ही पूरी कर ली थी।
–  श्रीकृष्ण एक विश्वास पात्र शिष्य, मित्र, गुरु और विश्वसनीय सलाहकार थे। पांडव धर्म का पालन करते थे इसीलिए श्रीकृष्ण का पांडवों से सीधा रिश्ता था।
–  भगवान् श्रीकृष्ण ने दो ऐसे नए नगरों की स्थापना भी की थी जो पूर्व में कुशावती या आज जिसे हम द्वारिका के नाम से जानते हैं और और दूसरा पांडव पुत्रों के सहयोग द्वारा बसाया गया खांडवप्रस्थ जिसे आज हम इंद्रप्रस्थ के नाम से जानते हैं।
–  भगवान श्रीकृष्ण के रथ को जैत्र के नाम से जाना जाता था और उनके सारथी का नाम दारुक या बाहुक था। उनके रथ के घोड़ों के नाम सुग्रीव, शैव्य, मेघपुष्प और बलाहक थे ।
–  भगवान् श्रीकृष्ण की खड्ग याने आज जिसे तलवार के नाम से जानना जाता है उसका नाम नंदक था। जबकि गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था जो गुलाबी रंग का था ऐसा माना जाता है।
–  श्रीकृष्ण के मुख्य आयुध चक्र का नाम सुदर्शन और धनुष का नाम शारंग था। वह लौकिक, दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था। जबकि उनके इस अस्त्र की बराबरी के अन्य विध्वंसक अस्त्र केवल दो ही अन्य अस्त्र थे जिनमें से एक पाशुपतास्त्र था जो भगवान शिव, स्वयं कृष्ण और अर्जुन के पास ही थे। और दूसरा अस्त्र जिसका नाम प्रस्वपास्त्र था। और यह अस्त्र भी भगवान शिव, स्वयं कृष्ण, वसुगण और भीष्म के पास था।

क्यों कहा जाता है जन्म से मृत्यु तक की गतिविधियों को लोककला?

–  माना यह जाता है कि महाभारत काल में अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था, परंतु वास्तव में श्रीकृष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे, और यह बात सिद्ध होती है मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के उस स्वयंवर से जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयंवर से भी अत्यंत कठिन थी। और इस प्रतियोगिता में कर्ण व अर्जुन दोंनों असफल हो गए थे जबकि श्रीकृष्ण ने इसमें लक्ष्यवेध कर मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की, जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं थीं।
–  भगवान् श्रीकृष्ण ने कई अभियानों और युद्धों का संचालन किया था जीते थे, लेकिन इनमें से तीन युद्ध सबसे भयंकर माने गये थे। और इन तीनों भयंकर युद्धों में सर्वप्रथम महाभारत का युद्ध था। इसके बाद जरासंध और कालयवन के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध था। जबकि नरकासुर के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध तिसरा सबसे भयंकर युद्ध माना गया।
–  जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने विश्वप्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों या पहलवानों का वध किया उस समय उनकी आयु केवल 16 वर्ष की ही थी।
–  वैसे तो श्रीकृष्ण ने कई छोटे-बड़े युद्ध किए लेकिन पौराणिक ग्रंथों में इस बात का भी जिक्र आता है कि एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच भी युद्ध ठन गया था और इसमें दोनों ही योद्धाओं ने अपने-अपने सबसे घातक और विनाशक शस्त्रों का प्रयोग करने की ठान ली थी, यानी श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र और अर्जुन ने अपना पाशुपतास्त्र चलाने के लिए निकाल लिया था। लेकिन बाद में देवताओं के हस्तक्षेप से दोंनों शांत हुए! इस युद्ध को श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद युद्ध बताया जाता है।
–  महाभारत युद्ध से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से की गई मनुष्य की श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में वैज्ञानिक व्याख्या एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें जीवन का पूरा सार दिया हुआ है। श्रीमद्भगवद्गीता में मनुष्य के जन्म लेने से मृत्यु के बाद के चक्र को विस्तारपूर्वक बताया गया है।
–  कहा जाता है कि आज जिसे हम मार्शल आर्ट या कलारिपट्टू के नाम से जानते हैं का विकास श्रीकृष्ण ने ही ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था! और इसीलिए कई जगह कलारी-पट्टु का प्रथम आचार्य कृष्ण को ही माना जाता है! और इसी युद्ध कला के कारण नारायणी सेना उस समय की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गयी थी !

– अमृति देवी

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